'पुलिसगीरी' 'दबंग', 'सिंघम', 'वान्टेड' और 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' के अलावा साउथ की कई सारी मसाला फिल्मों के कुछ अच्छे सीन निकालकर एक फिल्म बनाने की कोशिश की गई है। यह फिल्म संजय दत्त को उसी तरह से प्रोजेक्ट करती है जैसे कोई राजनीतिक दल अपने नेता को। जैसे इस फिल्म के बाद संजय दत्त को कहीं चुनाव लड़ने जाना हो।
इस फिल्म में संजय दत्त कहीं पर 'दबंग' के सलमान खान बन जाना चाहते हैं तो कहीं 'सिंघम' के अजय देवगन। जब वह अजय या सलमान नहीं बन रहे होते हैं तब वह रजनीकांत बने होते हैं। फिल्म में ठूंस-ठूंस कर एक्शन सीन डाले गए हैं। ऐसे एक्शन सीन जो कई बार कॉमेडी भी पैदा करते हैं।
एक्शन सीन की तरह ही फिल्म में रोमांस का एक ट्रैक डाला गया है ताकि यह भ्रम बना रहे कि गुंडों के साथ कारों को हवा में उछालने वाला यह इंसान दरअसल हिंदी फिल्म का हीरो भी है। जिसके पास एक अदद दिल है जिसे उसे एक लड़की पर हारना ही है।
चूंकि फिल्म में जानबूझ कर इतने सारे इंटरटेनिंग इलीमेंट डाले गए है कि यह पूरी तरह से दर्शकों को बोर नहीं करती। सिंगल स्क्रीन सिनेमा के फ्रंट बेंचर इस फिल्म को एंज्वॉय भी कर सकते हैं। कुल मिलाकर यह सोलो हीरो होने के बाद यह संजय दत्त की ऐसी फिल्म है जिन्हें उनके प्रशंसक भी याद नहीं रखेंगे।
कहानी गुंडे से निपटने की
देश के कई शहरों में ट्रांसफर के बाद जब रुद्रा (संजय दत्त) का तबादला हैदराबाद के एक कस्बे नागापुरम में होता है तब तक रुद्रा अपराधियों से निपटने के लिए अपना एक मैकेनिज्म विकसित कर चुका होता है। यहां काम करते-करते उसका सामना उस इलाके के खतरनाक अपराधी नगोरी (प्रकाश राज) से होता है।
शुरु में वह नगोरी से रिश्वत लेकर उसे अवैध काम करने देता है। लेकिन बाद में रूद्रा की नगोरी से यह लड़ाई व्यक्तिगत बन जाती है। फिल्म के क्लाइमेक्स रुद्रा उसी व्यक्तिगत लड़ाई का बदला नगोरी से लेता है। इस कहानी के साथ-साथ रुद्रा का शहर के साथ रोमांटिक ट्रैक भी है।
हर कलाकार किरदार से बाहर
संजय दत्त लंबे समय के बाद सोलो हीरो के रूप में किसी फिल्म में दिखे हैं। संजय दत्त की अपनी फैन फालोइंग हो सकती है लेकिन उनके यह फैन भी नहीं चाहतें कि वह फिल्म के हर फ्रेम में सिर्फ संजय दत्त को देखें। मारधाड़ करते संजय दत्त वैसे बुरे तो नहीं लगते लेकिन यह सब कुछ इतना बनावटी लगता है कि यह उबाने लगता है।
फिल्म की नायिका प्राची देसाई ने सिर्फ इसलिए इस फिल्म को साइन किया है कि उनके पास यह कहने को हो जाएगा कि वह कभी सोलो नायिका के रूप दिखी थीं। 'पुलिसगीरी' में संजय दत्त के साथ उनकी जोड़ी खीझ की हद तक उकताहट पैदा करती है। संजय दत्त की आधी उम्र की प्राची फिल्म में उनकी बेटी लगती भी हैं। विलेन बनने के साथ कॉमेडी करते प्रकाश राज लगे तो प्रभावी हैं लेकिन लगता है कि वह अपनी पिछली फिल्म को ही आगे बढ़ा रहे हैं।
साउथ फिल्मों जैसा निर्देशन
इधर साउथ के कुछ निर्देशकों को हिंदी फिल्मों में अचानक संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं। साउथ फिल्मों के चर्चित निर्देशक केएस रविकुमार ने इन्हीं संभावनाओं को तलाशते हुए पुलिसगीरी बनाई है। इस फिल्म में उन्होंने हर वह टोटका आजमाया है जो वह साउथ की फिल्मों में करते रहे हैं।
टीवी पर साउथ की हिंदी रीमेक फिल्मों को देखने वाले दर्शकों का एक बड़ा वर्ग है। उस वर्ग के लिए रविकुमार की यह फिल्म अच्छी लगेगी। लेकिन वह हिंदी फिल्मों के दर्शक तक अपनी बात नहीं पहुंचा पाते हैं। कलाकारों का चयन भी प्रश्न खड़ा करता है। साथ ही पुलिस और गुंडों के बीच बनीं दर्जनों फिल्मों की भीड़ में यह फिल्म मौलिक न होने की वजह से कहीं गुम हो जाती है।
कुछ गाने अच्छे
फिल्म के कुछ गाने अच्छे हैं। "चुरा के लेजा" और "झूम बराबर झूम" सुनने के साथ देखने में भी अच्छे लगता है। "बंदा शुद्घ है" गाना दबंग फिल्म के गाने हुड़ हुड़ दबंग से पूरी तरह से प्रभावित दिखता है।
क्यों देखें
जेल जाने के बाद संजय दत्त को सोलो हीरो के रूप में देखने के लिए।
क्यों न देखें
यह आप लाउड और ओवरऐक्टिंग से भरी फिल्में पसंद नहीं करते।