यश चोपड़ा की फिल्मों में रोमांस जितना ही महत्व उनकी नायिकाओं को भी मिला। दौर कोई भी हो यशराज बैनर की नायिकाओं ने उस दौर की लड़कियों के लिए आदर्श गढ़े।
उनकी नायिकाएं तो जैसी संपूर्ण स्त्री की परिभाषा बन गईं। सिर्फ सुंदर नहीं, स्वाभिमानी और बुद्धिमान। चाहे वो 'सिलसिला' की रेखा हों, 'चांदनी' की श्रीदेवी, 'दिल तो पागल है' की माधुरी हों फिर 'वीर जारा' की प्रीति जिंटा।
भले ही उनकी फिल्मों की नायिकाएं मोहब्बत को लेकर भावुक जज्बाती हो लेकिन उनके अंदर सही और गलत में अंतर करके फैसला लेने का एक सामान्य बोध दिखा।
उनकी निर्देशित अंतिम फिल्म जब तक है जान को ही उठा लें। फिल्म की दोनों नायिकाएं नायक के प्रेम के प्रति जज्बाती हैं लेकिन वह इस बात के आधार पर गलत चुनाव नहीं करती हैं।
'सिलसिला' में रेखा की गरिमा से भरी खूबसूरती हो या 'चांदनी' में श्रीदेवी के चुलबुलेपन और गंभीरता का मेल। असल जिंदगी में भी इन दोनों अभिनेत्रियों की शख्सियत का यही रंग उभरकर सामने आता है।
चाहे कोई भी एक्ट्रेस हो, यश चोपड़ा की फिल्म उसके कॅरियर में मील का पत्थर साबित होती थी। उनकी फिल्मों में वे खूबसूरती और अभिनय की जिन ऊंचाइयों को छू लेती थीं- वह किसी और फिल्म में संभव नहीं हो पाता था।
सुंदर नायिका और सुंदर गाने
यश चोपड़ा की फिल्मों की एक और खासियत उनकी फिल्मों के सुंदर गाने रहे हैं। ये गाने एक किस्म का अद्भुत सम्मोहन रचते हैं। इन फिल्मों की नायिकाएं की खूबसूरती भी यश चोपड़ा की फिल्मों से निकलकर बाहर आती है।
काजोल, माधुरी दीक्षित के अलावा उस दौर की नायिकाएं यदि हर तरह के दर्शक वर्ग के बीच लोकप्रिय हुईं तो उसके पीछे यश चोपड़ा द्वारा रची गई उनकी संपूर्ण इमेज थी।