जेम्स बॉन्ड जैसा क्राइम रिपोर्टर
ज अक्षर वाले लोगों की दिनचर्या जेम्स बॉन्ड जैसी ही होती होगी, ये तो कहना मुश्किल है लेकिन यहां फिल्म ‘डिस्पैच’ का किरदार जॉय बाग किसी जेम्स बॉन्ड से कम नहीं है। हसीनाएं उसकी कमजोरी हैं। बीवी के साथ हमबिस्तर होते ही भले उसे कॉन्डम की याद आती हो लेकिन बाहर वह पार्किंग का शेर कहलाता है। पहला मौका मिलते ही सामने दिखी स्त्री के साथ हम बिस्तर हो जाने वाला ये क्राइम रिपोर्टर ऐसे कई गुल पूरी फिल्म में खिलाता है और फिल्म चूंकि सिर्फ वयस्कों के लिए हैं लिहाजा बाग-बाग होकर खिलाता है। ‘सैक्रेड गेम्स’ के बाद ओटीटी पर ये पहली ही फिल्म होगी, जिसमें दैहिक रिश्तों का फिल्मांकन इतने बिंदास तरीके से और इतनी लंबी अवधि के लिए किया गया है। जॉय जेम्स बॉन्ड इसलिए भी है कि मन करते ही वह मुंबई से गुरुग्राम की तो क्या लंदन तक की फ्लाइट पकड़ लेता है। न ट्रेवल डेस्क की परमीशन, न अकाउंट्स से एडवांस की झिक झिक और न घर से एयरपोर्ट तक जाने के लिए टैक्सी के भाड़े की चिंता, पत्रकारों की आम दिक्कतों से ये कब का ऊपर उठ चुका है! तेवर इसके टेस्ला वाले हैं, हां, चलता ये पुरानी मोटर साइकिल पर है..!
हीरो का दर्शकों से नाता नहीं बैठा
खैर, इससे अपने को क्या? ये कनु बहल का बनाया पत्रकार है। क्राइम जर्नलिस्ट है। कैमरा लेकर रात में ‘शहंशाह’ की तरह रिपोर्टिंग करने निकलता है। नाक तुड़वाता है। गोली खाते बचता है। फिर भी भाई का जलवा शहर में ऐसा है कि पुलिस की हवालात के भीतर जाकर आरोपित पर खुद ही लाठी भी बरसा लेता है..! पता नहीं जे डे का ऐसा रौला मुंबई में रहा कि नहीं लेकिन साल 2012 (जे डे की हत्या 2011 में हुई) की कहानी कहती फिल्म ‘डिस्पैच’ की पटकथा का रौला करीब ढाई घंटे की पूरी फिल्म देखते समय एक बार भी बनता नजर नहीं आया। हां, कहानी में काम के साथ साथ परिवार की परेशानियां मिलाने का अब इंटरनेशनल हो चला ढर्रा यहां भी कनु बहल और उनकी सहायक लेखिका इशानी ले लाए हैं। लेकिन, बीवी से तलाक लेने की कोशिश कर रहे, एक गर्लफ्रेंड के साथ मुफ्त के फ्लैट में रह रहे और पुरानी गर्लफ्रेंड के साथ भी मौका मिलते ही हमबिस्तर हो रहे इस ‘हीरो’ का दर्शकों से नाता क्या है? बस यही कि वह एक बड़े स्कैम का पर्दाफाश करने निकला है और अपने ही बनाए दलदल में फंसता चला जाता है? असल में जो भी है सिनेमा में तो हीरो का कोई मोरल, गंदा ही सही, पर होना तो चाहिए।
गालियों से फिल्म को ‘कूल’ बनाने की कोशिश
कहानी, पटकथा में फेल फिल्म ‘डिस्पैच’ के संवादों में तड़का लगाने के लिए कनु बहल ने मुक्त हस्त से मां, बहन को इज्जत बख्शी है। फिल्म ‘तितली’ और ‘आगरा’ से कनु की शोहरत ऐसी बनी है कि वह जो भी बनाएंगे, ‘क्लासिक’ ही होगा, लेकिन माफ करना, कनु! क्लासिक सिनेमा बनाने के लिए गालियों और सेक्स सीन्स की नहीं, एक दमदार कहानी, कुछ दर्शकों को कचोटते किरदार और एक अंतर्धारा चाहिए होती है जो देखने वाले को अपने आसपास के बारे में सोचने पर मजबूर कर दे। कहने को यहां टू जी स्कैम है। आईपीएल सरीखे मैचों का देश से भागकर लंदन में बैठा मुखिया है। दक्षिण का एक कारोबारी है जिसकी आईपीएल मे चार टीमें हैं। लेकिन, मुंबई में हिंदी अखबार में काम करन वाले शुरू से अंग्रेजीदां रहे हैं, कनु अंग्रेजी में काम करने वालों से हिंदी में बातें करवाकर काम चला रहे हैं। ठीक है जॉय बाग बंगाली है तो पहली बार घर आने पर उसकी गर्लफ्रेंड को उसकी मां मछली ही खिलाने की कोशिश करेगी, लेकिन अपनी आखिरी इच्छाएं समझा रहा बेटा एक बार को तो बंगाली में मां और भाई से बात करेगा!
मनोज से मनोज पर मनोज लिखते मनोज
मनोज बाजपेयी ओटीटी के सुपरस्टार रहे हैं। ‘फैमिली मैन’ का अगला सीजन आएगा तो हो सकता है फिर से उनके सितारों की रिन जैसी चमकार हो जाए लेकिन अभी तो फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ के बाद से वह अपने चाहने वालों का इम्तिहान ही लेते जा रहे हैं। कितना धीरज रखेगा आखिर कोई? ‘साइलेंस 2’ तो उनके घर के ओटीटी जी5 ने ही बनाई। उनके चाहने वालों ने उनकी चाहत में सिनेमाघर जाकर ‘जोरम’ और ‘भैयाजी’भी देखी। और, अब ‘डिस्पैच’। एक ही फिल्म में इतना भोग विलास मनोज बाजपेयी की छवि के अनुरूप नहीं रहा। ये कहा जा सकता है कि ये किरदार उनको ऐसा मिला कि उन्हें ‘पार्किंग का शेर’ बनना ही पड़ा लेकिन उनकी अपनी ब्रांडिंग को ऐसे किरदार ही कमजोर करते हैं।
अव्वल नंबर अर्चिता अग्रवाल
फिल्म ‘डिस्पैच’ में तमाम जाने पहचाने चेहरे भी एक-एक दो-दो सीन के लिए हैं। मामिक को अरसे बाद परदे पर देखना सुखद रहा। किरदार भी करीने से निभाया उन्होंने। शहाना गोस्वामी का काम उस सीन में सबसे जबर्दस्त है जिसमें वह घर लौटे जॉय को रिझाने की पूरी कोशिश करती है, उसके साथ हमबिस्तर होने की कोशिश करती हैं। इसके बाद जॉय का पीछा करते होटल में पहुंचने पर पति से दुत्कारी गई स्त्री के चेहरे के जो भाव उनके चेहरे पर आए हैं, वह नोट करने लायक हैं। अर्चिता अग्रवाल इस फिल्म की असल हीरोइन हैं। वह खूबसूरत हैं। काबिल अदाकारा हैं और बिंदास हैं। सिनेमा के बदलते समय चक्र के लिए जरूरी सारी खूबियां उनमें हैं। फिल्म उनके लिए अच्छी शोरील बनी है। भविष्य उनका उज्ज्वल है। ऋतुपर्णा सेन का री सेन के रूप में नया रंग रूप दर्शकों को चौंकाने के लिए है, पर बेअसर है। वीना मेहता, पुर्णेंदु भट्टाचार्य, पृथ्विक प्रताप, अजय पुरकर और पार्वती सहगल, सब उस एक सीन के इंतजार में ही रहे जो उन्हें दर्शकों के लिए कुछ तो यादगार करने का मौका दे जाता।
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कहां गई स्नेहा के संगीत की वो खनक?
तकनीकी रूप से फिल्म बहुत चमत्कारिक नहीं है। कनु बहल की अर्धांगिनी व संगीतकार स्नेहा खानविलकर के पास इस फिल्म में महाराष्ट्र, बंगाल, लंदन और हरियाणा की संगीत तंरगों का इंद्र धनुष बनाने का सुनहरा मौका था, लेकिन अब उनका काम बस काम होता जा रहा है। सिद्धार्थ दीवान ने कैमरे के जरिये दर्शकों को कहानी के साथ लाने की पुरजोर कोशिश की है लेकिन इसके किरदार ही बार बार दर्शकों को कहानी से दूर धकेलते रहते हैं। एक किरदार फिल्म में ऐसा नहीं है जिसके साथ होकर दर्शक कहानी में साथ साथ घूम पाते। समर्थ दीक्षित ने सीन जमाने के चक्कर में फिल्म बहुत सुस्त कर दी है। ये पूरी फिल्म 90 मिनट की एक कमाल ओटीटी ओरिजिनल फिल्म अब भी बन सकती है। अगर फिल्म को अपने घर के बड़े वाले टीवी पर देखने की योजना बना रहे हैं तो ध्यान रखें कि बच्चे आसपास न हों। वयस्क हैं और मॉडर्न बनने के चक्कर में माता-पिता के साथ भी एडल्ट्स फिल्में देख लेते हैं तो यहां थोड़ा बचके रहना, नहीं तो सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।