क्राइम बीट (वेब सीरीज) रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहने को इस सीरीज में विषय विशेषज्ञ भी हैं बतौर पटकथा सलाहकार के रूप में लेकिन ऐसा कुछ खास इस सीरीज में नजर आता नहीं जो आम दर्शक पहले से न जानता हो। हां, अगर रिसर्च के तौर पर आप कुछ जानना चाहते हों तो आपको बताते चलें कि इस सीरीज के मुख्य कलाकार साकिब सलीम और सबा आजाद पहले भी एक साथ काम कर चुके हैं। दोनों की लॉन्चिंग एक ही फिल्म ‘मुझसे फ्रांडशिप करोगी’ में हुई थी। यशराज फिल्म्स ने इसी मिजाज की फिल्में बनाने के लिए एक अलग कंपनी वाई फिल्म्स बनाई थी, इस कंपनी से ही आनंद तिवारी भी निकले हैं, ‘बैंग बाजा बारात’ जैसी सीरीज बनाकर। और भी तमाम निर्देशक और कलाकार उस दौर के यहां वहां बिखरे मिल जाएंगे। बात यहां जी5 की वेब सीरीज ‘क्राइम बीट’ की हो रही है। क्राइम रिपोर्टर बने हैं, साकिब सलीम। उनके संपादक हैं दानिश हुसैन। फिर नेता हैं, अपराधी हैं, साथी रिपोर्टर हैं। अखबार ‘द एक्सप्रेस’ और वही सारी अंदरूनी सियासत जिसकी कुछ झलकियां आप नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘स्कूप’ में भी देख चुके हैं।
क्राइम बीट (वेब सीरीज) रिव्यू
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कहानी के केंद्र में यहां बिन्नी चौधरी है। उसे चुनाव लड़ना है। भीड़ में कोई उसे निपटाने की कोशिश करता है। चश्मदीद कहानी का हीरो अभिषेक है। कहानी फ्लैशबैक में जाती है। पता चलता है मामला तो अफगानिस्तान होकर दिल्ली तक आया है। तब बिन्नी ने एक किडनैपिंग की थी और मामला बहुत गरम हुआ था। तब बिन्नी को पुलिस दिल्ली ला नहीं पाई थी। अब वह खुद आ गया है। अभिषेक को सब पता चल रहा है। वह अपने संपादक को बता भी रहा है। खबर छप भी जाती है लेकिन अभिषेक के नाम से नहीं बल्कि संपादक के नाम से। अखबार की भाषा में इसे ‘बाई लाइन’ वाली खबर करते हैं यानी जिसमें खबर लिखने वाले का नाम भी छपे। मामला यहां से छोटी लाइन पकड़ लेता है। अभिषेक को कहानी का हीरो बनना है, वह नौकरी छोड़ता है, जिंदगी दांव पर लगाता है और अपने फैलाये रास्ते में कभी फिसलता है, कभी आगे बढ़ता है।
क्राइम बीट (वेब सीरीज) रिव्यू
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कहने को वेब सीरीज ‘क्राइम बीट’ की कहानी सोमनाथ बताब्याल की किताब ‘द प्राइस यू पे’ पर आधारित है लेकिन चूंकि किताब ही इतनी लोकप्रिय नहीं है तो उस पर बनी सीरीज को लेकर भी कोई उत्सुकता क्यों ही बन सकेगी? इस सीरीज की यूएसपी बस इतनी है कि इसे दिग्गज निर्देशक सुधीर मिश्रा ने सजाया है। निर्देशन में भी उनका नाम है लेकिन सीरीज देखकर कहीं से भी उनकी छाप इस सीरीज में नजर नहीं आती। कथा, पटकथा के नाम पर सीरीज इतनी कमजोर है कि एक आम हिंदी फिल्म दर्शक इसका पहला एपिसोड देखकर पूरी सीरीज की कहानी बता सकता है। ये बात जी5 को भी पता रही ही होगी, तभी तो इसमें अतिरिक्त रूप से पटकथा और संवाद लेखक लगाए गए। संवाद सीरीज के बेहद खराब हैं। पुलिसिया भाषा का कैमरे पर इस्तेमाल किए बिना भी अपराध और अपराधियों पर सीरीज बन सकती है। जावेद अख्तर तो साफ साफ कह चुके हैं कि भाषा में गालियां वही लेखक और निर्देशक इस्तेमाल करते हैं, जिनके पास कहने को कुछ न हो। नहीं तो ‘जंजीर’ के विजय के पास क्या कम मौके रहे, गालियां देने के?
क्राइम बीट (वेब सीरीज) रिव्यू
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साकिब सलीम मेहनती अभिनेता हैं। उनको किरदार भी लगातार ठीक ठाक मिलते रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। कद काठी की भी और अभिनय के विस्तार की भी। एक अखबार के क्राइम रिपोर्टर की दबंगई उन्होंने शायद देखी नहीं है। और, न ही उन्होंने क्राइम रिपोर्टरों का अपने संपादकों से बात करने का अंदाज देखा है। अखबारों के क्राइम रिपोर्टर्स से संपादक भी तमीज से पेश आते हैं क्योंकि शहर में सबके काम ये क्राइम रिपोर्टर ही निकलवाते हैं। अभिनय के लिहाज से साकिब भी कमजोर हैं और सबा आजाद से तो खैर उम्मीद करना ही बेमानी है। वह इस सीरीज में क्यों हैं? हर दर्शक को पहले से पता है। सीरीज में अभिनय की तारीफ अगर किसी की करने का मन करता है तो वह हैं राजेश तैलंग और राजेश कदम। ‘बड़ा नाम करेंगे’ के बाद राजेश तैलंग ने फिर एक अलहदा रोल में खुद को साबित किया है। राजेश कदम ने एक फोटोग्राफर की देहभाषा अच्छे से पकड़ी है। साई तम्हणकर और राहुल भट की काबिलियत का इस सीरीज के मेकर्स फायदा ही नहीं उठा पाए।