'गिप्पी' फिल्म के वही हिस्से अच्छे हैं जो फिल्म के ट्रेलर और प्रोमों में दिखते हैं। प्रोमो से एक नए विषय पर बनी कॉमिक और जज्बाती लगने वाली यह फिल्म असल में फिल्मों के एक घिसे-पिटे ट्रैक को ही अपनी मूल कहानी बना लेती है। फिल्म की मूल कहानी को यदि नजरंदाज कर दे तो बाकी के कुछ किस्से मजेदार लग सकते हैं। लेकिन क्या किसी फिल्म से कहानी को नजरंदाज किया जा सकता है?
करन जौहर बैनर की यह फिल्म उन्हीं की एक फिल्म 'स्टूडेंट्स ऑफ द ईयर' का बच्चा वर्जन लगती है। वहां कॉलेज में स्टूडेंट्स ऑफ द ईयर बनने की कहानी है यहां स्कूल में। दोनों ही जगह जीतने वाला महान बनकर अपनी जीत को ठुकरा देता है। इस फिल्म की नायिका 14 साल की एक मोटी लड़की है।
क्लासरूम और स्पोर्ट्स ग्राउंड में गिर-गिर जाने वाली कहानी की नायिका गिप्पी को अभी पीरियड नहीं आए हैं लेकिन वह अपने से बड़ी उम्र के ब्वॉयफ्रेंड के साथ रोमांस करना चाहती है।
करन जौहर की फिल्मों को देखकर लगता है कि वह उन्हें यथार्थ दिखाने से गहरी चिढ़ है। करन जौहर अपनी इस फिल्म में एक पत्नी को अपनी पति की दूसरी शादी में खुशी-खुशी फोटो खिचवाते हुए दिखा देते हैं।
एक मां अपनी 14 साल की लड़की को उसकी पहली डेट पर भेजने के लिए तैयार करती है। पता नहीं यह सब भारत के किस हिस्से में होता हैं पर जहां हम और हमारे दर्शक जी रहे कम से वहां तो नहीं।
कहानी गिप्पी की समस्याओं की
गुरप्रीत कौर उर्फ गिप्पी (रिया विज) शिमला में अपनी मां पप्पी (दिव्या दत्ता) के साथ रहती है। उसके पिता (पंकज धीर) एक दूसरी शादी कर रहे होते हैं। आमतौर पर हंसमुख रहने वाली गिप्पी की जिंदगी में कई समस्याएं हैं। वह मोटी है। पढ़ाई में औसत है। बातचीत में स्मार्ट नहीं है। कोई ब्वॉयफ्रेंड नहीं है।
गिप्पी को अपनी क्लासमेट शमीरा (जयती मोदी) से चुनौती मिलती रहती है। एक दिन गिप्पी की मुलाकात अपने से उम्र में बड़े एक लड़के अर्जुन (ताहा शाह) से होती है। गिप्पी उसे अपना ब्वॉयफ्रेंड मान लेती है। पर अर्जुन उसे अपनी गर्लफ्रेंड नहीं मानता। इस बात से गिप्पी टूट जाती है।
इसी बीच स्कूल में हेड गर्ल का इलेक्शन होना होता है। शमीरा के उकसाने पर गिप्पी चुनाव में खड़ी हो जाती है। वह खुद को बदलने की कोशिश करती है। इस बदलाव के बीच गिप्पी महसूस करती है कि वह अपने स्वभाव में भी बदलाव कर रही है। अब वह पहले जैसी खुले दिल की लड़की नहीं रही। चुनाव में गिप्पी जीत तो जाती है लेकिन वह हेड गर्ल शमीरा को ही बना देती है।
ओवरऐक्टिंग किसी ने नहीं की
गिप्पी के किरदार में रिया विज ने बेहतरीन ऐक्टिंग की है। खासकर उन दृश्यों में जहां गिप्पी अपने को बदलने की कोशिश रही होती है। गिप्पी की मासूमियत और भोलेपन के साथ दर्शक जुड़ते हैं। एक मॉर्डन लड़की शमीरा का किरदार जयती मोदी ने भी अच्छे तरह से निभाया है।
दिब्या दत्त हमेशा की तरह प्रभावित करती हैं। छोटे से रोल में ताहा शाह और पंकज धीर भी ठीक-ठाक हैं। स्कूली बच्चों के बाकी किरदार वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाते जैसा 'तारे जमीं पर' और 'स्टेनली का डिब्बा' जैसी फिल्मों में दर्शक देख चुके होते हैं।
करन को कॉपी करने की ख्वाहिश
'सात खून माफ' और 'वेकअप सिड' जैसी फिल्मों में क्रिएटव रूप से जुड़ी हुई सोनम नायर की निर्देशक के रूप में पहली फिल्म है। अपनी पहली फिल्म से सोनम निराश नहीं करती हैं लेकिन उनकी पूरी फिल्म मेकिंग में करन जौहर की नकल रिफलेक्ट हुआ करती है। कई दृश्यों को देखकर तो ऐसा लगता है कि वह यह दृश्य करन जौहर को खुश करने के लिए दिखा रही हैं।
14 साल की एक किशोरी की मनःस्थिति पर खूबसूरत हास्य के कई सीन क्रिएट किए जा सकते थे। स्कूल में हेड गर्ल बनने की दौड़ के अलावा कुछ ऐसा प्लाट रखा जा सकता था जो लोगों को ज्यादा अपीलिंग लगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने फिल्म में वही प्लाट लिया जहां चीजों को यथार्थ से दूर रखकर भड़कीला दिखाया जा सके।
गाने अच्छे
फिल्म का संगीत बेहतर है। उदित नारायण अर्से बाद कोई गाना गा रहे है। उनका गाया हुआ "बेबी डॉल" गाना अच्छा लगता है। खासकर उसका देशी अंदाज। विशाल ददलानी का गाया हुआ "वी आर लाइक दिस ओनली" भी सुनने में अच्छा लगता है। "मन बावरा" और "दिल कागजी" गाने भी निराश नहीं करते।
क्यों देखें
14 साल की एक मोटी लड़की गिप्पी की कहानी देखने के लिए।
क्यों न देखें
अगर आप सोच रहे हों कि यह फिल्म एक टीन-एज लड़की की समस्याओं को यथार्थ तरीके से दिखाएगी।