इन दिनाें फिल्मों के टाइटल बड़ी बहस की वजह बन गए हैं। थोड़ा सा भी विवादित नाम आते ही सोशल मीडिया पर विरोध शुरू हो जाता है। किसी को टाइटल आपत्तिजनक लगता है। किसी को धार्मिक भावनाएं जुड़ी दिख जाती हैं। वहीं, कई लोग इसमें राजनीतिक संदेश भी खोज लेते हैं। यही वजह रही कि ‘द केरल स्टोरी 2’, ‘घूसखोर पंडित’ और ‘यादव जी की लव स्टोरी’ जैसी फिल्मों के मामले सीधे अदालत तक जा पहुंचे। अब इस मामले को लेकर अमर उजाला ने इन फिल्मों से जुड़े कलाकारों या मेकर्स से और कुछ जानकारों से बात की और पता लगाया कि कैसे तय होते हैं टाइटल?
कैसे तय होता है फिल्मों का टाइटल?
हाल ही की विवादित फिल्मों पर अब तक क्या हुआ?
फिल्म रिलीज से पहले ही मुझे धमकियां मिलने लगीं: डायरेक्टर अंकित भड़ाना
फिल्म ‘यादव जी की लव स्टोरी’ के निर्देशक अंकित भड़ाना कहते हैं, 'फिल्म अभी रिलीज भी नहीं हुई है और कुछ लोग सिर्फ नाम देखकर फैसला सुना रहे हैं। मैंने नहीं सोचा था कि टाइटल पर इतनी गर्मी पैदा हो जाएगी। कई लोग बिना कहानी समझे ही माहौल बिगाड़ने में लगे हैं। मेरी गाड़ी पर हमला हुआ। मुझे थप्पड़ मारने के लिए इनाम रखा गया और जान से मारने की भी धमकी दी जा रही है। लेकिन सत्य को रोका जा सकता है, हराया नहीं। मुख्य किरदार अभीमन्यु यादव है। टाइटल उसी से है। इसे ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे पूरा समुदाय निशाने पर हो। यह सीधी-सीधी गलतफहमी फैलाना है। सिर्फ नाम देखकर किसी फिल्म को ‘कम्युनिटी टारगेट’ कहना नाइंसाफी है। फिल्म आएगी तब असली बात सामने होगी।'
मजेदार कहानी थी, पर टाइटल देखकर लोग कुछ और समझे: घूसखोर पंडित एक्टर सुमीत
‘ये एक मजेदार कहानी है। इतनी सीरियस बात नहीं थी। हमें खुद यकीन नहीं हुआ कि सिर्फ नाम पर इतना बड़ा विवाद हो सकता है। जब शूट कर रहे थे, हमें टाइटल तक नहीं पता था। बाद में पता चला तो विवाद शुरू हो चुका था। मनोज सर का किरदार बेहद फन-लविंग है, लेकिन टाइटल देखकर लोग कुछ और समझ बैठे। अब उम्मीद है कि नया टाइटल कहानी के हिसाब से होगा और अनावश्यक विवाद से बाहर निकलेगा।’
पहले इतना तमाशा नहीं होता था: अभय सिन्हा, इम्पा के अध्यक्ष
‘आज फिल्म का टाइटल पास करना सबसे मुश्किल काम हो गया है। पहले नामों पर इतना विवाद नहीं होता था। आज हर नाम पर लोग धार्मिक या राजनीतिक एंगल ढूंढ लेते हैं। इसके चलते हमें भी बहुत सावधानी रखनी पड़ती है।’
कुछ लोग 10–10 टाइटल बुक कर लेते थे: संग्राम शिर्के, अध्यक्ष, वेस्टर्न इंडिया फिल्म एंड टीवी प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन
‘टाइटल पर आज पहले से कहीं ज्यादा सतर्कता बरती जाती है। हम IMPAA के साथ मिलकर टाइटल बुक करते हैं। सबसे पहले देखते हैं कि कहीं दो फिल्मों का नाम एक जैसा न हो, वर्ना सीधे प्रोड्यूसर का नुकसान होता है। पहले तो कई लोग 10 टाइटल बुक कराकर बैठ जाते थे और बाद में दूसरों को ब्लैकमेल करते थे। ऐसे में अब हमने हर टाइटल को तीन साल के लिए ही मान्य कर दिया है। अगर फिल्म नहीं बनती तो टाइटल वापस ले लेते हैं।’
इन फिल्मों के नाम पर भी हुए विवाद