बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर 18 अक्तूबर को हुई गोलीबारी की घटना के सिलसिले में गिरफ्तार सभी आरोपियों के खिलाफ मकोका अदालत ने बड़ी कार्रवाई की है। जानिए मामले में क्या है नया अपडेट।
6 नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेजने का आदेश
पुलिस ने टाइगर श्रॉफ की कार पर फायरिंग के मामले में गिरफ्तार 11 आरोपियों के खिलाफ महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) के प्रावधान लागू किए हैं। इसके बाद सभी आरोपियों को दोबारा गिरफ्तार कर विशेष मकोका अदालत में पेश किया गया। विशेष न्यायाधीश सत्यनारायण नवनंदर ने सभी आरोपियों को 6 नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेजने का आदेश दिया।
पुलिस ने अदालत से सभी आरोपियों की 10 दिनों की हिरासत मांगी थी। पुलिस का कहना है कि मामले में गहराई से पूछताछ करना जरूरी है, ताकि हमले के पीछे की पूरी साजिश का पता लगाया जा सके।
टाइगर की कार पर फायरिंग
- फोटो : अमर उजाला
18 अक्तूबर को टाइगर की कार पर हुई थी फायरिंग
- यह घटना 18 अक्तूबर को मुंबई के जुहू इलाके में हुई थी।
- टाइगर श्रॉफ फुटबॉल ग्राउंड से निकल रहे थे, तभी दो हमलावरों ने उनकी कार पर पांच राउंड फायरिंग की।
- इस घटना में टाइगर बाल-बाल बच गए, लेकिन उनके कार चालक और वहां मौजूद एक व्लॉगर घायल हो गए थे।
- घटना के बाद सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट सामने आए थे, जिनमें कथित तौर पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग के सदस्यों ने हमले की जिम्मेदारी ली थी।
- हालांकि, मामले में पुलिस की जांच जारी है।
टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग
- फोटो : सोशल मीडिया
लॉरेंस बिश्नोई के सहयोगी की भी तलाश
पुलिस ने इस मामले में अनिल पंडित को वांछित आरोपी बताया है। वह जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई का सहयोगी बताया जा रहा है।
अब तक गिरफ्तार किए गए 11 आरोपियों में से तीन को राजस्थान के कोटा से पकड़ा गया था, जबकि बाकी आरोपियों को दिल्ली और हरियाणा के अलग-अलग इलाकों से गिरफ्तार किया गया।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Adobestock
क्या है मकोका कानून?
- महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून यानी मकोका संगठित अपराध से जुड़े मामलों में लागू किया जाता है।
- इस कानून के तहत आरोपियों को जमानत मिलना सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में मुश्किल होता है।
- अदालत को जमानत देने से पहले इस बात से संतुष्ट होना पड़ता है कि आरोपी के दोषी न होने के उचित आधार हैं।
- मकोका के तहत पुलिस को आरोपपत्र दाखिल करने के लिए 90 दिनों के बजाय 180 दिनों तक का समय मिल सकता है।
- इसके अलावा, इस कानून के तहत पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) के पद के अधिकारी के सामने दर्ज कराए गए इकबालिया बयान भी अदालत में सबूत के तौर पर स्वीकार किए जा सकते हैं।
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