देखा जाए तो सिनेमा की शुरुआत से ही फिल्मों में महिलाओं पर फब्तियां कसना, उनके साथ छेड़छाड़ करना, अश्लील एवं भद्दे मजाक करने का चलन रहा है, जिसे फिल्मी भाषा में रोमांटिक मूड कहा जाता है।
फिल्म जगत का दावा भी है कि सिनेमा में जो कुछ भी दिखाया, सुनाया जाता है, वह निर्देशक की कल्पना के साथ-साथ समाज के किसी कोने से निकली बात जरूर होती है। फिल्मों में हीरो हीरोइन को लाइन मारता है, उसे आंख मारता है, उसका पीछा करता है। कानूनन इन सारी हरकतों पर हीरो को जेल हो सकती है, लेकिन फिल्म में इसे हीरो-हीरोइन के बीच की मीठी नोक-झोंक कहा जाता है।
अश्लील शब्दों के किंग हैं हनी सिंह
स्क्रीन पर गाने भी इसका शिकार हैं। उनका पिक्चराइजेशन भी। शायद इसीलिए हनी सिंह जैसे गायक भी हिट हो रहे हैं। अपने गानों ‘मैं शराबी’, ‘ब्रेकअप पार्टी’ और अन्य कई में बलात्कारी, शराबी, सेक्स, हॉट, जैसे शब्दों का बेहद अश्लील तरीके से प्रयोग करने वाले हनी सिंह आज बॉलीवुड की कई फिल्मों के लिए गा रहे हैं।
बॉलीवुड का ताजा हाल यह है कि आम जीवन का हवाला देकर फिल्मी गानों में अश्लील शब्द रखने में कोई संकोच नहीं किया जा रहा है। आज यह कानून है कि किसी लड़की का पीछा करना, उसे घूरना, तारीफ में ही सही उनके लिबास या खूबसूरती पर फब्तियां कसना अपराध है और इसके लिए जेल जाना पड़ सकता है, पर हीरो इन्हें आराम से करता क्यों दिखाया जाता है?
टीवी पर भी अश्लीलता
टीवी पर चल रहे कॉमेडी सीरियल्स भी दि्वअर्थी चुटकुलों और भाव-भंगिमाओं से खूब अश्लीलता परोस रहे हैं। क्या नायक के इस तरह के व्यवहार की सामाजिक असलियत बताना मनोरंजन उद्योग का कर्तव्य नहीं है?
सिने जगत की कुछ हस्तियां इस स्थिति से निराश भी हैं। गीतकार जावेद अख्तर कहते हैं कि आज लोगों के पास शब्दकोश ही नहीं है, इसलिए वो कुछ भी ऊल-जुलूल लिख देते हैं। गानों में शर्म और हया है ही नहीं।
गानों में उत्तेजक शब्द
आइटम सॉन्ग भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। `मुन्नी बदनाम हुई' और `शीला की जवानी' ने ऐसा गदर ढाया है कि अब तो हर फिल्म में आइटम सॉन्ग होना जरूरी माना जाने लगा है।
गानों में द्विअर्थी और उत्तेजक बोलों का इस्तेमाल होता है। लेखिका और प्रोफेसर अनामिका कहती हैं कि ऐसे गानों में दिखाया जाना कि एक पक्ष रिझा रहा है और दूसरा हुड़दंग करके आनंद ले रहा है, स्त्री पुरुष में भेड़-भेड़िया वाला रिश्ता स्थापित करता है। इनसे मानवीय गरिमा खत्म हो जाती है।
उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि मनोरंजन के नाम पर चल रहे इन गानों का इस्तेमाल केवल पब्लिसिटी के लिए होता है। सवाल यह है कि यह सब रुके कैसे?
एक न एक दिन इसके विरोध में समाज को खड़ा होना पड़ेगा और जैसे धूम्रपान और मदिरापान के दृश्य आने से पहले चेतावनी आना अब फिल्मकारों की नैतिकता बन गई है, वैसे ही नायक के इस व्यवहार के लिए भी उन्हें कोई न कोई रास्ता ढूंढना ही पड़ेगा।