Pooja Meri Jaan Movie Review: फिल्म ‘पूजा मेरी जान’ एकतरफा प्यार, रिजेक्शन और ‘न’ की अहमियत पर सवाल उठाती है। मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की इस फिल्म में मुद्दा गंभीर है, मगर कहानी और कोर्टरूम ड्रामा कितने असरदार हैं? जानें कैसी है ‘पूजा मेरी जान’।
रिजेक्शन को क्राइम मान लिया जाए, तो इस देश की कितनी लड़कियों पर केस हो जाएगा? ओटीटी पर रिलीज हुई ‘पूजा मेरी जान’ की शुरुआत इसी सवाल से होती है। फिल्म एकतरफा प्यार और रिजेक्शन को लेकर समाज की सोच पर बात करती है। एक लड़की किसी लड़के को पसंद नहीं करती, तो उसे उसके प्यार का जवाब देना जरूरी क्यों माना जाता है? और अगर वह मना कर दे, तो उसके बाद लड़के की जिंदगी में जो होता है, उसकी जिम्मेदारी भी क्या उसी लड़की की होगी?
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सवाल सीधा है। जवाब इतना सीधा नहीं। खासकर तब, जब कहानी आगे बढ़ती है तो पूजा और अनिकेत के रिश्ते की कुछ और परतें सामने आती हैं। दोनों के बीच की दोस्ती, अनिकेत के इमोशंस और पूजा के फैसले कहानी को एक ऐसी जगह ले जाते हैं। यहीं से कहानी को लेकर कुछ सवाल उठने लगते हैं।
पूजा मेरी जान
- फोटो : सोशल मीडिया
कहानी
पूजा (मृणाल ठाकुर) और अनिकेत (विक्रम सिंह चौहान) दोस्त हैं। अनिकेत पूजा से प्यार करता है। एक दिन वह उसे प्रपोज करता है और पूजा साफ मना कर देती है। इसके बाद अनिकेत आत्महत्या कर लेता है।
पीछे छोड़ा गया उसका ईमेल पूजा के लिए मुसीबत बन जाता है। उसकी मौत का जिम्मेदार पूजा को ठहराया जाने लगता है। सोशल मीडिया पर भी मामला फैलता है और देखते ही देखते पूजा की निजी जिंदगी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन जाती है।
पूजा की दोस्त सना (हुमा कुरैशी) वकील है। शुरुआत में सना भी अनिकेत की मौत के लिए पूजा को जिम्मेदार मानती है। फिर उसका नजरिया बदलता है और वह पूजा का केस लड़ने का फैसला करती है। सामने सरकारी वकील जतिन त्रिवेदी (विजय राज) हैं।
इसके बाद कहानी अदालत तक पहुंचती है। यहां फिल्म सिर्फ पूजा और अनिकेत की बात नहीं करती। वह सोशल मीडिया की भीड़, लड़के के रिजेक्शन को स्वीकार न कर पाने और लड़की को ही दोषी ठहराने वाली सोच को भी सामने लाती है।
अभिनय
मृणाल ठाकुर ने पूजा को बहुत ज्यादा नाटकीय नहीं बनाया है। वह किरदार को सहज रखती हैं। पूजा के ऊपर आती परेशानी और उसके अकेले पड़ने वाले दृश्यों में उनका काम ठीक बैठता है। पूजा के कुछ फैसले खटकते हैं। इसकी वजह मृणाल का अभिनय नहीं, किरदार की लिखावट है।
हुमा कुरैशी के हिस्से में फिल्म का सबसे दिलचस्प किरदार सना आया है। वह दोस्त भी है और वकील भी। शुरुआत में उसका पूजा को लेकर नजरिया अलग है और बाद में वह उसके साथ खड़ी होती है। हुमा ने इस बदलाव को सहज रखा है। कोर्ट के कुछ दृश्यों में उनके संवाद भी असर छोड़ते हैं।
विक्रम सिंह चौहान ने अनिकेत की बेचैनी और टूटन को अच्छे से पकड़ा है। उसका किरदार जिस भावनात्मक स्थिति से गुजरता है, वह पर्दे पर दिखाई देती है।
विजय राज के जतिन त्रिवेदी को ज्यादा मजबूत दलीलें चाहिए थीं। इससे कोर्टरूम का टकराव भी ज्यादा असरदार बनता।
सुनीता राजवर भी अपने छोटे से किरदार में सहज लगती हैं।
पूजा मेरी जान
- फोटो : यूट्यूब
निर्देशन
नवजोत गुलाटी ने कहानी को सीधे मुद्दे के आसपास रखा है। अनिकेत की मौत के बाद मामला निजी रिश्ते से निकलकर सोशल मीडिया, पुलिस और अदालत तक पहुंचता है। फिल्म इस पूरे मामले में लोगों की बनाई राय को भी कहानी का हिस्सा बनाती है।
कोर्टरूम के हिस्से में वह तनाव नहीं बन पाता, जिसकी इस कहानी को जरूरत थी। यहां कहानी में दो अलग नजरिए सामने आते हैं, मगर दोनों के बीच वह तनाव नहीं बनता जो इस मामले की गंभीरता को पर्दे पर ला सके। कुछ जगह घटनाएं जल्दी-जल्दी आगे बढ़ती हैं, जिससे भावनात्मक असर कम हो जाता है।
पूजा मेरी जान
- फोटो : यूट्यूब
पटकथा और लेखन
फिल्म की पटकथा पूजा और अनिकेत के रिश्ते को लेकर सबसे ज्यादा सवाल छोड़ती है। पूजा को पता है कि अनिकेत उससे प्यार करता है। इसके बावजूद वह उसके करीब बनी रहती है और अपने स्टार्टअप के लिए उससे दस लाख रुपये भी लेती है। फिल्म इन दोनों के बीच की इस जटिलता को पूरी तरह नहीं खोलती।
पूजा के दूसरे रिश्ते भी कहानी में आते हैं, मगर उनका उसके किरदार से जुड़ाव साफ नहीं हो पाता। सना का नजरिया बदलना भी जल्दी में आता है। शुरुआत में वह पूजा को जिम्मेदार मानती है और बाद में उसका केस लड़ती है। इस बदलाव को थोड़ा और समय मिलता तो किरदार ज्यादा भरोसेमंद लगता।
फिल्म के संवादों में कुछ बातें असर छोड़ती हैं, खासकर रिजेक्शन को स्वीकार करने और ‘न’ की अहमियत को लेकर। कहानी के स्तर पर इन्हीं बातों को और मजबूती की जरूरत थी।
देखें या नहीं?
‘पूजा मेरी जान’ का विषय इसे देखने की वजह देता है। फिल्म ‘न’ की अहमियत, एकतरफा प्यार और रिजेक्शन को लेकर समाज की सोच पर बात करती है। कहानी में कुछ सवाल जरूर हैं, जिनके जवाब और बेहतर तरीके से दिए जा सकते थे।
करीब दो घंटे की यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है....खासकर अगर आप रिश्तों और जेंडर से जुड़े मुद्दों पर बनी कहानियां देखना पसंद करते हैं।