कई बार आप कुछ ऐसा देख लेते हैं कि जी धक-से रह जाता है और हैरान मन में सवाल उठता हैः वह क्या था!! जोया अख्तर की दिल धड़कने दो भी ऐसी ही फिल्म है। दो घंटे पचास मिनट की लंबी ऊब के बाद अंततः आप राहत की सांस लेते हैं। आखिर वह क्या है जो दो फिल्म बाद ही फिल्मकार को पतन की राह पर डाल देता है? फिल्म में जोया अपनी जिंदगी के ऐसे क्रूज पर नजर आती हैं, जहां उन्हें बाहरी संसार की खबर नहीं है।
टेलीविजन पर आप जो कड़ी-दर-कड़ी कभी खत्म न होने वाले लक-दक-चमकदार पारिवारिक ड्रामे देखते हैं, जिनमें कोई खुश नहीं है, बिजसनेस एंपायर ध्वस्त हो रहे हैं, एक-दूसरे से जलन-कुढ़न है, प्रेम कहानियों के बीच बेवफाई है, व्यवसाय बचाने के लिए रिश्ते जोड़े जा रहे हैं... वही सब दिल धड़कने दो में है। जबकि आप अपनी जिंदगी में पाते हैं कि महंगाई कम नहीं हो रही है। मानसून की देरी डरा रही है। दफ्तर और घर में संतुलन बैठाने का तनाव हैं।
भागदौड़ के बीच खुद स्वस्थ रखना है। मनोरंजन की सख्त जरूरत है। जो इस फिल्म में नहीं है। रही सही कसर तब पूरी हो जाती है जब अनुष्का शर्मा अपने बॉम्बे वेलवेट वाले अवतार में पर्दे पर उतरती हैं और रोकते-रोकते भी अंततः यह खयाल मन में सिर उठा ही लेता है कि दिल धड़कने दो थोड़े रंगीन और फैमेली पैकेज में आखिरकार दूसरी बॉम्बे वेलवेट ही है।
कुछ भी उत्तेजक या मनोरंजक नहीं
फिल्म में तथाकथित सितारों की भीड़ है। प्लास्टिक के डिब्बे बनाने की फेक्ट्रियां चलाने वाले कमल मेहरा (अनिल कपूर) की शादी को तीस साल पूरे हो रहे हैं और वह पत्नी (शेफाली शाह) समेत विवाहित बेटी (प्रियंका चोपड़ा), दामाद (राहुल बोस), नाकाबिल बेटे (रणवीर सिंह) और ढेर सारे रिश्तेदारों, व्यावसायिक मित्रों को एक विशाल क्रूज (पानी का जहाज) पर लंबी पार्टी के लिए बुलाते हैं।
जहाज तुर्की होता हुआ यूरोप की तरफ बढ़ता है। आप पाते हैं कि मेहरा’ज परिवार बिखरा हुआ है। कमल के पत्नी से रिश्ते ठीक नहीं हैं। बेटी-दामाद भी एक-दूसरे से असंतुष्ट हैं। बेटा बिजनेस एंपायर संभालने के काबिल नहीं है। अन्य किरादारों की भी छोटी-छोटी कहानियां हैं। बढ़ते हुए जहाज के साथ रिश्तों के सिलसिले बढ़ते हैं, मगर कुछ भी उत्तेजक या मनोरंजक नहीं होता। आपके तीन घंटों पर पानी फिर जाता है।
फिल्म न हंसाती है, न रुलाती है
फिल्म की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह किसी मुकाम पर आपको अपने साथ जोड़ नहीं पाती। सब कुछ बनावटी लगता है। फिल्म न हंसाती है, न रुलाती है। भावुक परिस्थितियों में संवाद ऐसे हैं मानो अंग्रेजी में लिख कर उनका हिंदी तर्जुमा किया गया हो।
किसी किरदार में वह चमक नहीं दिखती कि बांध सके। अनिल कपूर, रणवीर सिंह और प्रियंका चोपड़ा के हिस्से एक-एक, दो-दो सीन आए हैं जहां वह धूमकेतु की तरह छटा बिखेरते हुए निकल जाते हैं। बाकी सब औसत हैं। जोया ने क्रूज पर कहानी को फिल्माया है, मगर आपको कहीं भी जहाज की खूबसूरती या उसमें रचने-बसने वाला माहौल नहीं दिखता, जिसकी उम्मीद की जाती है। वैसे टाइटैनिक से तुलना करना बेमानी होगा, मगर बात निकली है तो फिर...। पहली दो फिल्मों में जोया ने जितनी उम्मीदें जगाई थीं, इस फिल्म में वह उतनी ही निराश करती हैं। गीत-संगीत-नृत्य प्रभावित नहीं करता। यहां तक कि कैमरावर्क भी औसत है। समुद्र के बीच एक जहाज से देखे जाने वाले मनोहारी दृश्य यहां गायब हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि जोया ने फिल्म की कहानी मेहरा परिवार के पालतु कुत्ते प्लूटो के मुंह से कहलवाई है। यह बेहद हास्यास्पद है। जोया श्वान-मुख से कथा-कहन का कोई तर्क पेश नहीं करतीं। संभवतः ऐसा उन्होंने इसलिए किया हो कि बॉलीवुड में अच्छे लेखकों का अकाल मान लिया गया है। सो उन्होंने एक कुत्ते को कहानी कहने का मौका दिया!! कुत्ते के मुंह से आप इंसानी रिश्तों पर घिसे-पिटे-बचकाने फलसफे सुनना चाहें तो जरूर फिल्म देख सकते हैं।