निर्माताः अनमोल कपूर, पुष्पा चौधरी
निर्देशकः अभिषेक सक्सेना
सितारेः शारिब अली हाशमी, ज्योति सेठी
रेटिंग: *
यह सही है कि फिल्मों में सामाजिक संदेश भी मनोरंजन के साथ जरूरी हैं। 'फुल्लू' महिलाओं के मासिक धर्म को केंद्रीय विषय बनाकर बात करती है परंतु बहुत ही अधकचरे ढंग से। सिनेमाई कलात्मकता यहां गायब है। न लेखन के स्तर इसमें कल्पनाशीलता और न ही कहानी को शूट करने में खूबसूरती दिखाई गई है।
फुल्लू (शारिब अली हाशमी) गांव का ऐसा शख्स है, जिसे उसकी मां मऊगा कहती है यानी जो महिलाओं से घिरा रहता है। उन्हें भाभी कहते हुए उनकी जरूरत के सामान शहर से ला दिया करता है क्योंकि उनके पति दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में कमाने के लिए गए हैं। मां फुल्लू की शादी बिगनी (ज्योति सेठी) से करा देती है कि फुल्लू शायद कमाई-धमाई के बारे में सोचे। परंतु वह नहीं बदलता और एक दिन शहर के मेडिकल स्टोर पर सैनेटरी नैपकिन की जानकारी मिलने के बाद तय करता है, वह इसे बनाने की फैक्ट्री में ही काम करेगा। पैड बनाना सीखेगा और गांव में महिलाओं को इन्हें इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करेगा।