फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अपने बारे में खुद आपको बता रहे हैं दिलीप कुमार

Wed, 11 Dec 2013 11:26 AM IST
अमर उजाला दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
दिलीप कुमार क्या हैं? उनकी जिंदगी कैसे और किन हालातों में बीती यह खुद दिलीप कुमार बता रहे हैं। आज उनका जन्मदिन है।
विज्ञापन


पेशावर में बचपन की यादें

मेरा बचपन दादी और नानी के घरों में खूब बीता है। मैं शुरुआती दौर से ही खेलकूद में आगे रहा। बचपन की यादें आज भी मेरे जेहन में जिंदा है। फुटबॉल मैच और खासतौर से वह आश्रम कभी नहीं भूल सकता। इस आश्रम में हम सभी बच्चे बैठ कर कई खेल खेलते थे और मेरी नानी मां मुझे कहानियां सुनाया करती थी।

पैसों को अहमियत नहीं दी

मैंने कभी अपनी जिंदगी में पैसों को बहुत अहमियत नहीं दी। चूंकि मैं जिंदगी को जीता था, न कि उसे जोड़ता या घटाता था। मैने हमेशा वही किया जिसे करके मुझे मानसिक शांति मिली है। मुझे खेलने का शौक बचपन से रहा है। अपनी उम्र के बच्चों से लेकर मैने बड़े लोगों के साथ भी मस्ती की है।
विज्ञापन


प्राण साहब, जो हमारे बेहद अजीज हैं। उनके घर पर तो हमेशा अंत्याक्षरी का माहौल हुआ करता था। हम डम शराड खूब खेला करते थे। मैं ऐसी ऐसी फिल्मों का नाम बच्चों को जान बूझ कर देता था कि वह समझ ही नहीं पाते थे।

खाने का रहा हूं शौकीन

मैं और प्राण साहब दोनों ही खाने के शौकीन थे। हम दोनों की जोड़ी जब भी जमती तब वह खाने पर ही पूरी होती। हम दोनों उस मौके पर यहां-वहां की बातें किया करते। फिल्मी बातें तो बहुत ही कम होती। इस मौके पर तरह-तरह का खाना बनता, खासकर बिरायनी कबाब तो हम दोनों का ही फेवरेट हुआ करता। हम जी भरके इसका लुत्फ उठाते।

साहित्य से लगाव

मैं सिनेमा और साहित्य को दो अलग चीजें मानता ही नहीं। मेरे लिए सिनेमा साहित्य एक तरह का साहित्य ही है। सहादत हसन मंटो, मुंशी प्रेमचंद्र, बंकिम चटर्जी इन सभी को देख कर पढ़ कर मैंने सिनेमा को समझा। उस दौर के निर्देशकों ने साहित्य को हमेशा अहमियत भी दी। लेकिन बाद के दौर के सिनेमा से साहित्य धीरे-धीरे कर गायब होता गया।

ठुकरा दिये थे हॉलीवुड फिल्मों के ऑफर

हिंदी फिल्मों से प्यार करने वाले दिलीप कुमार ने हॉलीवुड फिल्मों के कई ऑफर ठुकरा दिए। उन्होंने वर्ष 1962 में बनी हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म 'लारेंस ऑफ अरेबिया' में काम करने से इंकार कर दिया था। इस फिल्म में उन्हें जिस किरदार को निभाने के लिए ऑफर दिया जा रहा था, वह बाद में मिस्र के अभिनेता ओमर शरीफ को दिया गया।
विज्ञापन


दिलीप कुमार के सामने यह ऑफर खुद डेविड लीन लेकर आये थे। 'थीफ ऑफ बगदाद' जैसी विश्व प्रसिद्ध फिल्म बनाने वाले निर्देशक अलेक्जेंडर भी दिलीप को लेकर ताजमहल फिल्म बनाना चाहते थे। दिलीप साहब ने उस फिल्म को लेकर भी बहुत उत्साह नहीं दिखाया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें