मोह माया मनी की शुरुआत में लगता है कि कालेधन की कसती मुश्कों के दिनों में कुछ रोचक सामने आएगा। परंतु मिनटों में फिल्म फार्मूलों में ढल जाती है। रीयल इस्टेट कंपनी में काम करने वाला अमन (रणवीर शौरी) जमीन-जायदाद के सौदे कराता है और जल्दी अमीर बनने के चक्कर में धोखे करने लगता है। नतीजा यह कि एक गलत पार्टी के साथ डील में वह फंस जाता है।
अब उसकी जान पर बन आई है। अमन की पत्नी दिव्या (नेहा धूपिया) गलत काम में साथ नहीं देना चाहती। उसे अमन से ही छुटकारा चाहिए। प्राचीन शास्त्रों का सबक है कि गलत ढंग से धन कमाने वाले के पाप में परिवार भागीदार नहीं बनता। यहां भी यही होता है।
Movie Review: सफलता के मोक्ष से दूर 'मोह माया मनी'
गलत करने की सजा अपराधी को मिलती है। असली जिंदगी में यह बात कभी कभी सामने आती है। परंतु फिल्मों में ऐसा हमने जाने कितनी बार देखा है। फिल्म में यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि अमन ने आखिर क्या डील किससे की थी और क्यों नाकाम रहा। रीयल इस्टेट के बाजार में कालेधन का खूब खपत की बातें हैं परंतु फिल्म में इस पर राशनी नहीं डाली गई।
निर्देशक-लेखक ने कहानी को मध्मयवर्ग की उस इच्छा से जोड़ा है जिसमें लोग गलत ढंग से छलांग लगा कर अमीर बनने की कोशिश करते हैं। ऐसे में पूरा कथानक बॉलीवुड अंदाज की तरफ बढ़ जाता है। निर्देशक कुछ नया नहीं दे पाते। पत्नी के किरदार को भी निर्देशक ने विवाहेतर संबंध में लिप्त बता कर यही साबित किया कि हर कुएं में भांग घुली है।
क्या यह लालच और हवस समाज की वास्तविक और वृहत्तर तस्वीर है? जिस तरह से कालेधन को बाहर लाने के लिए की गई नोटबंदी पर लोगों ने धैर्य से लंबी कतारें लगाई हैं, उससे सिनेमा का सच संदिग्ध हो जाता है। ऐक्टर के रूप में रणवीर हमेशा प्रभावित करते रहे हैं और इस फिल्म में भी उन्हें खूब मिला।
मगर कहीं न कहीं वह एक जैसी भूमिकाओं में बंध चुके है। हर फिल्म में हैरान-परेशान-चिड़चिड़े। नेहा धूपिया ने बोल्ड शुरुआत के बाद काम करने का अंदाज तो बदला मगर मुख्यधारा की भूमिकाओं में पैर नहीं टिका सकीं। उन्हें देख कर खिलाड़ी के रन आउट हो जाने जैसा एहसास होता है। निर्देशक मुनीष अगर दूसरी फिल्म में बॉलीवुड स्टाइल के मोह में ना फंसे तो सफलता का मोक्ष उन्हें मिल सकता है।