लीजिए, सुपरहीरो फिर हाजिर। कृष्णा मेहरा उर्फ कृष। निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन देसी सुपरमैन के साथ पूरी तरह भारतीय संवेदनाओं वाली कहानी लाए हैं। पति-पत्नी के रोमांस, पारिवारिक रिश्तों, एक्शन और ड्रामे से भरपूर।
कृष-3 सही मायनों में अपनी पिछली फिल्म (कृष) की कहानी को आगे लेकर जाती है। जिन्होंने ‘कोई मिल गया’ और ‘कृष’ देखी है, उन्हें यह फिल्म देखने में मजा आएगा। जो उन फिल्मों को नहीं देख सके थे, उनके लिए भी यहां पर्याप्त रोमांच है। कुछ दम साध कर देखने वाले ऐक्शन सीन यहां हैं। पिता-पुत्र के रिश्ते की कुछ भावुक बातें यहां हैं। तकनीक के मामले में फिल्म किसी हॉलीवुड कृति से कम नहीं है।
फिल्म कृष (रितिक रोशन) के बहादुरी भरे कारनामों की कहानी है, जिसमें वह हजारों जिंदगियां बचाता है। यह फिल्म खलनायक काल (विवेक ओबेराय) की भी कहानी है, जिसके लिए इंसानी जिंदगी कुछ नहीं। इंसान जिसके लिए कीड़े-मकोड़े हैं। वह नई दुनिया बनाना चाहता है, जहां लोग सिर्फ उसके गुलाम हों। अच्छाई और बुराई की यहां जबर्दस्त जंग है। जिसमें सुपरहीरो की जान पर तक बन आती है। लेकिन किस्सागोई इसीलिए अच्छी लगती है कि अंततः बुराई की चिता अच्छाई के हाथों जलती है।
यूं तो ‘कृष-3’ सुपरहीरो की कहानी है, लेकिन सच पूछिए तो उसके बारे में हम सब पहले से जानते हैं। हमें यह भी मालूम है कि वह कठिन से कठिन परिस्थिति में जीतने वाला है। इस फिल्म की असली ताकत काल है। जिसके बारे में जानने की उत्सुकता लगातार बनी रहती है। काल अपंग है। गर्दन के नीचे उसका शरीर हिल तक नहीं पाता। परंतु उसने अपनी मानसिक शक्ति को इस तरह साध लिया है कि अपने विचारों से हर चीज को नियंत्रित करता है।
काल जीनियस वैज्ञानिक है, जिसने अपने प्रयोगों के द्वारा ऐसे जीव तैयार किए हैं, जो आधे मानव और आधे जानवर हैं। ये ‘मानवर’ काल की ताकत हैं। काल कौन है? वह ऐसा क्यों है? आखिर वह क्या चाहता है? कृष से उसकी दुश्मनी क्यों है? कृष को कैसे वह घुटनों पर ले आता है? कई सवाल फिल्म को रोचक और दर्शनीय बनाते हैं। विवेक ओबेराय के कैरियर की यह अनूठी भूमिका है।
यही बात कंगना रनौत के बारे में कही जा सकती है। वह काल के द्वारा तैयार की गई आधी इंसान और आधी पशु है। नाम हैः काया। उसके पास रूप बदलने की ताकत है। कंगना ने बहुत खूबसूरती से इस रोल को निभाया है। कंगना की यह भूमिका उनके कैरियर को नई ऊंचाई देती है।
रितिक रोशन ने अपनी तीनों भूमिकाएं (पिता, पुत्र और कृष) खूबसूरती से निभाई हैं। उन्होंने मेहनत से काम किया है और वे बच्चों को भी आकर्षित करेंगे। प्रियंका चोपड़ा के हिस्से कुछ खास अलग नहीं था। यह बात समझ नहीं आती कि बॉलीवुड के निर्देशक और कितने वर्षों तक हीरोइनों को टीवी पत्रकार की ही घिसी-पिटी भूमिका देते रहेंगे! इधर हर दूसरी हीरोइन फिल्मों में माइक थामे दिखती है।
राकेश रोशन की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने हर स्तर पर फिल्म पर नियंत्रण रखा है। फिल्म के हर विभाग में संतुलन है। ‘कृष-3’ बांधती है। रोचक बनी रहती है। कुछ ऐसे दृश्य भी हैं जिनकी साधारण फिल्मकार कल्पना तक नहीं कर सकता। फिल्म में अगर कोई कमजोर पक्ष है तो इसका गीत-संगीत।
वह न होता तो बेहतर रहता। मगर निर्देशक को लगता है कि गीत-संगीत फिल्म की भारतीयता को बढ़ाते हैं, तो उसे बेहतर और कर्णप्रिय होना चाहिए। खैर, यह फिल्म इसके गीत-संगीत के लिए देखने की जरूरत भी नहीं। फिल्म कृष के लिए देखें। काल और काया के लिए देखें। बॉक्स ऑफिस पर यह दीवाली इन्हीं की है।