फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जॉन डेः समीक्षा पढ़े और तय करें देखना है या छोड़ना

Fri, 13 Sep 2013 01:41 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
विज्ञापन
विज्ञापन
एक संत और एक शैतान। एक बैंकर और एक पुलिसवाला। फिल्म ‘जॉन डे’ व्यक्ति और व्यक्तित्व के विपरीत पहलुओं को उठा कर बुनी गई कहानी है। जैसा कि हमेशा होता है, सदा जीतने वाला शैतान अंत में हार जाता है। वह यहां भी है।
विज्ञापन


‘जॉन डे’ एक थ्रिलर है। जो अच्छी शुरुआत के बाद भटक जाती है। एक बैंक में लूट और उस लूट में गायब हुई एक फाइल कहानी में रोमांच पैदा करते हैं। ‘कासाब्लांका प्रोजेक्ट’ की फाइल विदेशी भू-माफिया और देसी राजनीतिक गठजोड़ का सुबूत है।

यह आठ एकड़ में एक रिहायशी परियोजना की फाइल है। लेकिन जैसे फाइल गायब होती है, वैसे ही फिल्म में रोमांच भी अंत से पहले गायब हो जाता है। फिल्म एक बैंकर द्वारा अपनी बेटी की एक दुर्घटना में असामयिक मौत के बदले की कहानी बनकर रह जाती है। जिसमें सारे खलनायक एक-दूसरे को गोली मार कर मर जाते हैं।
विज्ञापन


निर्देशक अहिशर सोलोमन अच्छे अभिनेताओं से अच्छा काम कराने के बावजूद ऐसी फिल्म बनाने में नाकाम हैं जो दर्शकों का मनोरंजन कर सके या उन्हें रोमांचित कर सके। यह ईश्वर से डरने वाले जॉन डे (नसीरूद्दीन) के जानवर बन कर दुश्मनों से बदला लेने की दास्तान है।

नसीर मंजे हुए अभिनेता हैं, उन्होंने फिर साबित किया है। लेकिन ‘मानसून वेडिंग’ से शुरुआत करने वाले रणदीप हूडा लगता है गैंगस्टर और पुलिसवाले की भूमिका में बंध गए हैं। निर्माता-निर्देशक इन दो के अलावा उन्हें किसी और रूप में देख नहीं पा रहे।

ऐसे में उनके काम की विविधता भी खत्म हो रही है। वे इस फिल्म में गौतम नाम के भ्रष्ट पुलिस अधिकारी हैं, जो एक त्रासद अतीत के साथ अनाथ के रूप में चर्च की देख-रेख में पला-बढ़ा।

जर्मन-रूसी मूल की एलिना कजान फिल्म में शराब में डूबी रहने वाली नायिका हैं। जो फिल्म की तरह ही प्रभाव नहीं छोड़ती। ऐसे में अगर आप कोई फिल्म देखने का मूड बना रहे हैं तो इस फिल्म को किसी और दिन के लिए रखा जा सकता है!
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें