किसी भी सरकार की संवेदनशीलता परखने के लिए यह देखने की जरूरत नहीं कि वह अपने राज्य के ताकतवर तबके के लिए क्या करती है, यह देखना जरूरी है कि वह अपने सबसे कमजोर, सबसे अनदेखे और सबसे मौन नागरिक के लिए क्या सोचती है। आउटसोर्सिंग व्यवस्था में काम करने वाला कर्मचारी दफ्तर में सबसे पहले आता है और सबसे बाद में जाता है, लेकिन व्यवस्था में उसका स्थान हमेशा सबसे अंतिम पायदान पर रहा है। न उसे स्थायी कर्मचारी जैसा सम्मान मिलता, न सामाजिक सुरक्षा की गारंटी, न भविष्य निधि की निश्चितता। वह विभाग, एजेंसी और खुद अपने बीच बंटा हुआ एक ऐसा व्यक्ति था, जिसकी पीड़ा सुनने वाला कोई संस्थागत तंत्र नहीं था। यही वह शून्य था, जिसे भरने का प्रयास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (यूपीकॉस) गठित करके किया है।
एक लंबे इंतजार का अंत
उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम का उद्घाटन लंबी प्रतीक्षा को विराम देने वाला क्षण है। यह केवल एक नए निगम की स्थापना भर नहीं, बल्कि उस अदृश्य कर्मचारी वर्ग को औपचारिक पहचान और संस्थागत सहारा देने की पहल है, जो अब तक व्यवस्था के हाशिए पर खड़ा रहकर काम करता आया। पहले पूरा ढांचा तीन हिस्सों में टूटा हुआ था- कार्मिक, एजेंसी और विभाग। किसी समस्या के साथ कर्मचारी जब एक दरवाजे पर पहुंचता, तो उसे दूसरे दरवाजे की ओर मोड़ दिया जाता। न वेतन समय पर मिलने की गारंटी, न ईपीएफ-ईएसआई को लेकर कोई स्पष्टता, न सेवा अधिकारों की कोई ठोस रूपरेखा। इस प्रशासनिक ढिलाई ने लाखों परिवारों को स्थायी अनिश्चितता में जीने पर मजबूर कर दिया था।
बोझ से संपत्ति तक का वैचारिक सफर
साढ़े तीन लाख से ज़्यादा आउटसोर्स कर्मचारी सीधे इसके दायरे में आएंगे, और जब उनके परिवारजनों को जोड़ें तो यह संख्या 17 से 20 लाख के बीच पहुंच जाती है। यह अकेले किसी वर्ग विशेष की बात नहीं, बल्कि प्रदेश की सामाजिक बुनावट के एक बड़े हिस्से की तक़दीर बदलने वाला निर्णय है। हर महीने की पांचवीं तारीख तक पारिश्रमिक सीधे बैंक खाते में स्थानांतरित होगा, जिससे पूरी व्यवस्था में किसी पड़ाव पर भी बिचौलियों के लिए कोई स्थान नहीं होगा और भुगतान संबंधित तमाम विसंगतियों पर लगाम लगेगी।
सुरक्षा कवच जो जीवन बदल देगा
किसी दुर्घटना, हादसे या आपदा की स्थिति में परिवार को 20 से 40 लाख रुपये तक का बीमा संरक्षण मिलेगा। यह प्रावधान उस डर को खत्म करता है, जो हर आउटसोर्स कर्मचारी के भीतर हमेशा से बना रहा कि किसी अनहोनी की सूरत में उसका परिवार बेसहारा हो जाएगा। ईपीएफ और ईएसआई का योगदान अब निश्चित रूप से जमा होगा। सरकार खुद एजेंसी को सर्विस चार्ज देगी, ताकि कर्मचारी की जेब पर कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े। यह व्यवस्था उस आर्थिक दबाव को सीधे कम करती है, जो अब तक कर्मचारी अकेले उठाता आया था। नौकरी को लेकर छाई असुरक्षा भी अब समाप्त होने जा रही है।
परिवार तक फैला भरोसे का दायरा
बेटे की पढ़ाई के लिए आठ लाख रुपये तक और बेटी की पढ़ाई के लिए दस लाख रुपये तक की मदद, दो बेटियों की शादी के लिए आठ से दस लाख रुपये तक का सहयोग, और कर्मचारी के आकस्मिक निधन जैसी अप्रिय स्थिति में अंतिम संस्कार के लिए पचास हजार रुपये तक की व्यवस्था- ये सभी प्रावधान मिलकर एक पारिवारिक सुरक्षा कवच का निर्माण करते हैं। मातृत्व अवकाश जैसे वैधानिक लाभ भी अब सुनिश्चित किए गए हैं। यूपीकॉस पोर्टल और वेबसाइट का शुभारंभ इस पूरी संरचना को डिजिटल पारदर्शिता से जोड़ता है, जहां हर कर्मचारी की समस्या को सुनने और सुलझाने के लिए एक स्थायी संस्थागत तंत्र मौजूद रहेगा।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक जगदीश त्रिपाठी एक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)