कहानी कुछ कुछ वैसी ही है जैसी हिंदी सिनेमा के दर्शक ‘हासिल’ और ‘गुलाल’ जैसी फिल्मों में देख चुके हैं। गुलजार ने भी ऐसी ही एक फिल्म ‘मेरे अपने’ अरसा पहले बनाई थी। इन कहानियों का डीएनए कैंपस के छात्रों की बेलगाम जवानी होती है और गुस्सा इनकी कमजोरी बनकर इन्हें ही खोखला करता नजर आता है। छात्र राजनीति अब देश में वैसी नहीं होती जैसी किसी जमाने में कॉलेज-कॉलेज हुआ करती थी और बेजॉय नांबियार को भी असली कैंपस देखे शायद अरसा हो गया है। उनकी फिल्म ‘दंगे’ की कहानी भी दो बलिष्ठ छात्रों के अहं, बल और पौरुष के टकराव की कहानी है, बस दिक्कत यहां ये है कि फिल्म के ये दोनों ही हीरो किसी भी नजरिये से छात्र नजर नहीं आते। दोनों इतने उम्रदराज दिखते हैं कि दर्शकों को पहली ही नजर में फिल्म की कहानी से इनका कोई तालमेल नजर नहीं आता।
फिल्म ‘दंगे’ की दिक्कत ये है कि कहानी के किरदारों की पृष्ठभूमि सजाने में ही फिल्म का अधिकतर वक्त निकल जाता है। कैंपस राजनीति की ये फिल्म इतनी देर में क्लासरूम के भीतर पहुंचती है कि तब तक दर्शक ये मान बैठते हैं कि बेजॉय नांबियार ने जिस पृष्ठभूमि में अपनी फिल्म की कहानी रची है, उसे ही शायद वह अपने निर्देशन क्षमता दिखाने के चक्कर में भूल गए। वह नायिकाओं के प्रेमालाप के बिंब गढ़ने में मशगूल रहते हैं। फर्श पर बनते प्रतिबिंबों के जरिये अपना हुनर गढ़ने में व्यस्त दिखते हैं। और, इस सारे चक्कर में कहानी जो एक प्रेम त्रिकोण सरीखी हो सकती थी, सजने से पहले ही बिखर जाती है।
हर्षवर्धन राणे और एहान भट दोनों के किरदार अपने अपने खांचे में फंसे दिखते हैं। दोनों कहीं से कॉलेज के छात्र नजर नहीं आते। न शोध करते और न ही पढ़ाई करते। बाकी छात्रों का क्या, उनको तो जैसा बवाल का बहाना ही चाहिए था। जी और युवा की इस कहानी में एक ऋषिका भी है। नशीली दवाओं का कारोबार भी साथ साथ चलता है। फिल्म ‘अफवाह’ और सीरीज ‘गन्स और गुलाब्स’ में अपनी झलकियों से दर्शकों को भविष्य की उम्मीदें दिखाने वाली अभिनेत्री टी जे भानु भी हैं। गायत्री का उनका किरदार एनजीओ चलाता है। छात्रों के हितों की ‘लड़ाई’ लड़ते दिखती हैं। और, इस ध्रुव के विपरीत ध्रुव पर मौजूद है सिद्धि। दोनों का पुराना पंगा है, नई लड़ाई भी है।
बेजॉय नांबियार का निर्देशन और साथ में फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक इतना ‘लाउड’ है कि इस सारी गफलत के बीच उभरने वाले एक दो असल मुद्दे पर फिल्म ठहरती ही नहीं। बेजॉय को जल्दी दिखती है अपनी फिल्म को एक ऐसी प्रयोगशाला बनाने की जहां वह फिल्ममेकिंग के सारे प्रयोग कर लेना चाहते हैं। कलाकारों को जल्दी नजर आती है कि किसी तरह फिल्म खत्म हो और वे आगे का काम देखें। छात्र राजनीति बेजॉय के लिए विदेशी विषय जैसा नजर आता है, इरादे उनके नेक हैं, लेकिन कभी ऐसा कुछ करीब से अगर उन्होंने देखा होता तो जरूर फिल्म की सिनेमाई भाषा कुछ और ही होती।
उम्रदराज छात्रों की इस कहानी में कुछ भी नयापन नहीं है। घिसी हुई कहानी है। भागती सी कमजोर पटकथा है। संवाद न गोवा के लगते हैं और न मुंबई के। कलाकार सारे थके हुए नजर आते हैं। कहीं कोई ताजगी पूरी फिल्म में नजर नहीं आती। हर्षवर्धन और निकिता का तो पता नहीं लेकिन एहान, जोया और टी जे भानु ने अगर एक दो फिल्में ऐसी और कर लीं तो उनका भविष्य जरूर खुद उनके पंगे करता नजर आ सकता है। गीत-संगीत फिल्म का बहुत कमजोर है। सिनेमैटोग्राफी कहीं कहीं चुभने लगती है। संपादन फिल्म का सबसे खराब पहलू है। अगर आपको सिर्फ शोर गुल और मारधाड़ ही भाता है तो भी ये फिल्म आपको बोर करने में पूरी तरह सक्षम है।
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