हाल ही में करण जौहर सरोगेसी के जरिए दो बच्चों के पिता बने और कहा कि वो एक अच्छी मां और पिता बनकर दिखाएंगे और बच्चों को दोनों का प्यार देंगे क्योंकि उनके पास ढेर सारा प्यार है। चलिए बच्चे तो उन्हें किराए की कोख से मिल गए और बरसों पुरानी उनकी ख्वाहिश भी पूरी हो गई लेकिन इसके जरिए वो बाकी लोगों को क्या संदेश दे रहे हैं ?
सवाल उठ रहा है कि बड़े सेलेब्रिटी बच्चों की ख्वाहिश में मातृत्व के नियमों को ताक पर रख रहे हैं क्योंकि सरोगेसी से निसंतान दंपत्तियो को तो फायदा होगा लेकिन नौ महीने बच्चे को पेट में रखने वाली मां को क्या मिलेगा ? क्या सेलेब्रिटी अपने पैसे के बल पर पार्टनर और दांपत्य जीवन की अहमियत को खत्म कर रहे हैं ? चाहे कोई कितना भी कह ले कि वो बच्चे को अकेला पाल लेगा लेकिन बिना मां के एक बच्चा ऐसा ही है जैसे बिन डाली के फूल।
चलिए शाहरुख और गौरी का बच्चा तो किराए की कोख में पला। हो सकता है कि गौरी को अपने फिगर की चिंता हो गई हो और कुछ ऐसा ही किस्सा सोहेल खान और उनकी वाइफ का भी रहा होगा जिन्होंने छोटे बेटे के लिए सरोगेसी का सहारा लिया लेकिन करण जौहर का मामला तो जरा टेढ़ा ही है।
कहा जा रहा कि इन्होंने अपने दोनों बच्चों के लिए दो-दो मांओं की कोख को किराए पर लिया। क्यों ? ताकि इन्हें अपनी पसंद के जैनेटिक गुणों वाला, रंग-रूप वाले बच्चे मिल जाएं। अब अपनी पसंद के बच्चे पाने के लिए आप कितनी मांओं का शोषण करेंगे ?
चलिए अब दो-दो मांओं ने उन बच्चों को नौ-नौ महीनों तक अपनी कोख में रखा, तमाम तकलीफें सहीं, लेकिन क्या वो मां इतनी आसानी उन बच्चों को करण जौहर के हवाले कर पाई होगी ? इस दौरान तो उसका बच्चों से भावनात्मक जुड़ाव भी हो गया होगा..एक बार को उसने सोचा भी होगा कि वो पैसे लेने से मना कर दे और कह दे कि मुझे पैसे नहीं बच्चा चाहिए। लेकिन पैसों की मजबूरी के आगे वो कुछ ना कर पाई होगी। सोचो क्या बीती होगी उस मां के दिल पर जिसने अपने कलेजे के टुकड़ों को करण के हवाले किया। मां तो मां होती है और उसके इस गुण को उससे कोई नहीं छीन सकता।
लेकिन फिर से सवाल यही है कि ऐसा कदम उठाते वक्त इन बड़े लोगों का दिल नहीं पसीजता ? क्या इन्हें जरा भी उन मांओं की तकलीफों का अहसास नहीं होता ? क्या इनके लिए पैसा ही सबकुछ है जिसके बल पर ये बड़े लोग कुछ भी हासिल कर सकते हैं ? अब तुषार कपूर को ही ले लीजिए। जो एक्टर शादी करके घर बसा सकता था और अपने बच्चे पैदा कर सकता था, उसने भी पार्टनर की अहमियत तो ताक पर रखकर खुद बच्चे पालने का फैसला किया...और सरोगेसी के जरिए उनका ये सपना पूरा भी हो गया। लेकिन क्या बच्चे के लिए मां के प्यार की जरूरत नहीं ?
क्या वो भी ये जताना चाह रहे थे कि बच्चों के लालन-पालन के लिए पार्टनर की जरूरत नहीं। क्या एक महिला या मां सिर्फ सरोगेसी की फैक्ट्री है जिससे जब चाहे जो चाहे पैसे फेंककर बच्चे ले ले ? क्या उन मांओं की कोई अहमियत नहीं जो किसी मजबूरी के चलते अपनी कोख किराए पर देने को तैयार हो जाती हैं ? सरोगेसी के नाम पर उन मांओं का इतना शोषण क्यों ?
शुक्र है कि आने वाला सरोगेसी बिल सरोगेट मांओं के लिए लाभकारी होगा। ये बिल ना सिर्फ ऐसी मांओं के शोषण पर लगाम लगाएगा बल्कि उन्हें अपने बच्चों से मिलने की छूट भी देगा।