निर्माताः फिरोज ए.नाडियाडवाला
निर्देशकः अनीस बज्मी
सितारेः जॉन अब्राहम, श्रुति हासन, नाना पाटेकर, अनिल कपूर, परेश रावल, नसीरूद्दीन शाह, डिंपल कपाड़िया, शाइनी आहूजा
रेटिंग **
नाम ही काफी है। वेलकम बैक बनाते वक्त निर्माता-निर्देशक ने केवल यही एक बात ध्यान में रखी। सात साल पहले आई फिल्म वेलकम की कामयाबी को उन्होंने इस सीक्वल के सहारे आगे बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन पुराना जादू जगा पाने में नाकाम रहे। कहानी के पंक्चर पहिये फिल्म को कैसे खटारा बना देते हैं, वेलकम बैक इसका नमूना है।
उदय भाई (नाना पाटेकर) और मजनू भाई (अनिल कपूर) जैसे जोड़ीदार। अज्जू भाई (जॉन अब्राहम) जैसा फाइटर। वांटेड भाई (नसीरूद्दीन शाह) जैसा खतरनाक गैंग्स्टर। डॉ. घुंघरू (परेश रावल) जैसा हंसाने वाला बंदा। ये सब अपनी-अपनी जगह पर मुकम्मल किरदार हैं। जब आते हैं तब असर छोड़ते हैं। परंतु इन्हें एक सूत्र में पिरोने वाली कहानी के धागे में जगह-जगह गांठ पड़ी है। इसलिए फिल्म प्रवाह में नहीं बहती। टूटती-बिखरती रहती है।
नाना-अनिल अपनी बेटी की उम्र की लड़की के पीछे पगलाए अच्छे नहीं लगते
वेलकम में हीरो सीधा-सादा था और उसे गैंगस्टरों की बहन से प्यार हो गया था। हीरो से बहन की शादी कराने के लिए गैंगस्टरों को सुधरना पड़ा था। वेलकम बैक में सुधरे हुए गैंगस्टरों, उदय भाई और मजनू भाई का पाला एक भारी गुंडे से पड़ता है, जिसे उनकी बहन (श्रुति हासन) से प्यार गया है। बहन भी गुंडे पर मरती है।
अब क्या शरीफ बने गैंगस्टर गुंडे के हाथों में अपनी बहन का हाथ देंगे या फिर खुद बदल कर पहले की तरह हो जाएंगे? इस रोचक कथानक में प्रीक्वल का दुहराव यह है कि उदय भाई और मजनू भाई अभी तक कुंवारे हैं तथा यहां भी उनकी नजर एक ही लड़की (अंकिता श्रीवास्तव) पर है। दोनों उसका प्यार हासिल करना चाहते हैं।
इस दोहराव में मजा नहीं आता और नाना-अनिल अपनी बेटी की उम्र की लड़की के पीछे पगलाए अच्छे नहीं लगते। वेलकम बैक की नायिकाएं बेहद कमजोर कड़ी हैं। श्रुति और अंकिता ग्लैमर पक्ष के मामले में पूरी तरह से निराश करती हैं और डिंपल कपाड़िया का रोल प्रभावित नहीं करता।
ये फिल्में टीवी पर ज्यादा अच्छी लगती हैं
एक डांस में दिखने वाली सुरवीन चावला असर छोड़ जाती हैं। हालांकि गीत-संगीत किसी तरह से नहीं छूता और एक धुन भी आप गुनगुना नहीं पाते। वेलकम बैक वैसी फिल्मों में हैं जिन्हें टाइम पास करने के लिए देखा जा सकता है। ये फिल्में टीवी पर ज्यादा अच्छी लगती हैं क्योंकि इन्हें बिस्तर या सोफे पर निष्क्रिय पड़े देख सकते हैं।
इनमें कभी-कभी आने वाले गुदगुदाते सीन के साथ करवट बदली जा सकती है या फिर किसी चुटीले संवाद पर पॉपकॉर्न/चाय की चुस्कियां ली जा सकती हैं। फिल्म में कोई किरदार कम या ज्यादा असर नहीं छोड़ता। सब बराबर हैं।
यहां पहले हिस्से में तो भी कहानी का आभास होता है कि क्या अज्जू से बहन की शादी के लिए उदय-मजनू राजी होंगे। लेकिन दूसरे हिस्से में सब पटरी से उतर जाता है। वांटेड भाई की एंट्री और खाड़ी देश के एक कब्रस्तान और फिर रेगिस्तान के लंबे दृश्य पूरी तरह बनावटी मालूम पड़ते हैं। फिल्म का अंतः सबसे ज्यादा निराश करता है।