'शूटआउट एट वडाला' एक लंबी और उलझी हुई फिल्म है। फिल्म में इतने चरित्र और उपकथाएं भर दी गयी हैं कि दर्शक समझ ही नहीं पाते कि वह किसके साथ खड़े हों और किसके खिलाफ। कौन उनका हीरो है और उनका दुश्मन। फिल्म की मूल कहानी से ज्यादा लंबी उसकी उपकथाएं और फ्लैशबैक हैं। एक बड़ा खोट और है। यह एक कन्फ्यूज्ड फिल्म भी है। पूरी फिल्म जिसे हीरो के रूप में दिखाती है क्लाइमेक्स में उसी के मरने पर जश्न मनाने के लिए दर्शकों को उकसाती जान पड़ती है।
हुसैन जैदी कि किताब 'डोंगरी टू दुबई' पर आधारित यह फिल्म एक हिंदु अडंरवर्ल्ड डॉन मान्या सर्वे की कहानी कहती है। इस कहानी के सभी पात्रों को सत्य बताया गया है। फिल्म में जहां-जहां हिंदु वर्सेज मुस्लिम डॉन के बीच टकराव की नौबत बनती है दर्शकों को वह हिस्से अच्छे लगते हैं, लेकिन अफसोस कि इन हिस्सों पर फोकस न करते हुए पूरी फिल्म सिर्फ पात्रों के महिमामंडन में खर्च होती रहती है।
हर पात्र को जब इंट्रोड्यूस किया जाता है तो दर्शकों को बिना मतलब कि एक ऐसी लड़ाई देखनी पड़ती हैं जहां खूब सारी बोतलें और कुर्सी मेज टूटती हैं। पिटता कौन है दर्शक जान नहीं पाते। 'शूटआउट एट वडाला' देखने में तो भव्य लगती है पर उसकी भव्यता दिशाहीन है।
कहानी डॉन और उसके इनकाउंटर की
यह फिल्म मनोहर उर्फ मान्या सर्वे (जॉन अब्राहम) के आम आदमी से डॉन बनने की कहानी है। परिस्थितियां उसे डॉन बनाती हैं। जब वह एक बार डॉन बन जाता है तो जाहिर है कि उसका टकराव पहले से जमे-जमाएं डॉन से होगा। यहां मान्या का टकराव हसर भाईयों (मनोज बाजपेई और सोनू सूद) से होता है। वर्चस्व की इस जोर आजमाइश का तीसरा सिरा मुंबई पुलिस के हाथ होता है।
मुंबई पुलिस का एक ईमानदार एसपी (अनिल कपूर) अपने दो साथियों (रोनित रॉय और महेश मांजरेकर) के साथ मुंबई के अंडरवर्ल्ड को पूरी तरह से साफ करना चाहता है। इन तीनों के बीच ही शह और मात का खेल चला करता है। मान्या हसर भाईयों में बड़े जुबैर हसर (मनोज बाजपेई) को मार देता है। फिल्म के क्लाइमेक्स में बचकाने ढंग से पुलिस मान्या सर्वे का इनकाउंटर कर देती है।
हर कलाकार रोल में फिट
मान्या सर्वे का किरदार जॉन अब्रॉहम के लिए चुनातीपूर्ण था। कुछ दृश्यों को छोड़कर जॉन इस रोल के लिए फिट ही बैठे हैं। हां, उनके पास ऐसे डायलॉग्स या प्रभावी सीन कम थे जो उन्हें एक डॉन के रूप में स्थापित करें। एक ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में अनिल कपूर प्रभावित करते हैं। उनकी यह भूमिका, उनकी पिछली फिल्म 'तेज' जैसी है।
तुषार कपूर के लिए अच्छी बात यह रही कि कलाकारों की इस भीड़ में वह अपने को गुम होने से बचा लेते हैं। मनोज बाजपेई और सोनू सूद के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं था। मनोज अपने चिरपरिचित हंसी के साथ ठहर-ठहर कर संवाद बोलते हैं और सोनू सूद की आंखें जब तक गुस्से से लाल होती रहीं। जॉन अब्राहम की प्रेमिका बनीं कंगना रणावत हमेशा की तरह दिखीं।
निर्देशक पर हावी दिखा प्रोड्यूसर
संजय गुप्ता के नजरिए से यह उनकी अब तक सबसे भव्य फिल्म है। कलाकारों की संख्या देखें तो यह बात सही लगती भी है। लेकिन यदि इसे दर्शकों को नजरिए से देखें तो फिल्म का यही बड़ा कैनवास स्क्रिप्ट के कसेपन को कुतर देता है। हर कलाकार को स्थापित करने में उन्होंने मूल कहानी को लगभग अंडरप्ले कर दिया है। 'कांटे', 'जिंदा', ''मुसाफिर' और 'प्लान' जैसी फिल्में निर्देशित करने वाले संजय, इस फिल्म में गैंगस्टर फिल्मों के बने-बनाए नुस्खों पर ज्यादा एतबार करते दिखे हैं।
फिल्म में ऐसे सीन बहुत कम हैँ जो अपने नएपन से लोगों को चौंका दें। फिल्म में द्विअर्थी संवादों की जगह न होते हुए भी संजय किसी खास वर्ग को खुश करने के लिए उन संवादों को फिल्म में ठूंसते दिखे। संजय का प्रोड्यूसर चेहरा उनके निर्देशक चेहरे पर जगह-जगह हावी होता दिखा।
गाने तो पहले ही हिट हैं
फिल्म रिलीज से पहले फिल्म के गाने फिल्म से ज्यादा चर्चित रहे हैं। फिल्म में तीन आयटम सॉन्ग हैं जिसमें "लैला तेरी लुट लेगी" सुनने और देखने में सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। सनी लियोन भले ही अच्छा डांस न कर पायी हों लेकिन गाने में वह अच्छी लगती हैँ। "बबली बदमाश" गाने पर प्रियंका चोपड़ा का डांस और सुनिधि चौहान की आवाज तो अच्छी है पर गाने के लिरिक्स का चुटीलापन सिर्फ मुखड़े तक ही सीमित है। "आला रे आला" और "आए मान्या" गाने औसत हैं।
क्यों देखें
यदि आपको मार-पीट के दृश्यों के साथ गैंगस्टरों की बोली-भाषा अच्छी लगती हो। साथ ही कुछ चर्चित आयटाम सॉन्ग के लिए भी।
क्यों न देखें
यह अंडरवर्ल्ड पर ऐसी कसी हुई फिल्म नहीं है जो आपको मंत्रमुग्ध कर दे।