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Amar Ujala Samvad: अमर उजाला के मंच पर कंगना रनौत, कहा- 'मेरी आवाज दबाई जा रही है'

Mon, 02 Sep 2024 05:08 PM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

अभिनेत्री व भाजपा सांसद कंगना रणौत ने आज सोमावर को साइबर सिटी गुरुग्राम में आयोजित अमर उजाला के वैचारिक संवाद में शिरकत की है। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा की। आइए जानते हैं...
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कंगना रणौत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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साइबर सिटी गुरुग्राम में हो रहे अमर उजाला के वैचारिक संवाद कार्यक्रम में देश की जानी मानी शख्सियतों, नीति नियंताओं, विचारकों और विशेषज्ञों के विचार जानने और उनसे रूबरू होने का मौका मिल रहा है। इस कार्यक्रम में खेल, राजनीति और धर्म से लेकर मनोरंजन जगत की हस्तियां शामिल हुई हैं। दिग्गज अदाकारा और भाजपा सांसद कंगना रणौत भी इस कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंची हैं। यहां उन्होंने कई दिलचस्प बातें साझा की हैं...

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कंगना रणौत - फोटो : अमर उजाला
सवाल:'आपातकाल' लोकतंत्र के लिए काला अध्याय, जब उस पर फिल्म आ रही है तो उस पर सवाल होंगे। आपने इस विषय को चुना फिल्म बनाने के लिए, आज इस पर इतने विचार हैं। नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह से। अब सेंसर बोर्ड में फिल्म फंस गई है। क्या कहेंगी?
कंगना: मुझे तो नहीं लग रहा कि किसी तरह की डिबेट और तर्क वितर्क हो रहे हैं। मुझे लग रहा है कि बंदूके तन रही हैं। सेंसर बोर्ड ने मेरी फिल्म क्लियर कर दी थी। जाहिर सी बात है कि यह फिल्म हमारे संविधान से जुड़ी एक अदभुत घटना को हमारे पास लाती है। यह हमारा अधिकार है कि हम इस विषय पर बात करें। लेकिन, तीन-चार दिन पहले इस पर बैन लगा देना, समझ नहीं आता। मैंने बहुत सारे ग्रुप्स से कहा है कि किसी को इस पर आपत्ति है तो हम अपना पक्ष रखेंगे। इसका आधार क्या है हम उपलब्ध कराएंगे। अगर आधारहीन लगा तो निकालेंगे। हमारे साथ कोई डिबेट नहीं हुई है। न ही कोई बात की गई है। मुझे लगता है कि इसका नाम अब इमरजेंसी से बदलकर नो वन किल्ड इंदिरा गांधी रखना चाहिए।

सवाल: आपमें एक निराशा का भाव नजर आ रहा है?
कंगना: बिल्कुल! बतौर एक क्रिएटिव पर्सन मैं निराश हूं। मेरी आवाज दबाई जा रही है। सत्य घटना पर आधारित फिल्म को नहीं दिखाए जाने का मुझ पर दबाव डाला जा रहा है। इंदिरा गांधी का निधन बिजली कड़कने से नहीं हुआ था। उनके ऊपर पेड़ नहीं गिरा था'।

सवाल: क्या इस मुद्दे को किसी ने भड़काया?
जवाब: 'आप जब किसी मुद्दे पर राजनीति करेंगे तो देश बंदूकों के रास्ते पर ही चलेगा। उस रास्ते पर देश नहीं चलना चाहिए। हमें अधिकार है कि हम अपने इतिहास से सीखें। हमारी पीढ़ी कायरों की पीढ़ी नहीं है जो यहां बैठे-बैठे देखती रहेगी'।

सवाल: आप जिस पार्टी में हैं, जिसके टिकट पर लड़कर आप राजनीति में पहुंची हैं। क्या आपको लग रहा है कि आपकी आवाज दबाई जा रही है?
जवाब: टसरकार ने हमें काम करने के लिए रखा है। हम जन सेवा में हैं। हर तरीके का काम हमें पूरे देश से आता है। लेकिन, हमारा कोई निजी काम हो तो हमारा कोई फोन नहीं उठाता। ये है भारतीय जनता पार्टी की सच्चाई। भाजपा के लोग फोन नहीं उठाते, फिर भी पार्टी से निराशा नहीं'।

क्या आपका फोन किसी ने नहीं उठाया?
अगर आप राजनीति पर कोई बात करेंगे तो फोन उठाएंगे, लेकिन फिल्म पर बात करेंगे तो फोन नहीं उठाएंगे। मैं राजनीति में मात्र दो महीने में आई हैं, पिछले वक्त मैं फिल्मों में एक्टिव थी। मुझे अपनी पार्टी से कोई निराशा नहीं है। लेकिन, बतौर फिल्म मेकर मुझे निराशा है। मैं सेंसर के प्रति बहुत निराश हूं कि उन्होंने मुझसे एक बात नहीं की।

सवाल: देश में अलग-अलग विषयों पर फिल्म बन रही हैं। कश्मीर फाइल्स और केरल स्टोरी भी बनी। जब आपकी यह फिल्म आई है तो कंगना को सपोर्ट क्यों नहीं मिल रहा है?
जवाब: आप देखिए न कि फिल्म किस पर बनाई है? इंदिरा गांधी पर...अगर आप यह सोचते हैं कि आपने निजी भाव से फिल्म बनाई है, या सरकारों को लगता है कि एजेंडा आगे किया है। राष्ट्रवाद का एजेंडा आगे होगा तो पार्टी भी मुझे सपोर्ट करेगी। लेकिन, इंदिरा गांधी की फिल्म पर मुझे क्या सपोर्ट मिलेगा। लेकिन, जब यह फिल्म आएगी और इस पर बात होगी उसके लिए। हमारा देश हमारी अखंडता हमारे लिए महत्वपूर्ण है और अगर हम बंट जाएंगे तो क्या ही रहेगा। यही मेरी फिल्म का मूल है। लोग मेरी फिल्म के खिलाफ सड़कों पर आ रहे हैं। अगर ऐसे ही हर बात पर लोगों ने बंदूकें निकालीं तो देश बहुत पीछे चला जाएगा।

सवाल: राहुल गांधी ने आज लिंचिंग को लेकर बयान दिया है, आप क्या कहेंगी?
जवाब: 'देश की अखंडता जिनका नारा है, राष्ट्रवाद जिनका नारा है, सबका विकास सबका साथ जिनका नारा है, तो कहां नफरत है। उनको (राहुल गांधी) जितना दिमाग उतनी ही बात करेंगे'। 

सवाल: आप कांग्रेस पर बहुत तीखे हमले करती हैं?
जवाब: मुझे लगता है कि उस परिवार ने देश का बहुत नुकसान किया है। मुझसें उसका बहुत रोष है। राहुल गांधी चाहें कुछ भी बोलें, मुझे उनकी बातें सुनकर खून खौलता है। मुझे सुप्रीम कोर्ट से हर हफ्ते राहुल गांधी के लोग नोटिस भिजवाते हैं। जितना नुकसान इस फैमिली ने देश को पहुंचाया है, हमें हक है कि हम इनके चंगुल से निकल जाएं। देश इनके चंगुल से निकल जाएं।

सवाल: आपके परिवार के बारे में जो जानकारी जुटाई उसके मुताबिक आपके जो परदादा थे वे कांग्रेस पार्टी से विधायक रहे? आपके दादा आईएएस भी रहे और कांग्रेस पार्टी के करीबी भी रहे।
जवाब: उस वक्त सिर्फ कांग्रेस ही थी। मेरे परदादा फ्रीडम फाइटर थे। वे महात्मा गांधी के साथ थे, उनके पास महात्मा गांधी के हाथ से लिखे हुए पत्र हैं। 

सवाल: परिवार का जो जुड़ाव कांग्रेस पार्टी से रहा, ऐसे में आपके लिए वह ट्रिगर पॉइंट कब आया जब आपको लगा कि ये पार्टी ठीक नहीं है। मेरी विचारधारा भाजपा से ज्यादा मिलती है। वह पल कब आया?
जवाब: मोदी! जब नरेंद्र मोदी आए तो हमारे लिए वह पल आ गया। हम लोगों ने बहुत शोषण सहा है। मुंबई गए हों या शहरों में गए हैं, या कहीं गए हों कहा गया कि इन्हें अंग्रेजी नहीं आती है, इन्हें इंडस्ट्री से निकालो। ये छोटे लोग हैं। हम गोरी चमड़ी वाले हैं। हम लोग लंदन से हैं। ये सब सुन-सुनकर हम लोग परेशान थे। भारत की जो दुर्दशा थी, उससे परेशान थे। मुझे याद है एक किस्सा एक मेकअप आर्टिस्ट और हीरो तैयार हो रहे थे। तब उसने कहा कि यार तू दादा क्या इंडियन काम करता है। मुझे वह बात हमेशा मेरे साथ रही। मुझे बड़ा अपमानित महसूस हुआ। हमारी फिल्में भी रेप, मर्डर जैसी घटनाएं...कब तक यह सहते। मैंने 2009 में अमेरिका में एक घर भी ले लिया था कि कहां जाएं, इस देश में बहुत निराश हो जाएंगे। इस पार्टी (भाजपा) ने अपने देश के प्रति अपनी मिट्टी के प्रति एक चेतना जगाई। मैं तो कहूंगी मोदी जी तो कब से भटक रहे थे, कभी हिमालय में कभी कहीं। फिर एक चेतना आई कि हम भारतीयों को चुनेंगे। मैं तभी कहती हूं कि हमें मानसिक स्वतंत्रता मिली, हमें स्वतंत्रता मिली, जब हमने उन्हें चुना। उन्होंने जन-जन में भारतीय होने का अहसास दिलाया'।

सवाल: आपके इसी इमोशन को संसद की तरफ लेकर जाएं तो आप 15-16 की उम्र में घर से निकल गई थीं। मुंबई से चार नेशनल अवॉर्ड विनर आप जब आप दिल्ली पहुंचीं। जब आपने पहले दिन संसद में कदम रखा तो वह दिन उस कंगना के लिए कैसा था, जो हिमाचल में रहा करती थी?
जवाब: मुझे कभी ऐसा लगा नहीं, लेकिन उस पल ऐसा लगा कि मैं ये डिजर्व नहीं करती हूं। मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि मुझे यहां होना चाहिए। उस वक्त मेरे मन में यह ख्याल आया कि मुझे अपने आप को बहुत बड़ा बनाना होगा इस जगह की वैल्य करने की। पता नहीं उतना धैर्य, उतनी संवेदना, उतनी मानवता और उतना सबकुछ मुझमें कभी हो पाएगा या नहीं। लेकिन, उस दिन मुझे बहुत छोटा महसूस हुआ, उस पद पर।

सवालः मंडी के लोग आपको बहुत आकांक्षाओं के साथ देखते हैं और इस देश में बहुत सी लड़कियां हैं जिन्होंने कभी मुंबई जाने का सपना देखा, जो कंगना को अपनी प्रतिनिधि के रूप में देखती हैं। पहाड़ से जब एक इंसान निकलता है तो वह अपने झोले में थोड़ी दूब और थोड़ा वहां ठंडे पानी का असर और फिजाएं लेकर चलता है। कंगना की यात्रा में वह झोला हमेशा अदृश्य रूप से झलकता है?
जवाब: 2014 से पहले हमें कोई नहीं पूछता था। हम भी दर-दर भटकते थे। फिर एक फिल्म आई- क्वीन। एक ऐसी बेटी की फिल्म जो दिल्ली की बेटी है। वो मासूम बेटी है और अपनी यात्रा पर निकल जाती है। 2014 में ऐसी ऐतिहासिक चीजें हुई हैं और होती आ रही हैं। हम गांव की बेटियां हैं और गर्व से कह रह हैं। यही अटल जी ने कहा था कि यह गांव का विकास यह यह भारत का विकास है। तो उसी के साथ हम चलेंगे।
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सवाल: जब भी हम किसी प्रोफेशन में कदम रखते हैं तो उसकी एक तैयारी होती है। एक्टिंग के लिए आपने ट्रेनिंग ली होगी, लेकिन राजनीति ऐसी चीज नहीं है, जिसे किसी इंस्टीट्यूट में जाकर सीखना है। आप खुद को हर रोज कैसे तैयार कर रही हैं?
जवाब: थोड़ा संघर्ष करके। जब फिल्म करते हैं तो एक वक्त पर आकर लगता है कि मेरा काम पूरा हो गया। लेकिन, राजनीति का काम ऐसा है, ये कभी पूरा नहीं होता। यहां कुछ भी काफी नहीं है। कितने भी लोगों से मिल लीजिए। चाहें कितने भी काम कर लीजिए। सारे देश से फोन आते रहते हैं, समस्या बताते हैं। कभी दो आंसुओं का इतना मोल हो जाता है कि जितना काम करके नहीं हुआ।  
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