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‘जिंदगी के थपेड़ों ने बहुत कुछ सिखाया’: कैलाश खेर बोले- देशभर में बेहतरीन संगीत की अलख जगाना चाहता हूं

Thu, 20 Jul 2023 07:46 AM IST
जलज मिश्रा रावी द्विवेदी, अमर उजाला

सार

कैलाश 2002 में मुंबई पहुंचे। उस समय रिकॉर्ड कंपनियां मनमानी शर्तें चलाती थीं। एल्बम निकालने की काफी कोशिशें कीं, पर यह कहकर खारिज कर दिया गया कि यह नहीं चलेगा। इसी बीच फिल्म के लिए गाया गया उनका गाना अल्लाह के बंदे हिट हो गया।
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कैलाश खेर। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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कैलाश खेर का नाम जुबान पर आते ही, जेहन में ऐसा भक्तिमय-सूफियाना संगीत गूंजने लगता है जो सबकुछ भुलाकर आपको ईश्वर से जोड़ता हो। एकदम अलग तरह की गायिकी के जरिये खास मुकाम हासिल करने वाले कैलाश खेर कहते हैं कि जिंदगी के थपेड़ों ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है। वक्त की छेनी-हथौड़ी से गढ़े जाने के दौरान उन्होंने जो सीखा, आज वही उनके संगीत में झलकता है। अपने संगीत के जरिये बच्चों, बुजुर्गों और युवाओं सभी को मंत्रमुग्ध कर देने वाले कैलाश खेर को तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपना नवरत्न बता चुके हैं।

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कैलाश खेर पिछले सात वर्षों से अपने जन्मदिन के मौके पर केक काटने या मोमबत्तियां बुझाने के बजाय कुछ नई प्रतिभाओं को अपना हुनर दिखाने का मौका देते हैं। इस बार 7 जुलाई को अपना पचासवां जन्मदिन मनाने वाले कैलाश खेर 21 जुलाई को नई उड़ान कार्यक्रम आयोजित करने जा रहे हैं। कोविड के बाद पहली बार ऑफलाइन आयोजित होने की वजह से इस बार कार्यक्रम कुछ दिन आगे खिसक गया है। पद्मश्री गायक ने इस मौके पर अमर उजाला से खास बातचीत में कहा, मेरे संघर्ष के दिनों में कोई गाइड करने वाला नहीं था। लेकिन अब नहीं चाहता कि तमाम हुनरमंद उन्हीं मुश्किलों को झेलें जो कभी मैंने सही हैं। वह देशभर में बेहतरीन संगीत की अलख जगाना चाहते हैं। 

संगीत के प्रति लगन ने क्रांतिकारी बनाया
कैलाश खेर थोड़ा हंसते हुए बताते हैं कि वह सामान्य बच्चों की तरह नहीं थे। बचपन से ही संगीत के प्रति एक जुनून था, जिसने उन्हें क्रांतिक्रारी बना दिया। वह कहते हैं, पिताजी पंडिताई करते थे और चाहते थे कि मैं भी यज्ञ-हवन और कर्मकांड करना सीखूं और विशारद-आचार्य की डिग्री लेकर कहीं मंदिर में पुजारी की जिम्मेदारी संभाल लूं। लेकिन मुझे बचपन से ही संगीत में कुछ करने की चाह थी। उन्हें यह कतई पसंद नहीं था। संगीत सीखने को लेकर पिता के साथ अनबन हुई तो कैलाश खेर घर से भाग गए। उस वक्त उनकी आयु महज 12-13 वर्ष ही थी। कैलाश खेर बताते हैं, इसके बाद जिंदगी का असली रंग देखा। खाने और जिंदगी चलाने के लिए बहुत जद्दोजहद करनी पड़ी। वह कहते हैं, सपने पूरे करने से पहले तो सर्वाइवल का संकट मुंह बाए खड़ा था। उनके मुताबिक, जिस तरह छेनी-हथौड़ी की मार से साधारण पत्थर मूर्ति का आकार ले लेता है, उसी तरह वक्त के थपेड़ों ने मुझे गढ़ा है। आज ये जो पद्मश्री कैलाश खेर सबके सामने है, उसे मुश्किल हालातों ने ही इन मुकाम तक पहुंचाया है। मैं इसलिए अक्सर कहता भी हूं, तुमने उत्पादों से सीखा है और मैंने हालातों से। लेकिन यह एक जुनून ही था कि वह न केवल गाने लिखते बल्कि संगीतबद्ध करने से लेकर उसे आवाज देने तक सब कुछ खुद ही करते रहे। 
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आसान नहीं रहा मुंबई में पैर जमाना
अपनी कला और मेहनत के दम पर पैर जमाने के लिए वह 2002 में मुंबई पहुंचे। कैलाश खेर बताते हैं कि उस समय रिकॉर्ड कंपनियां मनमानी शर्तें चलाती थीं। उन्होंने अपना एल्बम निकालने की काफी कोशिशें कीं लेकिन यह कहकर खारिज कर दिया गया कि यह नहीं चलेगा। वह बताते हैं, मुश्किल यह थी उस दौर में आज की जैसी सुविधाएं नहीं थीं। मैं अपना गाना खुद लिखता और खुद ही कंपोज करता था लेकिन रिकॉर्ड कंपनी की मदद बिना उसे लॉन्च करना मुमकिन नहीं था। बहरहाल, कैलाश खेर ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश करते रहे। इसी बीच उन्हें फिल्म के लिए गाने का मौका मिला और उनका गाना अल्लाह के बंदे हिट हो गया। कैलाश खेर बताते हैं कि उनकी गायिकी शुरू से ही आम फिल्मी गीतों से अलग तरह की थी और इसे लोगों की खूब सराहा। इस एक मौके ने उनके लिए सफलता के रास्ते खोल दिए। आखिरकार, कुछ साल पहले उन्हें मना कर चुकी एक रिकॉर्ड कंपनी ने उन्हें एल्बम रिकॉर्ड करने के लिए बुलाया। इसके बाद उनके एक के बाद एक तीन एल्बम हिट हो गए। उन्होंने बताया कि जब जनमानस ने तेरी दिवानी, सइयां, चांदन में जैसे एल्बम को हाथों-हाथ लिया तो एकदम कायापलट ही हो गई। 

संतों की संगत ने रंगत निखारी
कैलाश खेर बताते हैं कि शुरू से ही उनका झुकाव भक्तिमय संगीत की तरफ था। घर से भागने के बाद उन्होंने अपने बचपन का काफी हिस्सा आश्रमों में शरण लेकर गुजारा है। वह कहते हैं कि संतों की संगत ने उनके संगीत की रंगत निखारी है। हालांकि, वह भक्ति संगीत और भजन दोनों को अलग-अलग श्रेणी में रखते हैं। वह बताते हैं कि जब उन्होंने मुंबई में कदम रखा तो भक्ति संगीत के नाम पर भजनों का चलन था जो अमूमन फिल्मी गानों की तर्ज पर गाए जाते थे। लेकिन असली भक्ति संगीत वो है जो आपको समाधि की मुद्रा में ले जाए, ध्यान की मुद्रा में ले जाए। यानी एकदम दिल से जुड़ा हुआ हो। शायद यही वजह है कि उनके अलग तरह के गानों ने भक्ति संगीत में एक नई विधा ही जोड़ दी। वह बचपन से ही शास्त्रीय संगीत की गंभीरता से बेहद प्रभावित रहे हैं। उन्हें कुमार गंधर्व और भीमसेन जोशी जैसे शास्त्रीय गायकों को सुनना पसंद था। संगीत की औपचारिक शिक्षा के बारे में पूछे जाने पर कैलाश खेर ने कहा, गाना सीखना अमीरों के लिए एक शौक होता है लेकिन जब आप सामान्य परिवारों में जन्मे हों तो यह आसान नहीं होता। एक-दो बार सीखने की कोशिश की लेकिन समय से न पहुंच पाना, समय पर फीस न भर पाना, इसमें बाधा ही साबित हुआ। 



संगीत के प्रति जुनून ही है नई उड़ान 
कैलाश खेर बताते हैं कि संगीत को लेकर उन्हें बचपन से ही एक जुनून था और इसी ने उन्हें नई उड़ान जैसी पहल के लिए प्रेरित किया। वह कहते हैं, आम तौर पर कोई गायक किसी को लॉन्च नहीं करता है। लेकिन हम पिछले सात सालों से अपने जन्मदिन पर कला और गुणों का नया दीप प्रज्ज्वलित करते हैं। इसके लिए प्रतिभाएं तलाशने का काम सालभर चलता है। देश के कोने-कोने में जाकर संगीत में रुचि रखने वालों को तलाशते हैं और फिर उन्हें तराशकर अपनी प्रतिभा दुनिया के सामने लाने का मौका देते हैं। इस मंच पर मौका पाने वाले आगे भी बढ़ रहे हैं। कैलाश खेर बताते हैं कि उनके मंच की बदौलत अब तक 30-35 युवा संगीत की दुनिया में अपने पैर जमा चुके हैं। कैलाश खेर यह भी कहते हैं, संगीत एक ऐसी विधा है जिसमें कला के अलावा व्यक्तित्व भी बहुत मायने रखता है। आप बहुत अच्छे कलाकार है, लेकिन मनुष्य अच्छे नहीं है तो आपकी कला को भगवान का आशीर्वाद नहीं मिल सकता है। इसलिए उनका मंच युवाओं में कला को निखारने के साथ उनमें संस्कार भरने का भी काम करता है। उन्होंने बताया, हम जिन प्रतिभाओं को निखारते हैं, उन्हें यह भी सिखाते हैं कि कैसे अपने खाली वक्त में वह अपनी जैसी ही प्रतिभाओं का हाथ थामकर उन्हें आगे बढ़ सकते हैं। 
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एक और कैलाश खेर की तलाश...
कैलाश खेर चाहते हैं कि जिस तरह अपने गाने वह खुद ही गाते हैं, उसकी रचना भी खुद ही करते हैं, उसी तरह और कलाकारों की एक पूरी पौध तैयार कर सकें। यानी संगीत रचनाओं की जमीन उनकी अपनी हो, उपज भी उनकी हो, किसान भी वही हों और माली भी वह खुद ही हों। उन्हें गाने का मौका पाने के लिए किसी का मोहताज न होना पड़े। न इस पर निर्भर रहना पड़े कि गाना कौन लिखेगा या कौन उसे कंपोज करेगा और वह उनके मूड के मुताबिक होगा या नहीं। यह पूछे जाने पर कि क्या वह एक और कैलाश खेर तलाशने में सफल रहे हैं, वह खुद को इसके काफी करीब बताते हैं। नई उड़ान में अपना हुनर दिखाने के लिए इस बार 18 से 30 वर्ष आयु के 20 लोगों को मौका दिया जा रहा है। इसमें धनबाद के रचित अग्रवाल की गायिकी ने कैलाश खेर को काफी प्रभावित किया है। इसके अलावा अभिषेक मुखर्जी, मानसी भारद्वाज, रूपम भरनहिया, अजय तिवारी, मिस्मी बोस, मैथिली शोम, मयूराक्षी शोम, आरिया लाहा, आरती सत्यपाल, अनमोल जसवाल, रितेश राव, स्वरित केलकर, अथर्व बख्शी, आयुष्मान श्रीवास्तव, तेजस विंचुरकर, मिताली विंचुरकर, रौशन वर्मा, अंकिता ब्रम्हे और आयुषी मिश्रा को भी परफॉर्म करने का मौका दिया जाएगा। अपने संगीत के इस कारवां को आगे बढ़ाने के लिए कैलाश खेर पुलिस वेलफेयर कमेटी जैसे स्थानीय स्तर के तमाम समूहों को साथ जोड़ने की कोशिश में भी लगे हुए हैं।

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