नेटफ्लिक्स की कहानियों की अपनी एक पहचान रही है। देश में इसका आगमन हुआ तो इसने बनाई पहली सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’। तब से लेकर अब तक नेटफ्लिक्स डार्क थ्रिलर, डार्क ड्रामा, डार्क एक्शन और डार्क कॉमेडी सब बनाता रहा है, बस कभी ये हिंदुस्तानी रंग में खिलखिला कर उन भारतीयों के करीब नहीं आ पाया, जिन्होंने इससे अपनी जैसी कहानियों की शुरू से आस लगाए रखी। अब साल 2024 में आकर नेटफ्लिक्स ने अपना रंग बदला है। मामला पूरा तो सेट नहीं है लेकिन मामला लीगल तो हुआ, और एक बार मामला लीगल हुआ है तो फिर तो चौपाल कभी न कभी सज ही जाएगी। देसी रंग बिरंगी दुनिया नेटफ्लिक्स पर दिखाने का ये सेहरा सजा है नई नई कंपनी पोशम पा पिक्चर्स के सिर। विश्वपति सरकार, सौरभ खन्ना, समीर सक्सेना और अमित गोलानी, ये सब उसी वायरल फीवर के ‘सिम्पटम्स’ हैं जिनसे डिजिटल पर कॉमेडी की दुनिया अरसे से रौनक रही है। रवि किशन इस नई वेब सीरीज ‘मामला लीगल है’ के हीरो हैं। अदालती कार्यवाहियों और अदालती परिसर की अफरातफरियों पर धीमी आंच में पकते रहने वाली ये सीरीज वाकई अच्छी बन पड़ी है।
मामला लीगल है रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जी हां, मामला वाकई लीगल है...
वेब सीरीज ‘मामला लीगल’ है देखा जाए तो एक तरह से अभिनेता रवि किशन का पुनर्जन्म है। उन्हें एक दबंग वकील वी डी त्यागी के रूप में सोचने का जिगरा पालना आसान नहीं है। और, इस एक किरदार को वकीलों की गैलेक्सी के एक अनोखे सौरमंडल का सूरज बनाकर जो कहानियां इस सीरीज में गढ़ी गई हैं, उसके लिए इसकी लेखन टीम की की दाद देनी ही होगी। मामला शुरू होता है वहां से जहां एक खुराफाती वकील दिल्ली बार एसोसिएशन का चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू करता है। पूरी सीरीज में इस चुनाव की तैयारियां के बीच में हर एपिसोड में एक नई कहानी है। वकीलों के रोचक, मनोरंजक और कहीं कहीं दिल छू लेने वाले दृष्टांत हैं। हर एपिसोड के आखिर में अखबार की कुछ कतरनें दिखती हैं। ये बताने के लिए इस सीरीज में जो कुछ दिखाया जा रहा है, वैसा देश के अलग अलग हिस्सों में कहीं न कहीं घट चुका है।
'मामला लीगल है' रिव्यू
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पोशम पा ने पूछ ही लिया, की गल है..?
दाद यहां नेटफ्लिक्स की क्रिएटिव टीम को भी देनी चाहिए जिन्होंने अनगिनत ओटीटी पर दिखने वाले असंख्य कोर्ट रूम ड्रामा वाले शोज में एक और ‘क्रिमिनल जस्टिस’ नहीं बना दिया। उन्होंने लीक छोड़ी और एक ऐसी सीरीज रची जिसे देखने से पहले अदालती दांव-पेंचों पर कोई कॉमेडी शो भी बन सकता है, सोचना मुश्किल था। इस मामले में पोशम पा पिक्चर्स का टैम्पो हाई हो चुका है। आठ एपिसोड की इस सीरीज में तोते वाला एपिसोड अगर इसकी गालियों के चलते निकाल दिया जाए तो बाकी के कम से कम छह एपिसोड फुल पैसा वसूल हैं। सीरीज के संवाद बहुत ही सतर्क होकर लिखे गए हैं और इनकी अंतर्धारा वकालत के पेशे पर नजर रखने वालों को तुरंत समझ आती है। सेशंस कोर्ट में काम करने वाले किसी जज के सुप्रीम कोर्ट के जज न बन पाने के संदर्भ में जब ‘फर्स्ट जनरेशन’ का जिक्र आता है तो निशाना बहुत सटीक लगता है। जेलों में बंद अपराधियों को संभोग की सुविधा देने वाला एपिसोड भी काफी प्रासंगिक बन पड़ा है और एक पुरानी बहस को कुरेदने का माद्दा रखता है। सीरीज के दो एपिसोड बहुत मार्मिक हैं। एक बाप-बेटे के रिश्तों को बहुत ही सलीके से छूने वाला और दूसरा बाल विवाह की जवानी पर तंज कसने वाला।
मामला लीगल है रिव्यू
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रवि किशन का मामला रीगल है...
वेब सीरीज ‘मामला लीगल है’ के सौरमंडल में रवि किशन अपने नाम के अनुरूप ही सूरज की तरह चमके हैं। अपने अभिनय, अपनी भाव भंगिमाओं और अपने करतबों से रवि किशन ने ये किरदार एक तरह से जीकर दिखा दिया है। ये किरदार उनकी अभिनय यात्रा का अब तक का सबसे अच्छा किरदार भी माना जा सकता है। उनकी छवि हालांकि श्याम बेनेगल और मणि रत्नम की फिल्मों ने भी खूब चमकाई, लेकिन सुपर रिन की धुलाई में टीनोपाल अब जाकर पड़ा है। दरअसल, इस सीरीज में रवि को अपने अभिनय के सारे नौ रस दिखाने का पहली बार मौका मिला है। उनका स्नेह और वात्सल्य के भावों में करुण रस से पगा अभिनय उस एपिसोड में बस देखते ही बनता है जिसमें त्यागी का अपने बेटे और अपने पिता से रिश्ता एक साथ देखने को मिलता है। रौद्र, वीर और वीभत्स रस के लिए पेशाबघर में होने वाली लड़ाई है। श्रृंगार रस वह अपनी वेशभूषा से लाते हैं और सजने-संवरने के टोटके भी वरिष्ठ वकीलों से पूछते रहते हैं। हास्य रस तो खैर सीरीज का स्थायी भाव है ही। ओटीटी की कहानियों में एक दमदार लेकिन सीनियर कलाकार की जो जरूरत अरसे से महसूस की जा रही थी, वह रवि किशन ने वेब सीरीज ‘मामला लीगल है’ में अपने अभिनय से पूरी कर दी है।
'मामला लीगल है' रिव्यू
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ये अदालतों के ‘कॉमन पीपल’ हैं..
‘मामला लीगल है’ के चूंकि हर एपिसोड में अलग-अलग कहानियां हैं लिहाजा इन एपिसोड में आने वाले अलग-अलग कलाकार भी बिजली बनकर यहां-वहां चमकते रहते हैं। यशपाल शर्मा तो चमकने के साथ गरजते भी हैं और बरसते भी। उनके जैसे अनुभवी कलाकार को मुख्यधारा के सिनेमा में अच्छे किरदार न मिलना सिनेमा का ही नुकसान है। बृजेंद्र काला भी अपने सधे हुए अभिनय से साबित करते हैं कि वह नए किरदारों की चुनौती लेने को तैयार हैं, बशर्ते लेखक-निर्देशक ऐसे किरदार लिखे तों। दोनों ने सीरीज को बहुत ही अच्छा साधा है। कहानी के नियमित कलाकारों मे नाएला ग्रेवाल, निधि बिष्ट और अनंत वी जोशी ने सीरीज को अपनी अपनी कारस्तानियों से खूब चमकाया है। निधि के अभिनय का अपना एक अलग रस है। अनंत का रसिया बनना उनकी मंगनी में बाधा बनता दिखता है तो नाएला ने एक विदेश में पढ़ी और जिला अदालत में आकर अटकी वकील का किरदार बहुत ही खूबसूरती से निभाया है। नाएला और अनंत वी जोशी जब भी साथ दिखते हैं, एक फुलझड़ी सी छूटती है। इन दोनों के किरदारों को और ढंग से पानी मिला तो ये दोनों अगले सीजन में अलग ही रंग खिला सकते हैं।
'मामला लीगल है' रिव्यू
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इसलिए ये मामला लीगल है..
सीरीज ‘मामला लीगल है’ की तकनीकी दक्षता की बात करने से पहले जिक्र उन कलाकारों का भी जो इस सीरीज में गुदड़ी के लाल और लाली दोनों बनकर चमके हैं। सीरीज में जय-विजय सरीखे दो किरदार लॉ और ऑर्डर भी हैं। इन किरदारों में अमित विक्रम और विक्रम प्रताप ने कम मिले मौकों को भी तबीयत से भुनाया है। बंदरों को भगाने के लिए लंगूर बने कुमार सौरभ की पंच लाइनें बिल्कुल सही तरीके से असर करती हैं। अंजुम बत्रा का आभा मंडल लाजवाब है और तनवी आजमी ने सीरीज के आखिरी एपीसोड में त्यागी का जो हृदय परिवर्तन किया है, वहां उनकी और रवि किशन के बीच पनपने वाली समरसता बस देखते ही बनती है। और, हां एपिसोड के सातवें एपिसोड में खूब दमकी हैं अभिनेत्री रमा शर्मा। बाल विवाह के फेरों में अटकी और भटकी युवती के किरदार में रमा ने एक बालवधू की विडंबना को बहुत ही सटीक तरीके से परदे पर पेश किया है। उनका सुहाग दिन, सुहाग दोपहर और सुहाग शाम वाला प्रसंग अच्छा बन पड़ा है।
'मामला लीगल है' रिव्यू
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और, ये वाले कोड पीनल हैं..
जो एक बात इस सीरीज में सबसे खटकने वाली रही, वह है इसमें अनावश्यक गालियों या उनसे मिलते जुलने वाले शब्दों का इस्तेमाल। तोता वाला एपिसोड अगर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी को ध्यान में रखकर बुना गया होता, तो ये आज की तारीख का सबसे चर्चित एपिसोड होता। और, अगर सीरीज का आर्ट डायरेक्शन थोड़ा चुस्त होता तो इसका असर भी बेहतर होता और तब शायद बोर्ड पर शिकंजी को शिकांजी लिखे जाने से भी बचा जा सकता था। बैकग्राउंड म्यूजिक सीरीज का कमजोर है और इसकी ओपनिंग क्रेडिट्स भी थोड़ा और क्रिएटिव हो सकते थे। फिर भी सीरीज बिंज वॉच के लिए परफेक्ट है, बस घर पर माता-पिता या दूसरे संवेदनशील लोग हों तो देखिएगा इसे कानों में ईयर फोन लगाकर ही।