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चायना का माल भी लग सकती है 'मिक्की वायरस'

Fri, 25 Oct 2013 03:58 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला,मुंबई
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चोरों को पकड़ने के लिए चोरों की जरूरत! कंप्यूटर हैकिंग की दुनिया में सेंध मारने का यही फंडा है।
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इसीलिए दिल्ली पुलिस जब राजधानी में दो विदेशी हैकरों की हत्या का रहस्य सुलझा नहीं पाती तो उसे ऐसे हैकर की जरूरत महसूस होती है जो तेज दिमाग, शातिर और चालाक हो... यानी थ्री इन वन।

एसीपी सिद्धांत (मनीष चौधरी) की नजर तब मिकी अरोड़ा (मनीष पॉल) पर पड़ती है और वह उसे साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर अपने लिए काम करने को राजी कर लेता है।
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इससे पहले कि मिकी पुलिस के लिए काम शुरू करे उसकी जिंदगी में एक लड़की कामायनी (एली अवराम) आ जाती है। लड़की के साथ मुसीबत भी आती है।

यह तब दोहरी हो जाती है जब मिकी को पता चलता है कि पुलिस के लिए उसे जिस भ्रम नाम के हैकर गैंग से लड़ना है, वह जिन्हें निशाने पर लेता है उन्हें ऊपर पहुंचा कर ही रहता है।

कहानी में एक के बाद एक मोड़ आते हैं। राज खुलते हैं और मिकी फंसता जाता है। मिकी वायरस एक तय उम्र, तय समझ और कंप्यूटर की दुनिया के कीड़ों के लिए है। सबके लिए नहीं। जहां तक कहानी का सवाल है, वह रोचक है लेकिन उसमें कसावट नहीं है।

हैकिंग की कहानी के थ्रिल में मिकी और कामायनी के प्रेम प्रसंग का वायरस घुस जाता है। उस पर एली अवराम शुरुआती दृश्यों में अनाकर्षक और बनावटी मालूम पड़ती हैं।

छोटे पर्दे पर इन दिनों बिग बॉस के घर में दिख रहीं एली कुल मिला कर निराश करती हैं। इस फिल्म में उन्हें देखकर सलमान खान बहुत निराश होंगे।

मनीष पॉल अपनी पहली फिल्म में आत्मविश्वास से भरपूर हैं। मिकी के किरदार में फिट हैं। उनका अभिनय प्रभावी है। वे अपनी आंखों से भी बात करते हैं। बिंदास अंदाज वाली मिकी की दोस्त बनीं पूजा गुप्ता तमाम किरदारों के बीच अपनी मौजूदगी का एहसास कराती हैं।

उनका किरदार कुछ और बड़ा होता तो फिल्म के लिए फायदेमंद रहता। मनीष चौधरी जमे हैं। जबकि इन सबके बीच वरुण बडोला सबसे अलग अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। फिल्म का गाना प्यार चाइना का माल है... अच्छा है।

जबकि एक्शन दृश्य कमजोर हैं। निर्देशक के रूप में यह सौरभ वर्मा की पहली फिल्म है। पहले वह बॉलीवुड की कई बड़ी फिल्मों से जुड़े रहे हैं। कुछेक दृश्यों और कहानी की कसावट में कमी के अतिरिक्त साफ है कि माध्यम पर उनकी पकड़ है। यह फिल्म दर्शक को कॉमिक रीडिंग का सा एहसास देती है।
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अगर आप कॉमिक पढ़ने की उम्र से आगे नहीं बढ़े हैं और आपके भीतर कभी किशोरावस्था मचलती है तो इस फिल्म को देखें। वर्ना फिल्म आपको चायना माल की तरह भी लग सकती है।
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