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Jaaiye Aap Kahan Jaayenge Review: करण आनंद के अभिनय का दिखा असली रंग, शौचालयों की समस्या पर बनी मार्मिक फिल्म

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'जाइए आप कहां जाएंगे' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
जाइए आप कहां जाएंगे
कलाकार
करण आनंद , संजय मिश्रा , मोनल गज्जर , इश्तियाक खान , नीरज सूद , अद्रिजा सिन्हा , हरविंदर कौर बबली और नीलम गुप्ता
लेखक
निखिल राज सिंह
निर्देशक
निखिल राज सिंह
निर्माता
हनवंत खत्री
रिलीज
20 दिसंबर 2024
रेटिंग
3/5

घर परिवार की किसी महिला के साथ अगर आप शहर में किसी काम के लिए निकले हैं। रास्ता लंबा है। या, ट्रैफिक जाम के चलते 20 मिनट के सफर में दो घंटे लग रहे हैं। महिला को लघुशंका के लिए जाना है। तो, ये समस्या इतनी विकट है कि इससे दो चार हुए बिना इसकी गंभीरता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। वैसे तो नियम है कि कोई भी होटल, रेस्तरां या अन्य संस्थान किसी महिला को अपना प्रसाधन इस्तेमाल करने से रोक नहीं सकते, भले वह उनकी ग्राहक हो या न हो। पेट्रोल पंपों पर भी प्रसाधन होना अनिवार्य है लेकिन वहां के प्रसाधन सौभाग्य से ही साफ सुथरे मिलते हैं। ये तो हुई शहरों की बात जिनके भरोसे देश की जीडीपी चलती है। अब सोचिए, उन गांवों की बात जहां महिलाओं को किसी काम से बाजार, मेला या और कहीं जाना होता है। घर घर शौचालय वाले देश में अब भी सार्वजनिक शौचालय, खासकर महिलाओं के लिए, दूर की कौड़ी है।

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'जाइए आप कहां जाएंगे' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

रिक्शा चालक की प्रेरक कहानी

भारत के 55वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में दिखाई गई फिल्म ‘जाइए आप कहां जाएंगे’ वैसे तो प्रसार भारती के ओटीटी ‘वेव्स’ पर उपलब्ध हो चुकी है लेकिन सिनेमाघरों में इसका प्रदर्शन 20 दिसंबर से करने की तैयारी है। इसे कितने सिनेमाघर मिलेंगे और उन सिनेमाघरों में भी कितने शोज मिलेंगे, ये कहना तो मुश्किल है लेकिन ये फिल्म ऐसी है जिसे देखना जरूरी है। कहानी उस साइकिल रिक्शा चालक किशन की है जिसकी अपने पिता से बिल्कुल नहीं पटती। दोनों साझा दीवार वाले अलग अलग घरों में रहते हैं। पहला मौका मिलते ही लड़ने को तैयार रहते हैं और अपने से ज्यादा एक दूसरे के कामों पर नजर रखते हैं। लेकिन, ये सब एक सही दिशा को प्राप्त होता तब दिखता है जब किशन को समझ आता है कि सार्वजनिक शौचालय कितनी बड़ी समस्या है। पुरुषों के लिए भी और महिलाओं के लिए तो खैर ये कितनी बड़ी समस्या है, इसका अंदाजा वही लोग लगा सकते हैं जिनका इससे सामना हुआ है।

'जाइए आप कहां जाएंगे' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इफ्फी, गोवा में जमकर हुई तारीफ

फिल्म ‘जाइए आप कहां जाएंगे’ को इफ्फी, गोवा में जितने भी देसी-विदेशी दर्शकों ने देखा, सबने इसकी तारीफ की। स्वतंत्र फिल्म निर्माता (इंडी फिल्ममेकर) हनवंत खत्री ने इसमें पैसा लगाने का फैसला किया, इसके लिए वह भी प्रशंसा के पात्र हैं। कहानी और निर्देशन दोनों निखिल राज सिंह ने खुद संभाला है। कहानी हालांकि पटरी पर आने से पहले थोड़े हिचकोले खाती है लेकिन एक बार करण आनंद का अभिनय इसमें रंग भरना शुरू करता है तो कहानी दर्शकों को अपनी पकड़ में लेने लगती है। करण आनंद को हिंदी सिनेमा में इससे पहले भी देखा गया है लेकिन उनका ये रूप चौंकाने वाला है। एक ग्रामीण का चोला ओढ़ने में उन्होंने ‘दो बीघा जमीन’ के बलराज साहनी से काफी कुछ मदद ली है। करण आनंद का किरदार इस फिल्म में धीरे धीरे पकता है और आखिर तक आते आते न सिर्फ उनका अभिनय दर्शकों को भावुक कर देता है बल्कि साल 2024 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए एक दस्तक भी देता है।

'जाइए आप कहां जाएंगे' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

संजय मिश्रा का मिला बढ़िया साथ

संजय मिश्रा फिल्म ‘जाइए आप कहां जाएंगे’ में एक उत्प्रेरक (कैटालिस्ट) की भूमिका में हैं। उनका किरदार नथुनी गांव के उजड्ड बुजुर्ग का किरदार है। उसे फर्क ही नहीं पड़ता कि उसकी सार्वजनिक हरकतों से दूसरों को परेशानी भी हो सकती है। लेकिन, वह दिल का साफ इंसान है। बेटे के लिए उसके मन में भी प्रेम है, बस वह इसे कैसे कहे, ये उसे नहीं पता। किशन की बिटिया बनी अद्रिजा सिन्हा ने ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ के बाद फिर परदे पर अपना असर छोड़ा है। मोनल गज्जर ने किशन की पत्नी के किरदार में कहानी का अवलंबन बनने में पूरी मेहनत की है। ऋषिता भट्ट का स्पेशल अपीयरेंस वाकई चौंकाने वाला है। कुमार सौरभ और सुब्रत दत्ता की जोड़ी की कारस्तानियां भी याद रह जाती हैं।
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'जाइए आप कहां जाएंगे' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

गांवों की सच्ची तस्वीर दिखाती फिल्म

फिल्म ‘जाइए आप कहां जाएंगे’ का नाम रोचक है। 1965 में आई फिल्म ‘मेरे सनम’ में आशा पारेख और विश्वजीत पर फिल्माए गए गाने की पहली लाइन पर रखा गया फिल्म का नाम कौतूहल जगाता है। लेकिन, ये इस फिल्म के विषय को स्पष्ट नहीं कर पाता है और ये इस फिल्म की सबसे बड़ी खामी है। फिल्म के प्रचार, प्रसार की योजना कारगर नहीं है। फिल्म ऐसी है कि अगर इसकी ढंग से मार्केटिंग की जाए तो ये अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों से भी कुछ पुरस्कार खींचकर ला सकती है। योगेश जानी की सिनेमैटोग्राफी से निखिल को खासी मदद मिली है। संदेश शांडिल्य का संगीत कर्णप्रिय है। डिस्क्लेमर ये है कि आम मसाला फिल्मों के शौकीनों के लिए फिल्म में कुछ खास नहीं है, फिल्म भारत के गांवों की सच्ची तस्वीर दिखाती फिल्म है। और, ऐसी फिल्में अक्सर कलात्मक फिल्मों का तमगा देकर संदूक में तहा दी जाती हैं। 



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