-निर्माता-निर्देशकः राकेश ओमप्रकाश मेहरा
-सितारेः हर्षवर्द्धन कपूर, सैयामी खेर, अनुज चौधरी, अंजली पाटिल
रेटिंग ***
राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म में वे दोनों बातें हैं, जिनका जिक्र उन्होंने मिर्जिया के आने से पहले किया था। वादियां दूधिया कोहरे की। बहती नदियां सदियों की। मिर्जिया दो स्तरों पर चलती है। एक तो विशाल खूबसूरत पेंटिंगों के जैसे दूर-दूर तक फैले कैनवास पर और दूसरी कैमरे की आंख से पकड़ी गई लोहारों की भट्टी से उठती सुनहरी आग की लपटों पर।
मेहरा ने अपने अंदाज में सिनेमा के बड़े फलक को पकड़ा है और इसमें उन्हें गुलजार जैसे लेखक का साथ मिला है। फिल्म की खूबसूरती आंखों को रिझाती है। सिनेमाई अंदाज-ए- बयां बीच ऑपेरा का लहजा भी लोच पैदा करता है। मिर्जिया के दो घंटे 10 मिनट उसके कैमरावर्क, भव्य फिल्मांकन और कहीं-कहीं छूने वाले गीत-संगीत के लिए याद रह जाते हैं।
Film Review Mirzya: बार-बार उन्हीं रास्तों पर लौटता प्रेम
फिल्म सदियों पहले मिर्जा और साहिबां के प्रेम के साथ शुरू होती है और जोधपुर में मुनीष (हर्षवर्द्धन) और सुचित्रा (सैयामी) तक पहुंचती है। एक क्लास में पढ़ते और एक बेंच पर बैठते। तिल के लड्डुओं और कॉपियों के लेन-देन के बीच पनपने वाले कोमल एहसासों में तब खून का रंग घुल जाता है, जब किशोरवय में कदम रखता मुनीष इसलिए टीचर को गोली मार देता है कि उसने सुचित्रा की हथेलियों को बेंत से लाल कर दिया। मुनीष को सुधार गृह में भेजा जाता है और सुचित्रा को उसके पुलिस अधिकारी पिता शहर से दूर ले जाते हैं।
वक्त करवट लेता है और सुचित्रा एक राजघराने के वारिस करन (अनुज चौधरी) की पत्नी बनने वाली है। मुनीष यहीं अस्तबल में घोड़ों की देखरेख करता है। वह सुधार गृह से भागा था और लोहारों की बस्ती में बड़ा हुआ। उसका नाम-पहचान बदल चुकी है। वह आदिल हो चुका है। मुनीष और सुचित्रा का फिर से मिलना कहानी में मोड़ लाता है।
Film Review Mirzya: बार-बार उन्हीं रास्तों पर लौटता प्रेम
मेहरा कई वर्षों से इस सवाल का जवाब तलाश रहे थे कि आखिर साहिबां ने मिर्जा के तीर क्यों तोड़ दिए थे, जबकि वह जानती थी कि उसके भाई मिर्जा तक पहुंचे तो जिंदा नहीं छोड़ेंगे? प्रेम कहानियां शायद इसीलिए सदियों तक जिंदा रहती हैं कि वे खुद को दोहराती हैं। उनके रास्ते, उनका चलन नहीं बदला। मुनीष और सुचित्रा की कहानी भी उसी दर्द के साथ खत्म होती है।
हर्षवर्द्धन और सैयामी के रूप में दो नए चेहरे सिनेमा के पर्दे पर आए। मेहरा ने उन्हें गैरपारंपरिक अंदाज में पेश किया है। वे रोमांटिक गाने गाते और नाचते हुए नहीं दिखते। इसमें संदेह नहीं कि सैयामी के हिस्से अपनी प्रतिभा दिखाने का अधिक मौका आया और उन्होंने इसका फायदा उठाया। वह आश्वस्त करती हैं कि लंबी रेस के लिए तैयार हैं।
राजकुमार करन बने अनुज प्रभावित करते हैं। अपने किरदार में वह बहुत संतुलित हैं। मेहरा की फिल्म किसी किताब के खूबसूरत कवर की तरह है, जो सहज लुभाता है। हालांकि पढ़ते हुए कुछ कसक बाकी रह जाती है।