क्रिमिनल जस्टिस सीजन 3
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माधव मिश्रा की कमजोर वापसी
वेब सीरीज ‘क्रिमिनल जस्टिस’ (Criminal Justice Season 3) की मूल समस्या इसके विचार में है। इसमें कहानी कहने का तरीका आराम से खरामा खरामा आगे बढ़ता है और हिंदी वेब सीरीज और फिल्में देखने वालों को रोमांच और रफ्तार चाहिए। दो सीजन तक मामला विक्रांत मैसी और कीर्ति कुल्हारी ने किसी तरह मामला संभाला, इस बार सब कुछ पंकज त्रिपाठी के भरोसे है। वेब सीरीज ‘क्रिमिनल जस्टिस’ (Criminal Justice) के तीसरे सीजन की कहानी में सीरीज के हीरो माधव मिश्रा को एक किशोर को बचाना है। इल्जाम उस पर अपनी सौतेली बहन के कत्ल का है। बहन छोटे परदे की सुपरहिट बाल कलाकार है। मां दोनों की एक है।
पटकथा गढ़ने में चूक गई सीरीज
कत्ल होता है। लाश मिलती है। पहले एपीसोड में ही बता दिया जाता है कि घर का खर्चा बाल कलाकार की कमाई से चल रहा है। सो कत्ल होने के बाद अब उनके पास पैसा नहीं है और माधव मिश्रा केस की जिम्मेदारी अपने माथे ले लेते हैं। लेकिन, तीसरे एपीसोड में ही मां कहती है कि पैसों की चिंता मत कीजिए। अगर पैसा इतना इफरात है तो फिर वकील माधव मिश्रा क्यों? माधव मिश्रा की अपनी परेशानियां हैं। घर उनकी पत्नी को ब्यूटी पार्लर खोलना है। बड़ा हो चुका एक बच्चा है जो बाल कलाकार का फैन दिखता है। इस सबके बीच पता नहीं चलता कि कब पंकज त्रिपाठी परदे पर हैं और कब माधव मिश्रा। मीडिया का सर्कस शुरू होता है और पुलिस की तफ्तीश दिखाई नहीं जाती, बताई जाती है।
पंकज त्रिपाठी क्रमिनल जस्टिस सीजन 3
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विदेशी सीरीज का कमजोर अनुकूलन
बीबीसी स्टूडियोज की हिट सीरीज के हिंदी रूपांतरण वेब सीरीज ‘क्रिमिनल जस्टिस’ (Criminal Justice) के साथ भी वही दिक्कत है जो अप्लॉज एंटरटेनमेंट की उधार की विदेशी कहानियों में शुरू से रही है। इनका लेखन भारतीय दर्शकों की सोच और पसंद के हिसाब से नहीं है। कंपनी ने इसके लिए कोई ऐसा सलाहकार भी नहीं रखा है जो उनको बता सके कि गड़बड़ी कहां हो रही है। सीरीज अंग्रेजी सीरीज के दर्शकों की पसंद के हिसाब से बनी है लेकिन भौगोलिक स्थितियां पूरी तरह बदल जाने के बाद भी इसका लेखन वैसा ही रहता है। एक लाइन में कहें तो सीरीज में करंट नहीं है। सुस्त सा लेखन और ऊपर से निर्देशन भी ऐसा जैसे कि बस एक सीरीज बना देने भर के लिए रोहन सिप्पी लगे हुए हैं।
रोहन सिप्पी का निर्देशन बेरंग
रोहन सिप्पी के निर्देशन में सिप्पी सरनेम वाली बात नहीं है। वह कलाकारों को उनका स्पेस दिखाकर छोड़ तो देते हैं लेकिन ना तो कलाकारों में और ना ही उनके संवादों में कहीं कोई बात ऐसी नजर आती है कि लगे, वाह! क्या बात है। अपनी पटकथा और निर्देशन में मात खाए ‘क्रिमिनल जस्टिस- अधूरा सच’(Criminal Justice Season 3) का काम भी आधा अधूरा ही है। पंकज त्रिपाठी अब कैसे बोर करने लगे हैं, ये मैं बता ही चुका हूं। सीरीज में मौजूद दो दमदार कलाकार पूरब कोहली और स्वास्तिका मुखर्जी को भी पूरी तरह जाया कर दिया गया है। ना उनके किरदार ढंग से गढ़े गए हैं और ना ही उन्हें अपनी कूवत दिखाने के लिए सीन ही अच्छे मिले। श्वेता बसु प्रसाद पूरी कोशिश करती हैं प्रभावित करने की, लेकिन उनके अपने किरदार के कन्विक्शन को लेकर शक होने लगता है।
युवा कलाकारों में चमक नहीं
सीरीज की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी हैं, इसमें लिए गए युवा कलाकार। इनके पास परदे पर खुद को चमकाने का मौका बेहतरीन था। लेकिन, जैसे जैसे सीरीज आगे बढ़ती है, किशोरावस्था के अपराधों पर केंद्रित ये सीरीज अपने मकसद से तो भटकती ही है, शूटिंग से पहले सीरीज बनाने के लिए की गई अधूरी तैयारियों की पोल भी खोलती है। यही इस सीरीज का पूरा सच है।
देखें कि न देखें
तकनीकी तौर पर भी वेब सीरीज ‘क्रिमिनल जस्टिस- अधूरा सच’ (Criminal Justice Season 3) औसत से कमतर है। विदेशी वेब सीरीज का पूरा का पूरा खाका उठाकर उसमें हिंदुस्तानी कहानी फिट करने की ये कोशिश इस बार काम नहीं करती। सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक सब ऐसा लगता है कि खुद को इसी सीरीज के दृश्यों में दोहरा रहा है। संपादन भी ऐसा है कि लाश मिलने के सीन में पुलिस की गाड़ियों के पीछे भागने के लिए खड़े अतिरिक्त कलाकारों का मूवमेंट एडीटर निर्देशक के एक्शन बोलने के तुरंत बाद हुई हलचल के साथ पकड़ना शुरू कर देता है। ऐसी कहानियों के एपीसोड 30 मिनट से ज्यादा होने भी नहीं चाहिए। पंकज त्रिपाठी की तमाम कोशिशें और मेहनत भी इस सीरीज को बचा पाने में नाकाम हैं।