दादा हुए थे शहीद
ख्वाजा अहमद अब्बास के पिता गुलाम उस सिबतैन और माता का नाम मसरूर खातून था। वहीं, उनके दादा ख्वाजा गुलाम अब्बास 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्हें अंग्रेजों ने तोप से बांधकर शहीद कर दिया था। ऐसे में उन्हें देश के प्रति प्रेम की भावना विरासत में मिली थी, इसलिए उनकी फिल्मों और लेखनी में भी देशभक्ति की झलक साफ दिखाई देती थी।
लास्ट पेज कॉलम खूब हुआ मशहूर
ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अलीगढ़ के हाली मुस्लिम हाई स्कूल से की थी। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी किया। इसके बाद वह बॉम्बे क्रॉनिकल का हिस्सा बने और यहां संवाददाता और फिल्म समीक्षक के रूप में काम किया। उनका साप्ताहिक 'ब्लिट्ज' में 'लास्ट पेज' नाम से कॉलम आने लगा।1935 से शुरू होकर कॉलम 1947 तक चला। बाद में उन्होंने ‘ब्लिट्ज’ ज्वाइन किया और वहां भी यह कॉलम चलता रहा। उर्दू में यह 'आजाद कलम' नाम से आता था। यह पत्रकारिता के इतिहास में सबसे ज्यादा समय (1987) तक प्रकाशित होने वाला कॉलम है।
पहली ही फिल्म ने कर दिया कमाल
पत्रकारिता के बाद उन्होंने फिल्मों का रुख किया। वह पहले फिल्मों के लिए लिखा करते थे। 1935 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'धरती के लाल' बनाई। इस फिल्म की कहानी बंगाल के अकाल पर बनी थी, जिसे कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सराहना मिली। यह फिल्म पूरे सोवियत यूनियन में दिखाई गई और कई देश की लाइब्रेरी में भी इसे जगह मिली। 1951 में उन्होंने 'नया संसार' नाम से खुद की कंपनी खोली। 35 वर्षों के अपने करियर में उन्होंने सबसे ज्यादा काम राज कपूर के साथ किया था। इनमें 'आवारा', 'श्री 420', 'जागते रहो', 'मेरा नाम जोकर' और 'बॉबी' शामिल हैं। अमिताभ बच्चन को भी ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही 'सात हिंदुस्तानी' में मौका दिया था। बिग बी उन्हें मामू कहकर बुलाया करते थे।