निर्देशक: अभिषेक शर्मा
निर्माता: फॉक्स स्टार स्टूडियोज, पूजा शेट्टी, आरती शेट्टी
हर किसी को मुंबई में इन दिनों एक किताब चाहिए। पढ़ने के लिए कम और फिल्म बनाने के लिए ज्यादा। फिर किताब अभी की हो, दशक भर पुरानी हो या किसी और जमाने की। बिना ज्यादा दिमाग लगाए निर्माता बस किसी न किसी बेस्टसेलर को परदे पर उतारने की होड़ में हैं। इसी होड़ का नतीजा है, क्रिकेट और कमर्शियल फिल्मों का 11 साल पहले आए उपन्यास द जोया फैक्टर में किस्मत कनेक्शन कराने वाली कहानी पर बनी सोनम कपूर और दुलकर की फिल्म द जोया फैक्टर।
फिल्म द जोया फैक्टर कैडबरी के विज्ञापन किस मी, मिस मी से शुरू होती है और पेप्सी, नैरोलेक पेंट्स जैसे उत्पादों का विज्ञापन करते हुए इस संदेश पर खत्म होती है कि तकदीर है क्या, मैं क्या जानूं, मैं आशिक हूं तदबीरों का। तकदीर यानी किस्मत और तदबीर यानी मेहनत के बीच चलती इस लव स्टोरी में तमाम और किरदार हैं और ये दूसरी, तीसरी कतार के किरदार ही हैं जो आपको आखिर तक फिल्म देखने के लिए रोके रहते हैं। नहीं तो फिल्म जगह जगह पर गोते खाने लगती है।
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the zoya factor
फौजियों के घर में पैदा हुई जोया का जन्म भारतीय क्रिकेट टीम के वर्ल्ड कप जीतने वाले दिन होता है तो उसका पिता उसे लकी मान लेता है। लेकिन, बेटी के बड़े होने तक वह उससे लकी चार्म का ये टैग तब तक दूर नहीं करता जब तक कि किक्रेट बोर्ड बेटी के सामने एक करोड़ का प्रस्ताव टीम का लकी मैस्कट बनने के लिए नहीं रख देता। परिवार मॉडर्न है ये दिखाने के लिए बेटा, बेटी सब पिता के साथ बीयर पीते हैं। पिता और उसके दोस्त पड़ोस वाली मिसेज मिश्रा के साथ फ्लर्ट करते हैं। और, बेटी अपने करियर को बचाने के चक्कर में क्रिकेट खिलाड़ियों को बेवकूफ बनाने की कोशिश करते करते खुद इसका शिकार हो जाती है।
अनुजा चौहान ने 11 साल पहले जब अपना उपन्यास लिखा होगा तो जरूर लोगों ने इसे हाथोंहाथ लिया होगा, लेकिन 2019 में ये कहानी बचकानी लगती है। निर्देशक अभिषेक शर्मा ने भी जोया की ही तरह फिल्म के निर्माताओं को राजी किया होगा। वैसे फॉक्स स्टार स्टूडियो को किसी फिल्म में पैसे लगाने के लिए राजी करना ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। यहां भी सारा खेल फिल्म में क्रिकेट के कर्ता धर्ता बने जोरपाल के फाइल आगे बढ़ाने जैसा है।
खैर, कहानी के बाद बात इसके निर्देशन की। अभिषेक ने सोनम कपूर की दर्शकों से बात कराकर और फिल्म की शुरूआत शाहरुख खान की आवाज से कराकर माहौल जमाने की कोशिश भरपूर की है। सोनम कपूर को फुटेज भी खूब दिया है। सोनम जितनी मेहनत कर सकती थीं, वह परदे पर दिखती भी है। अदाकारी करने का प्रयास जब कैमरे में कैद होने लगे तो मामला सुनील शेट्टी जैसा होने में देर लगती नहीं है। फोर्थ वॉल (कलाकार जब कैमरे की तरफ देख दर्शकों से बातें करता दिखता है) भी जोया के इस किरदार को ज्यादा सपोर्ट दे नहीं पाती। दुलकर ने जरूर अच्छा काम किया है और कुछ कुछ विराट कोहली जैसे लगते दुलकर ने जोया के किरदार को सहारा भी दिया है।
दिक्कत फिल्म जोया फैक्टर के साथ ये है कि फिल्म में इस जोड़ी से ज्यादा चमकते हए किरदार अंगद बेदी, सिकंदर खेर, मनु ऋषि और संजय कपूर निभा ले गए हैं। पापा अनिल कपूर थोड़ी देर के लिए दिखते हैं और बोर करते हैं। फिल्म का संगीत पक्ष बेहतर है। शंकर एहसान लॉय ही हैं जो रघुबीर यादव से को माइक पर लाने के लिए तैयार कर सकते हैं और इस बारे में सोच सकते हैं। अरिजीत ने अपने सेट पैटर्न को यहां भी दोहरा दिया है।
फिल्म की फोटोग्राफी में काफी दिक्कतें हैं, खासतौर से क्लाइमेक्स से ठीक पहले दुलकर का क्रोमा पर शूट किया सीन एडिट में भी सही नहीं बन पाया है। फिल्म दो घंटे 14 मिनट की है, फिर भी कसी हुई नहीं लगती। जीवन में कई बार हम खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने के लिए अपने ऊपर जबर्दस्ती का दबाव डालते रहते हैं, सोनम कपूर उसी दौर से गुजर रही हैं। उनको सहज और सरल किरदार करने चाहिए और ऐसा करके वह खुद को खुद की कसौटी पर आसानी से परख सकती है। फिल्म जोया फैक्टर को अमर उजाला मूवी रिव्यू में मिलते हैं ढाई स्टार।