'ख्वाबों का झमेला' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ये जुबिन नाम के एक युवक (दिखने में) की कहानी है। ये रोल राज बब्बर और स्मिता पाटिल के बेटे प्रतीक बब्बर ने निभाया। बब्बर फैमिली में अगर अभिनय को किसी ने अगली पीढ़ी मे सीरियसली लिया है तो वह जूही बब्बर ही है। बढ़िया थियेटर करती हैं। ‘फराज’ जैसी फिल्म मिले तो अदाकारी भी कमाल करती हैं। वह दिन पर दिन अच्छी अभिनेत्री बनती जा रही है और अगर किसी प्रौढ़ प्रेम कहानी में उन्हें मौका मिला तो वह भी ‘96’ की तृषा जैसा कमाल किसी दिन कर सकती हैं। यहां बात प्रतीक की जो इस फिल्म में शायद इसीलिए हैं कि उनकी डेट्स निर्माता, निर्देशक को आसानी से मिल गईं या फिर कि इन दिनों जो हाल युवा सितारों का है, उसमें वह कहानी सुनने को मिल गए।
'ख्वाबों का झमेला' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जुबिन की गर्लफ्रेंड कम मंगेतर को उसमें वह बात नहीं दिखती जो एक औरत एक करारे मर्द में तलाशती है। औरतों की मानें तो ये सब दिमाग का वहम है। अति उत्तेजना में युवक ऐसी गलतियां खूब करते हैं और दोष खुद को देते हैं। फिर ‘मर्दाना ताकत’ का इलाज करने वाले उन्हें अपने जाल में फांसते हैं और खूब बेवकूफ बनाते हैं। यहां मामला विदेशी धरती का है। सोचिए जिस ब्रिटिश राज का सूरज कभी दुनिया में डूबता नहीं था, वह इन दिनों इतनी सब्सिडी बांट रहा है कि वाशु भगनानी से लेकर जियो स्टूडियोज तक सबको वहां फिल्म बनाने की चुल्ल सी मची है। अपने हीरो को यहां रूबी मिलती है। ‘संजू’ वाली सोनम कपूर याद है ना, बस उसी का थोड़ा सा कमतर वर्जन। वह इंटीमेसी कोच है। कोच करती है कि कि मर्द को कब, कैसे और कितनी देर होल्ड करना चाहिए?
'ख्वाबों का झमेला' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
दो निर्माताओं, एक लेखिका और एक निर्देशक ने मिलकर फिल्म 'ख्वाबों का झमेला' लिखी है, क्यों लिखी है, वही जाने। शायद सब्सिडी का जुगाड़ करना फिल्म का मुख्य उद्देश्य रहा है। कहते हैं कि थ्री सी यानी क्राइम, कॉमेडी और क्रिकेट छोटे परदे पर खूब बिकता है। फिल्म बनाने वालों ने इसमें सेक्स भी डाल लिया है। एकता कपूर के आल्ट बालाजी से चूकी फिल्म लगती है ये। कहानी चूंकि बहुत संकरी पगडंडी पर गुजर रही है तो इसमें हिचकोले बहुत हैं और जब तक दर्शक अपनी साध संतुलित कर पाता है, फिल्म खत्म होने को हो लेती है। दानिश असलम कोशिश करते हैं कि ब्लैक कॉमेडी का रंग किसी तरह हिना सा खिल जाए लेकिन उतना समय उन्होंने फिल्म की कहानी को सजने का दिया नहीं है।
'ख्वाबों का झमेला' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
प्रतीक बब्बर अच्छे अभिनेता बन सकते हैं, अभिनय उनके लिए कोई बड़ा काम नहीं होना चाहिए। लेकिन, जितनी साधना की जरूरत इसके लिए है, उतनी वह कभी करते दिखे नहीं। अभिनय दरअसल साथ काम करने वाले कलाकार की देह भाषा की प्रतिक्रिया है। पता नहीं क्यों लेकिन प्रतीक का अभिनय देखकर हमेशा यह लगता है कि इस लड़के के मन में कहीं न कहीं राज बब्बर और स्मिता पाटिल का बेटा होने का गुमान अटककर रह गया है। इन्हें नुक्कड़ थियेटर में कायदे घिसा जाना चाहिए था और फिर कैमरे के सामने आने के लिए तैयार करना चाहिए था। आग है प्रतीक में लेकिन उसका प्रतीक अभिनय में दिखता नहीं है। कुबरा और सयानी एक दूसरे के कंपटीशन में हैं। कंपटीशन किस चीज का है अब तक आप समझ ही गए होंगें। सयानी गुप्ता से उम्मीदें बहुत रही हैं सिनेमा को लेकिन उनका आभामंडल उनके आसपास आम लोगों को फटकने नहीं देता है।
'ख्वाबों का झमेला' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म में लिलेट दुबे के होने से छोड़ी गहराई है। दानिश हुसैन, अनीसा बट और कैजाद कोटवाल भी हाशिये पर होने के बावजूद संतुलन की कोशिश करते दिखते हैं। कलाकार स्थानीय ही लिए गए हैं ताकि खर्च में कटौती की जा सके। दानिश की कोशिश एक ईलीट सिनेमा बनाने की रही होगी, और उसमें वह अपने हिसाब से शायद पासिंग मार्क्स ले भी आए हों, लेकिन जियो सिनेमा के दर्शकों के हिसाब से फिल्म थोड़ी दुरूह हो गई है। मनोरंजन नाम की चिड़िया इस बगीचे गायब है। सुरों की संगत कमजोर है, गीत लिखे भी बहुत उम्दा नहीं है। दानिश असलम को ये सब देखना होगा, लेकिन वह अपने निर्देशन को संतुलित करने में ही पूरी फिल्म में व्यस्त दिखते हैं, लेकिन असर उसके बाद भी आ? नहीं है। हां, अंशुमन महाले की सिनेमैटोग्राफी आकर्षक है। बाकी सब फर्स्ट क्लास बिल्कुल नहीं है।