इस साल एक तरफ निर्देशकों ने बॉक्स ऑफिस पर नए और कामयाब प्रयोगों से दर्शकों का दिल जीता तो वहीं ऐसी फिल्में भी रहीं, जो शुद्ध मसालेदार थीं। जिनमें बिकाऊ सितारे या बड़े निर्देशक थे। बड़े प्रोडक्शन हाउस जुड़े थे। अतः उनसे उम्मीदें खूब थीं।
इनका प्रमोशन जबर्दस्त हुआ, लेकिन जब ये टिकट खिड़की पर आईं तो फुस्स साबित हुईं। हालांकि कुछ फिल्में ऐसी रहीं हैं जिन्होंने पैसे तो कमा लिए लेकिन वह दर्शकों के बीच लोकप्रिय नहीं हो सकीं।
रणबीर को मिला बड़ा झटका
रणबीर कपूर की ‘ये जवानी है दीवानी’ और निर्देशक अभिनव कश्यप की ‘दबंग’ को जो देख चुके थे, उन्हें इस जोड़ी से बड़ी उम्मीदें थीं। खुद रणबीर और अभिनव आत्मविश्वास से भरे थे। हालांकि पीली सरसों के खेतों में लघुशंका निवारण करते रणबीर को देख शाहरुख के फैन्स नाराज भी थे। कुल मिला कर पब्लिसिटी हो रही थी। मगर फिल्म जैसे ही रिलीज हुई सारा मामला हवा हो गया।
कमजोर स्क्रिप्ट और ढीला निर्देशन। देखते-देखते फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ढह गई। फिल्म में रणबीर की मेहनत सराही गई, लेकिन वह दर्शकों को टिकट खिड़की पर लाने में नाकाम रही। थोड़ा आरोप-प्रत्यारोप का खेल चला। फिर ठंडा पड़ गया। कहा यह भी गया कि अभिनव फिल्म की नाकामी से इतने दुखी हुए कि एक पार्टी में भाई अनुराग के गले लग कर रोए।
टूटा साजिद खान का अति आत्मविश्वास
निर्देशक साजिद खान का बड़बोलापन तो इस फिल्म की रिलीज से पहले सामने आया ही, अजय देवगन के स्क्रिप्ट के चुनाव पर भी सवाल खड़े हो गए। बीती सदी में अस्सी के दशक की इस रीमेक को लेकर साजिद ने यहां तक कहा कि मैं इस फिल्म से 200 करोड़ रुपये का बिजनेस देख रहा हूं।
गारंटी है कि अगर किसी को फिल्म पसंद नहीं आई तो पैसे तक लौटा दूंगा... वगैरह वगैरह। फिल्म इतनी बुरी निकली कि खुद इसमें काम करने वालों की दोबारा देखने की हिम्मत न पड़े। फिल्म ने साजिद के टेलेंट की पोल खोल दी।
जनता ने बता दिया कि बेसिर-पैर की बातों से उसे भरमाया नहीं जा सकता। यही नहीं, निर्माता-निर्देशकों को भी कड़ा संदेश गया कि फालतू फिल्मों का रीमेक करने से बेहतर ही दक्षिण में बन रही फिल्मों के रीमेक पर भरोसा करें!
यमला पगला दीवाना 2 का भी यही हश्र
धर्मेंद्र, सनी और बॉबी देओल... और उस पर 2011 में आई ‘यमला पगला दीवाना’ का पुराना रिकॉर्ड। लेकिन इस फिल्म का सीक्वल दर्शकों ने सिरे से खारिज कर दिया। पहली फिल्म ने जहां बॉक्स ऑफिस पर करीब 90 करोड़ रुपये कमाए थे, वहीं सीक्वल दर्शकों को कतई पैसा वसूल नहीं लगा।
इस ऐक्शन-कॉमेडी में देओल पिता-पुत्रों का जादू पूरी तरह से नाकाम साबित हुआ। निर्देशक संगीत सिवन की इस फिल्म से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन पहले ही हफ्ते में सारी हवा निकल गई।
फिल्म को बहुत खराब रिव्यू मिले और दर्शक भी समीक्षकों की राय के साथ खड़े हुए। फिल्म देख कर किसी को हंसी नहीं आई। तय है कि निर्माताओं को भी आंसू बहाने पड़े।
अमिताभ की नकल करना पडा महंगा
एक लिहाज से जंजीर फिल्म ने साल में सबसे ज्यादा निराश किया क्योंकि यह 1973 में आई अमिताभ बच्चन स्टारर ‘जंजीर’ का रीमेक थी। इससे निश्चित ही निर्देशकों को सबक मिला कि क्लासिक फिल्मों के रीमेक का दुस्साहस नहीं करना चाहिए।
निर्देशक अपूर्व लखिया हंसी के पात्र बन गए। वहीं रिलीज से पहले साउथ के सुपरस्टार चिरंजीवी के पुत्र जिन राम चरन तेजा को ‘आज का अमिताभ’ बताया जा रहा था, उन्हें फिल्म के फ्लॉप होते ही बॉलीवुड से बोरिया बिस्तर बांधना पड़ गया।
जबकि पहले खबरें फैलाई जा रही थीं कि निर्माताओं ने उनके दरवाजे पर लाइनें लगानी शुरू कर हैं। जहां तक प्रियंका चोपड़ा का सवाल है वह इस फिल्म को कभी याद नहीं करना चाहेंगी। साफ है कि बॉलीवुड में ‘जंजीर’ सिर्फ एक ही है... और वह है एंग्री यंग मैन की!
वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई-दोबारा नहीं हुई हजम
ऐसा लगता था कि निर्देशक मिलन लुथरिया की यह फिल्म बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड के महिमामंडन को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। लेकिन अक्षय कुमार की डायलॉगबाजी बेकार गई। हालांकि बहाना बनाया गया कि ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के अगले ही हफ्ते रिलीज होन से फिल्म को नुकसान हुआ।
हकीकत यह कि फिल्म बेहद नकली थी। न समीक्षकों ने फिल्म को सराहा और न ही दर्शकों ने। देखते-देखते टिकट खिड़की पर फिल्म डूब गई। हां, इसके बाद निर्माताओं और सितारों के बीच मनमुटाव हुआ और पता चला कि इमरान खान को पतन का जिम्मेदार माना जा रहा है।
सोचने वाली बात यह है कि क्या इमरान वाकई ऐसे ऐक्टर हैं कि उनके दम पर कोई फिल्म चल सके। निर्माताओं की बुद्धि पर तरस आता है।
मटरु की बिजली का मंडोला क्यो हुई फ्लॉप
निर्देशक विशाल भारद्वाज के पास ‘मकबूल’, ‘ओमकारा’ और ‘कमीने’ जैसी फिल्मों का मजबूत रिकॉर्ड हैं। उनके नाम से ही लोग खिंचे आते हैं। उन्हें विश्वास था कि ‘मटरु’ में भी ऐसा होगा। लेकिन नाम के अलावा फिल्म में कुछ आकर्षक नहीं था। गुलाबी भैंस भी दर्शकों को सिनेमाघरों में नहीं बुला सकी।
लोगों को फिल्म की कॉमेडी पसंद नहीं आई। फिल्म में अंडरकरंट चलने वाला व्यंग्य भी सिर के ऊपर से चला गया। इमरान खान और अनुष्का शर्मा की जोड़ी फेल हो गई। पंकज कपूर और शबाना आजमी जैसे मंजे ऐक्टर बेकार साबित हो गए। साबित हो गया कि सिर्फ नाम से कुछ नहीं बेचा जा सकता।
कुछ और बड़ी नाकामियां...
बड़े सितारों और नामी निर्देशकों की नाकामियां टिकट खिड़की पर लगातार जारी रहीं। कई फिल्में उम्मीदें पैदा करने के बाद धराशायी हो गईं। निर्माता-निर्देशक राम गोपाल वर्मा दो फिल्में लाए मुंबई हमलों का डॉक्यूड्रामा ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’ और ‘सत्या 2’। दोनों को दर्शकों ने नहीं पूछा। न ही समीक्षकों ने उनमें कुछ देखने योग्य पाया।
इसी तरह ‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी विचारोत्तेजक फिल्में बनाने वाले निर्देशक राजकुमार गुप्ता की कॉमेडी ‘घनचक्कर’ फ्लॉप हो गई। फिल्म में न इमरान हाशमी का जादू चला और न विद्या बालन का। इमरान की ‘एक थी डायन’ (निर्देशकः कन्नन अय्यर) भी हुमा कुरैशी, कोंकणा सेन शर्मा और कल्की कोएचलिन की मौजूदगी में बेकार गई।
शाहिद कपूर की ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ और ‘आर... राजकुमार’ ने दर्शकों को निराश किया और नतीजा, फ्लॉप। संजय दत्त को इस साल जेल जाना पड़ा और उनकी फिल्म ‘पुलिसगिरी’ को किसी ने नहीं पूछा।
निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा की ‘सत्याग्रह’ मल्टीस्टारर होने के बावजूद औंधे मुंह गिर गई। दाउद इब्राहिम की गिरफ्तारी की फैंटसी दिखानी वाली ‘डी-डे’ भी धड़ाम से गिरी। सैफ अली खान की ‘बुलैट राजा’, कंगना रनौट की ‘रज्जो’ और सनी देओल की ‘सिंह साब द ग्रेट’ को भी दर्शक नहीं मिले।