गिरीश कर्नाड ने साल 1970 में कन्नड़ फिल्म से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की थी। उन्हें दूरदर्शन पर प्रसारित किए जाने वाले मशहूर शो मालगुड़ी डेज में स्वामी के पिता की भूमिका के लिए भी याद किया जाता है। उनकी मशहूर कन्नड़ फिल्में तब्बालियू मगाने, ओंदानोंदु कलादाली, चेलुवी, कादु और कन्नुड़ु हेगादिती रही हैं।
गिरीश कर्नाड ने एक बार कहा था, 'मैं कवि बनना चाहता था लेकिन मेरी थिएटर में भी रुचि थी, मेरा नाटक लेखक बनने का कोई इरादा नहीं था। स्कॉलरशिप मिलने के बाद मैं लंदन पहुंचा। उस समय एक धारणा थी कि यदि मैं विदेश जाऊंगा, तो मैं विदेश की किसी गोरी मेम से शादी कर लूंगा। तभी एक दिन मेरे मन में ययाति लिखने का विचार आया। इसके बाद जिंदगी में कई मोड़ आए।' उन्होंने कहा था कि नाटकों के लेखन-निर्देशन, अभिनय के अलावा फिल्म निर्देशन में भी आया।
गिरीश कर्नाड ने हिंदी फिल्मों में भी अपना हाथ अजमाया और इसमें भी सफलता पाई। हिंदी में उन्होंने 'निशांत', 'मंथन' और 'पुकार' जैसी फिल्में कीं। इसके अलावा सलमान खान के साथ वो 'एक था टाइगर' और 'टाइगर जिंदा है' में भी दिखाई दिए थे, यही उनकी आखिरी हिंदी फिल्म भी थी। उनकी आखिरी फिल्म कन्नड़ भाषा में बनी 'अपना देश' थी। साल 2019 में 10 जून को प्रतिभावान गिरीश कर्नाड ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
48 साल के अपने फिल्मी करियर में गिरीश कर्नाड ने 90 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। साल 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1974 में पद्मश्री, 1992 में पद्मभूषण पाने वाले गिरीश कर्नाड को अमर उजाला की ओर से आकाशदीप सम्मान दिया जा चुका है। भारतीय भाषाओं के सामूहिक स्वप्न के सम्मान में अमर उजाला फाउंडेशन द्वारा लेखन-जीवन के समग्र अवदान के लिए सर्वोच्च शब्द सम्मान 'आकाशदीप' दिया जाता है। यह सम्मान उन्हें साल 2018 में दिया गया था।