मेडिकल ड्रीम्स (वेब सीरीज) रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पहला सीजन सीधे यूट्यूब पर
टीवीएफ वाले एक ठो फॉर्मूला बहुत सही जुगाड़े हैं। ये है किसी बढ़िया स्पॉन्सरर के साथ नई कहानी का पहला सीजन बनाना। बिना किसी ओटीटी वाले के चिरौरी किए उसे सीधे यूट्यूब पर लगा देना। एक दो नामी गिरामी चेहरे और बाकी सब पलटन अइसे अइसे टैलेंट की कि पलक झपका के देखना पड़ता है कि ये सब अबै तलक कहा बिलाये रहे। ‘मेडिकल ड्रीम्स’ देखा जाए तो ‘कोटा फैक्ट्री’ का फीमेल वर्जन है। वहां लड़के सब जेईई की तैयारी में लगे हैं। यहां लड़कियां नीट धो रही हैं। वहां एक दो छोकरी लोग बीच कहानी में आ जाती हैं पिंक पिंक छिड़कने। यहां एक दो लड़का लोग है माचोइज्म दिखाने के लिए। मामला कुछ कुछ वइसा ही है लेकिन कहानी यहां भाग्यश्री की है। भाग्यश्री चौबे की? नहीं बूझे? चलिए तफ्सील से बताते हैं।
मेडिकल ड्रीम्स (वेब सीरीज) रिव्यू
- फोटो : वीडियो ग्रैब
मुंह दिखाई से भागी लड़की की कहानी
मामला ये है कि शादी तय होने से पहले मुंह दिखाई की रस्म चल रही है और लड़की घर से भाग निकलती है। रास्ते में दारू पीकर टुन्न पड़े मोहल्ले के चाचा को अस्पताल पहुंचाती है। सरकारी अस्पताल की डॉक्टर दीदी दवाई का पर्चा पकड़ाती हैं और कहती हैं ये दवा न मिले तो साल्ट मैच करके दूसरी दवा ले आना। जिम्मेदारी कोटा जाकर मेडिकल की तैयारी का प्लान बनाए सरोज को मिलती है तो श्री की ट्यूबलाइट जलती है। किस्मत राइट से लेफ्ट और लेफ्ट से राइट स्वाइप होती है। सरोज की शादी हो जाती है। और, श्री अब कोटा में हैं। 53 परसेंट से इंटर पास होने के बावजूद वह नीट की तैयारी में जुटी है। लोग मजे लेते हैं। वह हौसले ले रही है। किस्मत उसकी वैसी ही है जैसे सीढ़ियों से ऊपर जाना हो और हर पायदान पर दो-दो कटहे कुत्ते लेटे हों। उन्हीं के बीच से रास्ता बनाना है। सिन्हा सर मदद के लिए हैं। ध्वनि धांय धांय ज्ञान दागने के लिए है और साथ में है अपना हीरो समर्थ। वही मोहल्ले का गिटार बजाने वाला लड़का।
मेडिकल ड्रीम्स (वेब सीरीज) रिव्यू
- फोटो : वीडियो ग्रैब
रोते हुए विदा नहीं होना है...!
दुनिया भले चांद पर बसने का तरीका तलाश रही हो। भारत के गांवों की बेटियों की तकदीर अब भी सीरीज के डायलॉग जैसी ही है कि, रोते हुए पैदा हो और रोते हुए विदा हो जाओ। मतलब 18 पार किया नहीं कि सादी। बिटिया ने जैसे ही घर में बताया कि उसे गोल रोटी बनानी आ गई है, उसकी शादी की तैयारी शुरू हो जाती है। ‘मेडिकल ड्रीम्स’ की कहानी की गनीमत ये है कि गांव के पापा लोग भी बिटिया की साइड होने लगे हैं। डॉक्टर बनाने वाली सीरीज में कहीं कहीं विमल गुटखा का पोस्टर भी दिखता है लेकिन रेजर बनाने वालों और कोचिंग चलाने वालों से पैसा लेकर भी टीवीएफ वालों ने सीरीज बढ़िया बनाई है। बात डॉक्टरों की जो ठहरी और दुनिया में भगवान के बाद अपनी जान इंसान डॉक्टर को तो ही आंख मूंद कर सौंप सकता है।
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती!
वेब सीरीज ‘मेडिकल ड्रीम्स’ के किरदार बहुत अनोखे हैं। मेंटॉर और टीचर के रूप में शरमन जोशी का आभामंडल वो सूरज है जिसके चारों तरफ इसके कलाकार चक्कर लगाते नजर आते हैं। कहानी की नायिका यानी भाग्यश्री चौबे बनी हैं रमा शर्मा। ‘मामला लीगल है’ में जो एक गरीब घर की बेटी की धाक उन्होंने जमाई थी, उसके अब खिलने का वक्त आ चुका है। एक दबी सहम और सकुचाई सी गांव की बेटी कोटा जैसे शहर आई है मेडिकल की तैयारी करने। न नंबर ढंग के हैं, न पढ़ाई अब तक उसने कायदे से की। बस एक सपना है, जो उसने डॉक्टर दीदी और सरोज की हिम्मत में देखा है।
रमा शर्मा ने जमा दिया अपना रंग
वेब सीरीज ‘मेडिकल ड्रीम्स’ में रमा शर्मा ने जमकर अभिनय किया है और दादरी का दम ओटीटी पर जमाया है। रूममेट भी उसकी मदद को तैयार हो चुकी है। ध्वनि का ये किरदार ऐश्वर्या ने खूब दमदार तरीके से निभाया है। मोहल्ले का हीरो समर्थ भी श्री को गानों के जरिये रटटा मारना सिखा ही रहा है। ऋषभ जोशी इस किरदार में जमे भी खूब हैं। जीवन का फलसफा समझाती ये सीरीज उन सबको देखनी चाहिए जो किसी न किसी कंपटीशन की तैयारी में लगे हैं और कभी कभी उनकी हिम्मत डोलने लगती है। लेकिन, याद रखनी है वो कविता जो सोहन लाल द्विवेदी लिख गए हैं..नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना गिर कर चढ़ना न अखरता है,
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती!