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Drive Movie Review: नेटफ्लिक्स और धर्मा दोनों का नया कलंक बनी सुशांत की फिल्म ड्राइव

Sat, 02 Nov 2019 04:13 PM IST
Avinash Pal अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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ड्राइव - फोटो : सोशल मीडिया
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मूवी रिव्यू: ड्राइव

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कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत, जैकलीन फर्नांडीस, बोमन ईरानी, पंकज त्रिपाठी, विक्रमजीत विर्क आदि।
निर्देशक: तरुन मनसुखानी
निर्माता: करण जौहर
रेटिंग: 0/5

करण जौहर का करिश्मा कुछ साल पहले तक हिंदी सिनेमा के दर्शकों के सिर चढ़कर बोलता रहा है। कहीं कोई सिनेमा का बड़ा जश्न हो या फिर सिनेमा के चेहरों को किसी सियासी शो में दिखाना हो तो वह हिंदी सिनेमा के ब्रांड अंबेसडर बनकर पहुंच जाते हैं। उधर, भारत में अपनी जड़ें जमाने के लिए नेटफ्लिक्स को खाद चाहिए। करण जौहर और अनुराग कश्यप जैसे फिल्मेकर्स उसे वही मुहैया करा रहे हैं।

नेटफ्लिक्स का एक महीने का बिल 649 रुपये आता है। दर्शक उम्मीद करता है कि इसके बदले कुछ अच्छा हिंदी कंटेंट नेटफ्लिक्स दिखाएगा। लेकिन, एक उपभोक्ता के नाते उसे मिल क्या रहा है, बार्ड ऑफ ब्लड, सेक्रेड गेम्स 2 और अब ड्राइव। ठीक है कि करण जौहर का नाम नेटफ्लिक्स के मेकर्स की लिस्ट में जुड़ता है तो उसका प्रोफाइल बढ़िया दिखता है लेकिन दर्शकों का क्या कसूर? जो फिल्म करण जौहर ने थिएटर में रिलीज करने लायक भी नहीं समझी, उसे नेटफ्लिक्स ने भारतीय दर्शकों को परोस दिया है। खाद का गोबर कभी व्यंजन नहीं हो सकता, नेटफ्लिक्स को ये समझना चाहिए।
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ड्राइव एक ऐसी फिल्म है जिसे देखते हुए शनिवार या इतवार को अपना कीमती एक घंटा 59 मिनट बर्बाद कर देना किसी सजा से कम नहीं है। सजा करण जौहर इस साल कलंक और स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2 जैसी फिल्में बनाकर पहले ही अपने प्रशंसकों को बहुत दे चुके हैं। केसरी भी औसत फिल्म ही निकली। लेकिन, उनको अपने धर्मा प्रोडक्शंस ब्रांड की तो परवाह करनी चाहिए।
सुशांत सिंह राजपूत के करियर का कलंक है फिल्म ड्राइव। ऐसी कहानियों पर 70 के दशक पर चोर मचाए शोर और विक्टोरिया नं. 203 जैसी क्लासिक फिल्में बन चुकी हैं। लेकिन, ड्राइव? इसमें कोई क्लास नहीं है। कैटल क्लास भी नहीं। जुगाड़ की रंगी पुती गाड़ियां हैं। घटिया विजुअल ग्राफिक्स हैं। जबर्दस्ती का अभिनय है और हैं गाने जो बताते हैं कि हिंदी सिनेमा पर राज कैसे कैसे लोग कर रहे हैं?
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कहानी चूहे बिल्ली के खेल जैसी है। चोरों के गैंग हैं। कारों की दौड़ है और जैकलीन का बेहूदा अंग प्रदर्शन है। राष्ट्रपति भवन लूटने जैसे विषय पर फिल्म बनाना हिंदी सिनेमा के दिमागी दिवालिएपन का ताजा नमूना है। और, नेटफ्लिक्स? इसकी क्रिएटिव टीम को क्या हुआ है? जिस वीकएंड पर प्राइम वीडियो जैक रयान का दूसरा सीजन रिलीज कर रहा है, उसी वीकएंड को इतनी घटिया फिल्म? दर्शक मुफ्त में नेटफ्लिक्स नहीं देखते। लेकिन, ये बात शायद नेटफ्लिक्स को याद नहीं है।

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