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यमला पगला दीवाना 2: कहीं हंसाती तो कहीं उबाती है फिल्म

Fri, 07 Jun 2013 04:26 PM IST
रोहित मिश्र
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'यमला पगला दीवाना 2' अपनी तरफ से हंसाने का हर बंदोबस्त करती है। बनारस में लोगों को ठग रहे धमेंद्र और बॉबी देओल की जोड़ी अपनी ठगी से हंसाना चाहती है तो सन्नी देओल की कॉमेडी अपने एक्शन से। कोई कसर न रहे इसिलए कुछ और किरदार फिल्म में जोड़ लिए गए हैं। जैसे आइंस्टीन नाम का एक चैंपेजी जो शराब पीकर पेटिंग बनाता है।
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पीले बाल रखकर नासा के वैज्ञानिकों वाली ड्रेस पहनने वाला एक बिल्डर और शाहरुख खान की नकल करते हुए डॉन बनने की एक एक्टिंग करने वाला एक मसखरा। क्लाइमेक्स के एक्शन सीन के लिए कुछ जापानी सूमो भी आपके लिए ही हैं। इतना सब कुछ करने के बाद भी फिल्म कमजोर और बांसी लगती है। ऐसा बराबर लगा करता है कि यह दृश्य हम कहीं देख चुके हैं। हां बीच-बीच कुछ किस्से और सीन नए भी हैं लेकिन अफसोस इनकी संख्या बहुत कम है।

संगीत सीवन के निर्देशन में बनी इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका प्लाट है। शुरुआत के दस मिनट में ही साफ हो जाता है कि फिल्म कहां-कहां गुजरकर कहां पहुंचने वाली है। कॉमेडी के दृश्यों पर तो दर्शक एक बार हंस भी लेते हैं लेकिन यह फिल्म वहां पर शोर मालूम देती है जब सभी किरदार अचानक 'इमोशन-इमोशन' का खेल खेलने लगते हैं।
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कहानी ठगने की फिर शरीफ बनने की

फिल्म की कहानी बनारस में रह रहे बाप बेटे की जोड़ी धरम (धमेंद्र) और गजोधर (बॉबी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती हैं। यह दोनों ही ठगी का दोहरा कारोबार करते हैं। धर्मेंद्र बाबा यमला बनने के साथ करोड़ पति ओबेरॉय भी बनते हैं। लंदन से बाबा यमला का नाम सुनकर बनारस आए योगराज खन्ना (अन्नू कपूर)पहले बाबा यमला से प्रभावित होते हैं फिर ओबरॉय एंड ओबेरॉय कंपनी के बाप और बेटों से।

योगराज अपनी बेटी सुमन (नेहा शर्मा) की शादी गजोधर उर्फ प्रेम से कर देता है। तो धरम और गजोधर सुमन से शादी करने और उसके बाप की अरबों की दौलत पाने के लिए लंदन पहुंचते हैं। लंदन में धरम का बड़ा बेटा परमजीत (सन्नी देओल) योगराज खन्ना के क्लब का मैनेजर है। वह उन्हें ऐसा करने से रोकता है। फिर बातों ही बातों में यह खुलता है कि सुमन योगराज की सगी बेटी नहीं है। सगी बेटी रीत (क्रिस्टीना अखीवा) है।

तो अब धरम और गजोधर का फोकस सुमन नहीं रीत होती है। रीत को पाने के लिए यह दोनों ही अलग-अलग तरकीबें भिड़ाते हैं। लेकिन रीत, परमजीत से प्यार कर रही होती है। दर्जनों हिंदी फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी बाद में सब अपनी गलती मानते हैं और सामने वाले उन्हें माफ कर देते हैं।

धर्मेंद्र बेटों पर भारी

फिल्म की स्क्रिप्ट और डायलॉग में ओवरऐक्टिंग की खूब संभावनाएं थीं। तो सबने खूब बढ़कर-बढ़कर ओवर ऐक्टिंग की भी। क्या बॉबी और क्या सनी। लेकिन जहां बात अभिनय की आती है वहां धर्मेंद्र सबसे फिट बैठे हैं। हंसाने वाले सबसे ज्यादा डायलॉग धर्मेंद्र के हिस्से आए भी हैं।

नेहा शर्मा खूबसूरत हैं पर उनकी बदकिस्मती है कि उनके पल्ले खराब स्क्रिप्ट और फ्लॉप हीरो ही पड़ रहे हैं। ज्यादातर घरेलू प्रोडक्शन की फिल्मों में दिखने वाली बॉबी देओल को इस बात पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि वह ऐक्टिंग आखिर कर किसके लिए रहे हैं।

सनी देओल पर एक्शन अच्छा लगता है लेकिन उन्होंने अपने एक्शन को एक कॉमेडी सर्कस में तब्दील कर दिया है। इस फिल्म में सनी सिर्फ चीखते हैं और 200 किलो के सूमो पहलवान हवा में उड़ते हैं। आस्ट्रेलियन मूल की मॉडल और एक्ट्रस क्रिस्टीना अखीवा ठीक-ठाक लगती हैं। अनुपम खेर और अन्नू कपूर जैसे कलाकारों से इतनी अपेक्षाएं हो गयी हैं कि भौंडे रोल अब उनपर शूट नहीं करते।

असफलताओं से नहीं सीखे संगीत सीवन

फिल्म की कमजोरी उसका बांसीपन हैं। और यह बांसीपन कहानी के साथ स्क्रिप्ट में भी है। फिल्म के निर्देशक संगीत सीवन की ज्यादातर फिल्में फ्लॉप रही हैं। संगीत ने शायद उन फिल्मों की असफलता से कुछ सीखा नहीं है। उन्हें फिल्म मेकिंग की एक बेसिक बात समझ नहीं आ रही है कि जिन कहानियों को बेहतर तरीके से पहले दिखाया जा चुका है वे वही प्लाट अपनी फिल्म के लिए क्यों चुन रहे हैं।

अजीब से कपड़े पहनकर मसखरी करने वाली कॉमेडी 2013 की कॉमेडी नहीं है। उन्हें यदि रोहित शेट्टी भी बनना है तो अपने ह्रयूमर में कुछ सेंस डालना होगा ताकि यह सेंस ऑफ हृयूमर बन सके। फिल्म का क्लाइमेक्स किसी कॉर्टून सीरियल जैसा लगता है।

गाने भी फिल्म की तरह

फिल्म का वह गाना सबसे अच्छा है जब फिल्म खत्म हो रही होती है। "आई विल डांस लाइक दिस ओनली" सुनने के साथ-साथ देखने में भी अच्छा लगता है। फिल्म का टाइटिल ट्रैक भी फिल्म की तरह औसत है। बाकी के गाने निराश करते हैं और फिल्म की कहानी में बोझ बनकर गिरते हैं।
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क्यों देखें

धर्मेंद्र को अपने दोनों बेटों से अच्छी ऐक्टिंग करते हुए देखने के लिए।

क्यों न देखें

धर्मेंद्र, सनी, बॉबी या फिर अन्नू कपूर जैसे बड़े नाम सोचकर फिल्म देखने न जाएं।
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