शशांक खेतान की फिल्म ‘सनी संसकारी की तुलसी कुमारी’ देखने के बाद ऐसा लगता है जैसे स्क्रीन पर सब चमक रहा है, लेकिन दिल कहीं पीछे छूट गया है। शादी-ब्याह के रंग-बिरंगे सेट, गाने और फैशन तो आपको पहली नजर में लुभाते हैं, लेकिन कहानी? वही पुराना फार्मूला, जैसे फिल्म की नोटबुक खो गई हो और बार-बार वही कॉपी पेस्ट हो रही हो।
कहानी
कहानी सनी (वरुण धवन) के इर्द-गिर्द बुनी गई है। सनी अपनी प्रेमिका अनन्या (सान्या मल्होत्रा) को पूरी ताकत से चाहता है, लेकिन… सरप्राइज। उसका प्रोपोजल रिजेक्ट हो जाता है। वहीं तुलसी (जान्हवी कपूर) भी अपने प्रेमी विक्रम (रोहित सराफ) से रिजेक्ट हो जाती है। अब अनन्या और विक्रम एक दूसरे से शादी करने जा रहे हैं।
ऐसे में खोए हुए प्यार को वापस पाने के लिए सनी और तुलसी मिलकर एक प्लान बनाते है। नकली प्यार की प्लानिंग, ताकि प्री-वेडिंग में अपने पुराने प्रेमियों को जला सकें। मतलब... झूठा रोमांस, नकली इमोशन और बीच-बीच में हंसी के हल्के-फुल्के पल। लेकिन जैसे ही सनी और तुलसी की एक-दूसरे के प्रति असली भावनाएं उभरती हैं, उनका प्लान उलझ जाता है।
अभिनय
वरुण धवन ने अपनी एनर्जी और चार्म से सनी को जिंदा ताे किया है, लेकिन कई जगह लगता है- ‘अरे यार, ये वही पुराने किरदारों का रीमिक्स है।’ जान्हवी कपूर सुंदर और उत्साही हैं, लेकिन बार-बार वही एक्सप्रेशन देखकर लगता है- ‘कहीं रिवाइंड तो नहीं हो गया?’
अनन्या के किरदार में सान्या मल्होत्रा आकर्षक हैं, जबकि विक्रम के रोल में रोहित सराफ संतुलित और समझदार लगते हैं। इन दोनों की जोड़ी फिल्म में संतुलन बनाए रखती है। मनीष पॉल का हास्य कभी-कभी हिट, लेकिन कई जगह रिपीट मोड पर लगता है। अक्षय ओबेरॉय समेत बाकी सहायक कलाकार रंग भरते हैं, लेकिन ज्यादातर सिर्फ बैकग्राउंड में ही रह जाते हैं।
निर्देशन
शशांक खेतान ने फिल्म के सेट और लुक पर जोर दिया है। शादी-ब्याह के सीन सुंदर हैं, लेकिन कहानी में नया ट्विस्ट नहीं है। कई जगह ये फिल्म उनकी पिछली फिल्मों 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' और 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' जैसी ही लगती है। पेस धीमी है और कई सीन खींचे हुए हैं।
संगीत
फिल्म का संगीत तनिष्क बागची, ए.पी.एस, सचेत-परंपरा, गुरु रंधावा, रॉनी अजनाली और गिल मच्छरै ने मिलकर दिया है। प्रमुख गाने ‘बिजुरिया’और ‘पनवाड़ी’ कुछ हद तक यादगार हैं, लेकिन बाकी गाने कहानी में फिट होने के बावजूद ज्यादा असर नहीं छोड़ पाते।
पटकथा और स्क्रीनप्ले
कहानी में कोई नई सोच नहीं है। नकली रोमांस, गलतफहमियां और भावुक सुलह अनुमानित लगती हैं। इससे पहले भी ऐसी कई फिल्में देख चुके हैं। हास्य दृश्य कभी-कभी मनोरंजन करते हैं, लेकिन अधिकांश सीन दोहराव वाले और खिंचे हुए हैं। स्क्रीनप्ले भी कुछ खास नया नहीं पेश करता। दृश्य और घटनाओं का क्रम साधारण है, जिससे फिल्म में रोमांच या ट्विस्ट कम दिखाई देते हैं।
पॉजिटिव और नेगेटिव
फिल्म में एक तरफ हल्का रोमांस है। कुछ मजेदार पल हैं। वरुण-जान्हवी की मजेदार जोड़ी है और रंग-बिरंगे शादी और ब्याह के सीन भी हैं। वहीं दूसरी तरफ पुरानी कहानी, सपाट पात्र और खींची हुई पटकथा भी है। गाने भी ज्यादा यादगार नहीं हैं।
देखें या नहीं
अगर आप सिर्फ हल्का फुल्का रोमांस, शादी की चमक और थोड़े बहुत हंसी के पल चाहते हैं, तो एक बार के लिए देखी जा सकती है। लेकिन अगर आप नई कहानी, गहरे पात्र और रोमांचक मोड़ चाहते हैं, तो यह फिल्म ज्यादा प्रभावित नहीं करेगी।