मुंबई आतंकी हमले पर रामगोपाल वर्मा 'द अटैक्स ऑफ 26/11' नाम की फिल्म लेकर आ रहे हैं। इसके रिलीज होने से पहले ही बवाल मच गया है। देश की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों ने इस पर एतराज जताया है, जबकि गृह मंत्रालय ने सेंसर बोर्ड को इसके कुछ आपत्तिजनक दृश्यों की समीक्षा करने के लिए कहा है।
हॉलीवुड की तुलना में भारतीय सिनेमा में सत्य घटना पर आधारित फिल्म बनाना कभी भी आसान नहीं रहा। कई निर्माता-निर्देशक ऐसी फिल्में बनाने का साहस करते हैं, लेकिन देश के नीति-निर्माता और कुछ वर्गों के विरोध के कारण यह कोशिश अक्सर बेहद मुश्किल साबित होती है। फिल्म फ्लोर पर आने से पहले ही इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया जाता है। इनका नकारात्मक प्रचार शुरू हो जाता है।
इन फिल्मों पर कभी तथ्यों से छेड़छाड़ तो कभी भावनाएं भड़काने का आरोप लगता है। कई आशंकाओं के बीच बहुचर्चित दिल्ली गैंगरेप की घटना को भी बड़े पर्दे पर लाने की तैयारी है। बंगाली फिल्म निर्भया के निर्देशक ने इसमें गैंगरेप की घटना के बाद हुए प्रदर्शनों पर फोकस करते हुए यह सवाल उठाया है कि क्या उस समय युवाओं के गुस्सा निकालने के बाद अब महिलाएं सुरक्षित हो गई हैं?
राजस्थान के बहुचर्चित भंवरी देवी प्रकरण पर भी केसी बोकाडिया 'द डर्टी पोलिटिक्स' नाम से फिल्म बना रहे हैं, वहीं वीरप्पन के जीवन पर केंद्रित फिल्म तमिल व कन्नड भाषा में बनाई गई है। 'वीरप्पन अट्टाहासा' पर भी सेंसर बोर्ड ने कई सवाल खड़े किए थे। पिछले कुछ वर्षों में 'रंग दे बसंती', 'मौसम', 'डर्टी पिक्चर', 'पान सिंह तोमर', 'नो वन किल्ड जेसिका', 'वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई', 'रक्त चरित्र', 'शूटआउट एट लोखंडवाला', 'ओए लकी लकी ओए', 'शूट ऑन साइट', 'चक दे', 'सत्या', 'ब्लैक फ्राइडे', 'रागिनी एमएमएस', 'एक्सीडेंट ऑन हिल रोड', 'बवंडर', 'जोधा-अकबर' जैसी कई हिंदी फिल्में आईं जो असल जिंदगी पर आधारित थीं।
'डर्टी पिक्चर' में दक्षिण की हीरोइन सिल्क स्मिता, 'पान सिंह तोमर', भारतीय सेना के अधिकारी, 'नो वन किल्ड जेसिका' में एक बार में काम करने वाली 'जेसिका लाल', 'रागिनी एमएमएस' में दिल्ली की एक लड़की की कहानी को फोकस किया गया था। इनमें से अधिकतर फिल्मों ने भले ही आलोचकों से सराहना पाई, लेकिन उन्हें प्रदर्शन से पहले और बाद में कई विवादों का सामना करना पड़ा। हॉलीवुड' 'टाइटैनिक', 'डोनी ब्रास्को', 'द परस्यू ऑफ हैप्पीनेस', 'द पियानिस्ट', 'कैच मी इफ यू कैन', 'ब्लैक हॉक डाउन', 'म्यूनिख', 'इंटू द वाइल्ड' जैसी सत्य घटनाओं पर आधारित कई सुपरहिट फिल्मों से अटा पड़ा है।
यूं तो आमतौर पर भारतीय काफी भावुक होते हैं, लेकिन लगता है कि वे फिल्मों को सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन का माध्यम मानते हैं। इसी कारण वे सिनेमाहॉल में सच देखने से बचते हैं। ऐसा लगता है कि भारतीय समाज सच की बात तो बहुत करता है, लेकिन उसे सच से नजरें मिलाने में दिक्कत होती है। अगर हम पश्चिमी देशों की तरफ देखें तो वहां तमाम ऐसे उदाहरण हैं, जब बेहद विवादास्पद विषय पर बनाई गई फिल्म बिना किसी झगड़े-झंझट के रिलीज हो गई।