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फिल्म रिव्यूः सिटी लाइट्स में बहुत कुछ है देखने के लिए

Fri, 30 May 2014 12:23 PM IST
रवि बुले/ अमर उजाला, मुंबई
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मुंबई के बारे में मिथक है कि यहां हर हाथ को काम मिलता है और कोई भूखे पेट नहीं सोता। इन मिथकों ने इस महानगर की जगमग को इतना रोशन किया है कि अंधेरे तक उसमें ढंक जाते हैं। निर्देशक हंसल मेहता इसी मिथक के साथ खेलते हुए मुंबई की क्रूरता को निर्मम ढंग से आपके सामने पेश करते हैं।
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फिल्म शुरू होते ही पहले दस मिनट में आपको दिखाती है कि यह निजी हादसों का शहर है। जहां राजस्थान के एक दूरदराज के गांव से आए पति-पत्नी को लोग किराये पर मकान दिलाने के बहाने दिन-दहाड़े ठग लेते हैं। इसके बाद शुरू होता है इस दंपती की मुश्किलों और अपमान का अंतहीन सिलसिला। सिटी लाइट्स गरीबों के अभावग्रस्त जीवन पर महानगरों का निर्लज्ज अट्टहास दिखाती है।

हंसल ने जीवन की बारीकियों को यहां दर्ज किया है। उन छोटे शहरों की सच्चाई भी यहां है, जहां सिवा दबंगों के किसी की नहीं चलती। इन शहरों से पलायन करके लोग उम्मीदें और सपने लिए जब मुंबई आते हैं तो वह इनकी शरणस्थली बनने के बजाय कब्रगाह साबित होती है। हंसल सवाल उठाते हैं कि महानगर में जो लोग हमारे आस-पास दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, हम उनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं!
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उनके जीवन में झांकने की किसे फुर्सत है? गांव से आने वाले दीपक (राजकुमार राव) और राखी (पत्रलेखा) का रोजगार के लिए भटकना, यहां-वहां हाथ फैलाना और अपनी मजबूरियों के आगे असहाय होकर घुटने टेक देना इस फिल्म में पूरी संवेदना के साथ दिखाया गया है। राखी का एक बार में काम मांगने का दृश्य आपको पहले तो चौंकाता है, लेकिन दो पल के बाद उसका प्रभाव निशब्द कर देता है।

फिल्म इस सदी में पूरे देश और दुनिया में हो रहे सामूहिक मानव-विस्थापन की ऐसी कथा है, जिसमें ढेर सारा दर्द छुपा है। सिटी लाइट्स फिलिपीनी फिल्म ‘मैट्रो मनीला’ (निर्देशकः सीन एलिस) का आधिकारिक हिंदी रीमेक है। इसे खूबसूरती से भारतीय रंग-रूप और संवेदनाओं में ढाला गया है। जिसका श्रेय हंसल मेहता को तो है ही, लेकिन राजकुमार राव और पत्रलेखा भी इसके बराबरी के हिस्सेदार हैं।

राजस्थानी दंपति की भूमिका में दोनों बहुत सहज लगे हैं। हंसल और राजकुमार की जोड़ी ने जो कमाल ‘शाहिद’ में पैदा किया था, वह इस फिल्म में भी बरकरार है। फिल्म का गीत-संगीत मधुर है और पूरी तरह से कहानी के समानांतर चलता है। ऐसा बहुत दिनों के बाद किसी फिल्म में देखने को मिला है। सिटी लाइट्स आखिरी मिनटों में अपराध और थ्रिल कथा की ओर मुड़ती है। मगर जब तक आप इस दंपती के दर्द से दूर हो जाएं, उससे पहले समाप्त हो जाती है। अतः आप फिल्म के पूरे प्रभाव के साथ सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं।
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