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साइकोलॉजी जानें, तभी देखने जाएं 'प्राग'

Fri, 27 Sep 2013 11:18 AM IST
अमर उजाला मुंबई/ रवि बुले
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कुछ साइको-थ्रिलर आपको तभी देखनी चाहिए जब आप साइकोलॉजी जानते हों। वर्ना फिल्म भी खत्म हो जाए और मजा भी न आए। इसका क्या मतलब?
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अगर आप प्राग की खबर रखते हों और साइकोलॉजी जानते हों तभी यह फिल्म देखने जाएं, वर्ना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवार्ड जीतने वाली ‘प्राग’ आखिर क्या कहना चाहती है, समझना बहुत मुश्किल होगा।

असल में यह एक ऐसे युवक चंदन की कहानी है जो हेल्युसिनेशन यानी वहम का शिकार है। उसकी जिंदगी में सब अच्छा हो रहा है, लेकिन वह ऐसी मानसिक हालत में है कि उसे सब कुछ अपने हाथ से निकलता लग रहा है।
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वह अपने मरे हुए दोस्त अरफी को आंखों के आगे देखता है। उससे बातें करता है। चंदन (चंदन रॉय सान्याल) एक आर्किटेक्ट है। वह अच्छा छात्र है और उसे चेक गणराज्य की राजधानी प्राग जाकर पढ़ने और कुछ गढ़ने का मौका मिलता है। लेकिन चंदन को वहां एक जिप्सी लड़की मिलती है, एलिना (एलिना कजान)।

वह एलिना से प्रेम कर बैठता है, लेकिन लगातार इस बात से परेशान रहता है कि उसका साथी गुलशन एलिना को बहला लेगा। जैसा कि वह पहले भी उस लड़की से कर चुका है, जिसे चंदन ने हिंदुस्तान में प्यार किया था। क्या गुलशन का वाकई कोई अस्तित्व है या फिर वह भी चंदन को अरफी की तरह दिखने वाला भ्रम है...?

गुलशन को लेकर लगातार असुरक्षित महसूस करने वाले चंदन को क्या अपना प्यार मिल पाता है...? क्या वह प्राग में जाकर कुछ कर पाता है...? फिल्म में इन्हीं सवालों के जवाब हैं।

वैसे हकीकत यह है कि आम दर्शक को ये सवाल ही नहीं, फिल्म में पेश किए गए जवाब भी बहुत जटिल मालूम पड़ेंगे। इसके बावजूद कहना होगा कि निर्देशक ने जटिल विषय पर पूरी पकड़ बनाए रखी है और अभिनेताओं का अभिनय भी अच्छा है।
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चंदन अपने रोल में पूरी तरह फिट हैं। एलिना विदेशी हैं और अपना रोल उन्होंने बखूबी अदा किया है। फिल्म भारतीय नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार को ध्यान में रख कर बनाई गई है। इसमें चेक, जर्मन, रूसी भाषा में भी संवाद और गीत हैं। फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत ‘बोटल खोल’ सेंसर की भेंट चढ़ गया है।
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