-निर्माताः धर्मा प्रोडक्शंस
-निर्देशकः शशांक खेतान
-सितारेः वरुण धवन, आलिया भट्ट, साहिल वैद, मोहित मारवाह, श्वेता बसु प्रसाद
रेटिंग**1/2
पुराने दौर का संदेश था, दुल्हन वही जो पिया मन भाये। फिर आया, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे। अब हम्प्टी शर्मा और बद्रीनाथ की दुल्हनिया का समय है। जिसमें दूल्हे को दुल्हन पसंद आने या न आने से बड़ा सवाल ‘रीयल मर्द’ की कसौटी का है। यहां जो हीरो है वह समय-समय पर रोता है, हर हाल में दुल्हन से दिल से प्यार करता है, उसके पीछे मुंबई और सिंगापुर भटकता है, उसे करिअर की ड्राइविंग सीट पर बैठा कर खुद पीछे रहता है, वह दुल्हन से कहीं कम पढ़ा-लिखा, कम काबिल मगर ज्यादा दयालु है। दुल्हन के प्रति ‘कमिटेड’।
दुल्हनिया भी दुनिया देखने के बाद अंततः उसके पास लौट आती है। वैसे, बद्रीनाथ की दुल्हनिया हमें एनआरआई दूल्हे का भी विकल्प देती है क्योंकि देश में अच्छे दूल्हों का अकाल पड़ा है। कुल जमा निर्देशक शशांक खेतान की यह फिल्म बीते एक-डेढ़ दशक में प्यार और विवाह के विषय पर आई दर्जनों फिल्मों का कॉकटेल है, जो पेट और जेब भरी होने पर देखी जा सकती है।
इंटरवल के बाद झेलाऊ
मूवी
फिल्म में झांसी के एक रसूखदार रईस के बेटे बद्रीनाथ (वरुण धवन) को एक शादी में कोटा से आई वैदेही तिवारी (आलिया भट्ट) से पहली नजर में प्यार हो जाता है। रईस पिता के लिए दहेज ही दुल्हन है। परंतु छोटी-मोटी नौकरी पर गुजार-बसर कर रहे तिवारी परिवार के पास दो जवान बेटियों के हाथ पीले करने लायक पैसा नहीं। बद्रीनाथ उनकी मदद करता है।
दहेज का इंतजाम करता है और दोनों बेटियों के विवाह का मंडप सजता है। परंतु वैहेदी के सपने छोटे शहर से निकल कर ऊंची उड़ान भरने के हैं। ऐन मौके पर वह भाग जाती है और बद्री ठगा-सा रह जाता है! अब वैदेही कैसे बनेगी बद्री की दुल्हनिया? फिल्म इंटरवल तक बांधे रहती है। फिर झेलाऊ हो जाती है क्योंकि लेखक-निर्देशक शशांक खेतान कहानी कम कहते हैं और सिंगापुर दर्शन ज्यादा कराते हैं।
वरुण धवन और आलिया भट्ट ने अपना काम सधे ढंग से किया
मूवी
अचानक फिल्म स्त्री विमर्श के घोषणापत्र सरीखी हो जाती है और सिंगापुर की गलियों में चार-छह गुंडों द्वारा हीरो से रेप की कोशिश, फिल्म का सबसे कॉमिक सीन बन जाता है! रेप का शिकार कौन है, क्या इससे अपराध संजीदा या हास्य का विषय बनता है? यहां निर्देशक की सोच पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। वरुण धवन और आलिया भट्ट ने अपना काम सधे ढंग से किया है।
मगर ऐसा कुछ करने में नाकाम रहे, जिससे उन्हें इन भूमिकाओं के लिए याद रखें। करीब हर दृश्य में वरुण के साथ उनके दोस्त में रूप में दिखे साहिल वैद अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल रहे। गीत-संगीत यहां कामचलाऊ है। किरदारों की भाषा जरूर कुछ आकर्षक है। कुछ संवाद अच्छे हैं। हम्टी शर्मा की दुल्हनिया से यह फिल्म हर स्तर पर बिल्कुल अलग है। उसे देखा हो तो भी इसे देख सकते हैं, उसे न देखा हो तो इसे भी छोड़ सकते हैं।