सेंसर बोर्ड के एक निर्णय के तहत ‘आपत्तिजनक’ और ‘गाली गलौच’ वाले 28 शब्दों की सूची बनाई गई थी जिनका फिल्मों में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। इस मामले पर बीते सोमवार केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की बैठक होनी थी।
बैठक में निर्णय लिया गया कि 2003 में बनाई गई इन आपत्तिजनक शब्दों की सूची पर समाज के विभिन्न वर्गों से अभी और विचार विमर्श करने की आवश्यकता है।
आपको बता दें, सेंसर बोर्ड की इस सूची को लेकर बॉलीवुड में काफी बवाल मचा हुआ है। ये बवाल अनुष्का शर्मा की फिल्म 'NH10' से शुरू हुअा औश्र अब इस पर बॉलीवुड की दिग्गत हस्तियां भी अपना विरोध जता रही हैं।
फिल्ममेकर दिबाकर बनर्जी सेंसर पर नाराज होते हुए कहते हैं कि सेंसर बोर्ड का काम फिल्मों को सेंसर करना नहीं है। बल्कि उन्हें फिल्मों को श्रेणीबद्ध करना चाहिए कि फिल्म किस उम्र के दर्शक के लिए है।
इसी मामले पर फिल्ममेकर विधु विनोद चोपड़ा का कहना है कि अगर सेंसर बोर्ड को फिल्म बोल्ड या एडल्ट लगती है। या फिल्म में आपत्तिजनक शब्द हैं तो सेंसर बोर्ड उसे ए सर्टिफिकेट दे सकता है। ये बेहद बेवकूफाना है कि सेंसर बोर्ड तय करेगा कि फिल्मकार को क्या कंटेंट चुनना है।
गब्बर गाली नहीं तो क्या प्रवचन देगा?
सेंसर बोर्ड की ओर से कई श्ाब्दों को आपत्तिजनक बताते हुए उनके फिल्मों में प्रयोग पर लगाई गई पाबंदी का विरोध और भी कई जगहों पर शुरू हो गया है। अधिकतर फिल्मकारों के मुताबिक यदि गालियां अभिव्यक्ति का हिस्सा हैं, तो उन्हें जबरन हटाया नहीं जा सकता। फिल्म पिंजर के निर्देशक डा. चंद्र प्रकाश द्विवेदी भी फिल्म निर्माण के लिए शब्दों की लक्ष्मण रेखा निर्धारित करने के फैसले को सही नहीं मानते।
एक फिल्मकार के नाते सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी के फैसले से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं। यह सही है कि गालियां रचनात्मकता का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन दूसरी हकीकत यह भी है कि यह हमारे समाज का अंग हैं।
वे कहते हैं ‘शोले’ में गब्बर गालियां देता है, क्योंकि वह उसके किरदार की मांग है। अब गब्बर जैसा डकैत प्रवचन तो नहीं देगा। रचना के संसार को निश्चित शब्दों की परिधि में नहीं बांधा जा सकता।
वे आगे कहते हैं एक सवाल यह भी है कि सेंसर बोर्ड ने जिन तमाम शब्दों पर प्रतिबंध लगाया है, क्या वह उन पुरानी फिल्मों पर भी लागू होगा, जिनमें यह शब्द प्रयोग किए गए हैं ? क्या ऐसी फिल्मों के टीवी प्रसारण पर रोक लगा दी जाएगी। ऐसा संभव नहीं है, जाहिर है कि सेंसर बोर्ड की ओर से लगाया गया प्रतिबंध पूरी तरह अतार्किक है।
फिल्मकारों ने सेंसर बोर्ड की राय पर ऐतराज जताया है और फैसले को वापस लेने की मांग की है। फिल्मकार समुदाय के सदस्य के तौर पर मैं भी ऐसी सेंसरशिप के खिलाफ हूं। जरूरत पडे़गी तो हम इस फैसले का विरोध ही नहीं, इसके खिलाफ संघर्ष भी करेंगे और अदालत तक जाएंगे।
यहां ‘एआईबी’ भी बनता है
पिछले दिनों एक खास शो ‘एआईबी’ (All India Bakchod) कॉमेडी रोस्ट शो के एक चैरिटी कार्यक्रम को लेकर खासा विवाद हुआ था। जिसके बाद इस कार्यक्रम के आयोजकों पर केस तक दर्ज हुए। यह भारत में अपनी तरह का पहला रोस्ट कॉमेडी शो है। इस कार्यक्रम में गेस्ट को मजाकिया ढंग से गालियां भी दी जाती हैं।
20 दिसंबर, 2014 को मुंबई के एक स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में बॉलीवुड अभिनेता रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर ने शालीनता की सारी सीमीएं पार कर दीं। कार्यक्रम में रणवीर और दीपिका को लेकर भी मजाक बना। 4000 लोगों की मौजूदगी में हुए कार्यक्रम को लेकर विवाद तब हुआ, जब मुंबई में ब्राह्मण एकता सेवा संस्था ने इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए और एआईबी को यूट्यूब पर जारी शो का वीडियो हटाना पड़ा।
यहां सेंसर नहीं रेटिंग होती है
अमेरिकी सिनेमा जगत हॉलीवुड की कुछ फिल्मों में कामुक दृश्य दिखाए जाने को लेकर 1920 के दशक में तीखा विरोध हुआ था। जिसके बाद 1930 में ‘मोशन पिक्चर्स प्रोडक्शन कोड’ नामक संस्था का गठन किया था, जो फिल्मों के लिए दिशानिर्देश तय करने और उन्हें प्रमाणित करने का काम करती थी।
लेकिन धीरे-धीरे अमेरिकी समाज में अर्धनग्न, यौन दृश्यों और द्विअर्थी शब्दों को लेकर सोच बदली और 1968 में इस संस्था को भंगकर दिया गया और इसी साल एक नवंबर को मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन ऑफ अमेरिका नाम की संस्था का गठन किया गया। जिसका काम फिल्मों को रेटिंग जारी करना है।
इसके तहत चार श्रेणियां निर्धारित की गई हैं, सामान्य के लिए जी, मैच्योर कंटेंट वाली फिल्मों के लिए एम, एडल्ट फिल्मों के लिए आर और यौन दृश्यों वाली फिल्मों के लिए एक्स श्रेणी निर्धारित की जाती है।
अपनी फिल्मों को सेंसर करेंगे निहलानी?
फिल्मकार पहलाज निहलानी ने भले ही गालियों और द्विअर्थी शब्दों पर बैन का फैसला सुनाया हो। लेकिन खुद उनकी बनाई फिल्मों के संवादों और गानों में द्विअर्थी शब्दों का जमकर प्रयोग हुआ है।
निहलानी ने अपने कैरियर में शोला और शबनम, अंदाज, आंखें, आग का गोला और गुनाहों का फैसला आदि कई हिट फिल्में बनाई हैं। निहलानी की इन फिल्मों पर निगाह डालें तो इनमें तमाम द्विअर्थी संवाद और गीतों के बोल हैं।
गोविंदा स्टारर निहलानी की अधिकतर फिल्मों की पहचान इनके गीत बने हैं। जिनमें धड़ल्ले से द्विअर्थी शब्द प्रयोग में लाए गए हैं। ‘आंखे’ के गीत ‘अंगना में बाबा, द्वारे पे मां, कैसे आएं गोरी हम तोहरे घर मां। खेत गए बाबा, बाजार गई मां, अकेली हूं घर में तू आ जा बालमा। ’ में द्विअर्थी शब्दों का जमकर प्रयोग हुआ है। अहम सवाल यहा है कि निहलानी क्या अपनी ही इन फिल्मों को सेंसर करेंगे।
तो क्या बनती यह फिल्में
सेंसर बोर्ड की ओर से जिन शब्दों को प्रतिबंधित किया गया है, उनका इस्तेमाल न सिर्फ गुजरे दौर की ‘शोले, ‘तिरंगा’ और ‘क्रांतिवीर’ जैसी मशहूर फिल्मों में किया गया है, बल्कि हालिया दौर में आईं ओमकारा, दंबग, डेल्ही बेल्ही, बैंडिट क्वीन, देव-डी, पीपली लाइव, गैंग्स ऑफ वासेपुर-1 और गैंग्स ऑफ वासेपुर-2 में जमकर किया गया है।
इसके अलावा बिहार के अंखफोड़वा कांड की पृष्ठभूमि पर बनी अजय देवगन स्टारर ‘गंगाजल’ में गालियों का जमकर प्रयोग किया गया है। ‘ओमकारा’ में लंगड़ा त्यागी की भूमिका में सैफ अली खान हों या ‘दबंग’ में चुलबुल पांडे बने सलमान खान, दोनों ही चरित्रों ने गालियों का बखूबी इस्तेमाल किया है।
यह शब्द फिल्म की पटकथा की मांग को भी पूरा करते हैं और संवाद में भी नई जान डालते हैं। लेकिन सेंसर बोर्ड ने अब इन शब्दों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। यदि यह प्रतिबंध पहले से लागू होता तो क्या यह चर्चित फिल्में बनतीं?
क्या वापस लेंगे पुरस्कार
जिन शब्दों को प्रतिबंधित किया गया है, ऐसे कई शब्दों के इस्तेमाल वाली तमाम फिल्मों ने राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते हैं। इनमें प्रमुख हैं- ओमकारा, द डर्टी पिक्चर, चांदनी बार, विक्की डोनर, दबंग जैसी फिल्मों में पटकथा की मांग के अनुसार द्विअर्थी शब्दों और गालियों का धड़ल्ले से प्रयोग हुआ है। तो क्या इन फिल्मों को मिले पुरस्कार भी वापस लिए जाने चाहिए।
सेंसर बोर्ड ने ऐसे शब्दों पर लगाया बैन
हरामजादा, हरामी, हराम का पिल्ला, भड़वा/दल्ला, साली आदि।
मारना, लेना, देना, बजाना और फटना जैसे शब्द।
महिलाओं के प्रति हिंसात्मक शब्द।
दोहरे अर्थों वाले शब्द।
रक्तपात और खूनी दृश्यों का महिमामंडन। ‘बांबे’ की जगह ‘मुंबई’ शब्द के प्रयोग का आदेश।
गालियों से हुए मशहूर
‘सुअर के बच्चों’, ‘और ये तीन हरामजादे, ये गब्बर सिंह का नाम पूरा मिट्टी में मिला दिए’, ‘तीनों बच गए, तीनों हरामजादों को गोली नहीं लगी’ जैसे संवाद शोले में गब्बर की भूमिका निभा चुके अमजद खान की पहचान बन चुके हैं।
गब्बर का किरदार ‘शोले’ का सबसे बड़ा आकर्षण है और गालियां इस किरदार के साथ जैसे रची-बसी हों। लेकिन यदि इन्हें निकाल दिया जाए तो क्या गब्बर की कल्पना की जा सकती है! इसी तरह धर्मेंद्र ने ‘कुत्ते कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा’ डायलॉग कई फिल्मों में दोहराया है।
धर्मेंद्र के संवादों का जिक्र आते ही यह डायलॉग हर किसी के जेहन में आता है। इसका पहली बार प्रयोग धर्मेंद्र ने ‘यादों की बारात’ फिल्म में किया था। इसके अलावा अपराध जगत पर बनी फिल्म ‘लोहा’ में तो उन्होंने ‘हरामीपन की बदबू आ रही है तेरी बातों से।
अब तो पक्की हो गई तेरी मौत मेरे हाथों से’ जैसे डायलॉग बोले हैं, जो आपराधिक पृष्ठभूमि पर बन रही फिल्म की स्वाभाविक मांग थे।
तो कैसे होगी ‘ग्रैंड मस्ती’
पिछले दिनों आई कॉमेडी फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ के सेंसर बोर्ड ने कुल 218 सीन काटे थे। इससे पहले किसी भी फिल्म पर इतनी कैंची नहीं चली थी।
यही नहीं कांस फिल्म महोत्सव 2012 में पहुंची ‘मिस लवली’ से भी सेंसर बोर्ड ने करीब 157 सीन काटे थे। जिसके बाद ही उसे ‘ए’ सर्टिफिकेट जारी किया गया।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी और निहारिका सिंह स्टारर फिल्म के निर्देशक असीम अहलुवालिया ने सेंसर बोर्ड के बारे में अपने कटु अनुभव साझा करते हुए कहा, ‘इसे भारत में रिलीज करवाने के लिए सेंसर बोर्ड की इजाजत लेने में मुझे एक वर्ष लग गए।’
यह फिल्म 1980 के दशक की सी ग्रेड फिल्म जगत की कहानी कहती है। बोर्ड ने फिल्म की चार बार समीक्षा करने के बाद फिल्म रिलीज करने की इजाजत दी। इसके अलावा ‘डर्टी पिक्चर’ में 100, गैंग्स ऑफ वासेपुर में 100 और डेल्ही बेल्ही में 20 कट लगे थे।
फिल्मकारों की राय
परेश रावल, अभिनेता एवं भाजपा सांसद
यह सभी फिल्मकारों को आस्था चैनल के लिए फिल्म बनाने को बाध्य करने जैसा है। आपको कोई नया जोक सुनना हो तो आप सेंसर बोर्ड के नए दिशानिर्देश पढ़ें।
शबाना आजमी, अभिनेत्री एवं महिला कार्यकर्ता
यह सेंसर बोर्ड नहीं है, बल्कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड है। जिसे फिल्मों में काटछांट नहीं, बल्कि सिर्फ फिल्मों को प्रमाणित करने का काम करना चाहिए।
राहुल ढोलकिया फिल्म निर्माता
यह मोरल पुलिसिंग जैसा है। आगे क्या होगा, शायद अब लोगों को कहा जाएगा कि वह चप्पल उतारकर ही थियेटर में जाएं और पॉपर्कान की बजाय नारियल हाथों में होना चाहिए।
निखिल आडवाणी फिल्म निर्माता
यानी अब अनुराग कश्यप जैसे निर्माता भारत में फिर कभी कोई फिल्म नहीं बना पाएंगे। यह आदेश रचनात्मकता पर हमले जैसा है।
अशोक पंडित, सदस्य, सेंसर बोर्ड एवं फिल्मकार
‘क्या बोर्ड अध्यक्ष ने जिन ‘गलत’ शब्दों पर बैन का आदेश नहीं दिया है, उन्हें फिल्मों में इस्तेमाल किया जाएगा ? यह आजादी और फिल्मकार की रचनात्मक स्वतंत्रता के खिलाफ है।