चुलबुल पांडे का कुंभ के मेले में बिछड़ा कोई भाई होता तो कैसा होता, जवाब है, बच्चन पांडे! वैसे अगर आपको यशराज फिल्म्स की एक याद न रखने लायक फिल्म ‘टशन’ याद रह गई हो तो इस फिल्म में अक्षय कुमार का नाम बच्चन पांडे ही था। इस बार अंग्रेजी की वर्तनी में एक एक्स्ट्रा एच और जुड़ गया है, शायद कॉपीराइट का कुछ मामला अटक गया हो। इस तरह से देखें तो बच्चन पांडे का 14 वर्ष का वनवास खत्म हो रहा है। फिल्म ‘टशन’ साल 2008 में आई थी। स्टाइल हीरो जैसा। बोली भोजपुरी जैसी और गाने पंजाबी जैसे। कोई आधा दर्जन लोग मिलकर फिल्म ‘बच्चन पांडे’ लिख पाए हैं। नाम को लेकर हो सकता है ज्योतिषिय़ों में राय ली गई हो लेकिन फिल्म की शूटिंग के पहले दिन अक्षय के बाएं हाथ में कलावा बांधने का जो अपशकुन हुआ, उसका असर फिल्म की रिलीज तक तारी है। बीते हफ्ते रिलीज हुई विवेक अग्निहोत्री की फिल्म बताते हैं हफ्ते भर में 650 स्क्रीन्स से निकलकर देश भर के 4000 स्क्रीन्स में छा गई। 14 करोड रुपये में बनी ‘कश्मीर फाइल्स’ सौ करोड़ रुपये की कमाई का आंकड़ा पार कर गई है। इधर कोई 180 करोड़ रुपये की लागत वाली फिल्म ‘बच्चन पांडे’ का पहले दिन का कलेक्शन 14 करोड़ हो जाए तो लोग प्रसाद चढ़ाने को तैयार बैठे हैं।
अक्षय कुमार अपने करियर के उस कालखंड से गुजर रहे हैं जहां उनकी वही फिल्में अब सिनेमाघरों में आएंगी जिनके चलने की उम्मीद खुद अक्षय कुमार को होगी। नहीं तो ‘लक्ष्मी’ और ‘अतरंगी रे’ जैसी फिल्मों का सौदा वह ओटीटी पर कर लेने की ही सलाह अपने निर्माताओं को देते हैं। त्योहारों और राष्ट्रीय पर्वों पर उनकी फिल्में बेहतरीन कारोबार करती हैं, लेकिन ये होली उनके लिए उतनी रंगीन होती दिख नहीं रही। किसी काल्पनिक से पूर्वी उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि में बनी फिल्म ‘बच्चन पांडे’ फिल्ममेकिंग की उस श्रेणी में फिट होती है जिसमें देश, काल, परिस्थिति का कोई खाका निर्देशक के दिमाग में नहीं होता। वह बस कुछ नाम उठाता है, कहानी गढ़ता है और उसे एक नकली हकीकत के करीब रखने की कोशिश में दर्शकों को घुमाते रहने की कोशिश करता है। सब ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान’ होना चाहते हैं। निर्देशक फरहाद सामजी से इससे ज्यादा की उम्मीद हिंदी सिनेमा के दर्शक करते भी नहीं हैं। वह ‘हाउसफुल’ फ्रेंचाइजी की दो फिल्में और उससे पहले ‘एंटरटेनमेंट’ बना चुके हैं। फिल्म ‘बच्चन पांडे’ भी उनके इसी ‘हिंदोस्तान’ की फिल्म है।
फिल्म ‘बच्चन पांडे’ जब बननी शुरू हुई तो खबर फैली कि ये साउथ की फिल्म ‘वीरम’ की रीमेक है। फिर ये भी सामने आया कि ‘जिगरठंडा’ के छींटे भी इसकी कहानी पर पड़े हैं। लेकिन दावा है कि कहानी मूल रूप में इसके निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने लिखी है। साजिद कोई 30 साल से फिल्में बना रहे हैं। मसाला हिंदी फिल्मों के दर्शकों का उन्हें अंदाजा है। लेकिन, हिंदी पट्टी के दर्शकों का फिल्में देखने का स्वाद जो बीते दो साल मे बदला है, उस पर उन्हें अपने प्रोडक्शन हाउस में इस फिल्म के बाद जल्द ही एक नई रिसर्च टीम बिठानी पड़ सकती है। दो हीरोइन, एक हीरो। एक पर चढ़ती जवानी का खुमार तो दूसरे पर ढलती उम्र का ग्लैमर हावी। हीरो पर अपने आसपास के लोगों की जिम्मेदारी। पत्थर की आंख और पत्थर का दिल। नए जमाने की फिल्मों सी कलर टोन। फिल्म के भीतर चलती फिल्म की कहानी और फिल्म निर्देशक से ज्यादा जिम्मेदारी फिल्म के एक्शन डायरेक्टर और सिनेमैटोग्राफर पर। अक्षय कुमार किसी प्रोड्यूसर को मिल जाए तो फिर ओरीजनल कहानी तलाशने की जरूरत ही किसे और क्यूं है? कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा जोड़कर ‘बच्चन पांडे’ का कुनबा जुड़ गया है।
54 साल के हो चुके अक्षय कुमार दोनों हाथों से फिल्में बटोर रहे हैं। ब्रांडिंग में वह नंबर वन बताए जाते हैं। हालांकि, लोग कहते हैं कि अब उन्हें ‘कौन बनेगा करोड़पति’ कर लेना चाहिए। अमिताभ बच्चन की तरह ही वह करियर के उस मुहाने पर आ खड़े हुए हैं, जहां उनकी एक फिल्म बॉक्स ऑफिस पर लड़खड़ाई तो आगे की राह उनके लिए मुश्किल हो सकती है। ‘बेलबॉटम’ में इसका इशारा मिल चुका है। लेकिन तब बहाना कोरोना का बन गया। फिल्म ‘बच्चन पांडे’ में लाख चेहरा मोहरा बदलने के बाद भी अक्षय कुमार सिर्फ अक्षय कुमार ही लगते हैं। उन्हें अब आर बाल्की और मणिरत्नम जैसे निर्देशक चाहिए जो उनकी नए सिरे से ब्रांडिंग कर सकें। फिल्म में कृति सैनन अपने किरदार के हिसाब से शुरू तक आखिर तक भ्रमित रहती हैं और करीब करीब जैकलीन जैसी एक्टिंग करती दिखती हैं। अरशद वारसी पर सर्किट का ठप्पा जब से लगा है, फिल्मों के लेखक निर्देशक उनके लिए ‘असुर’ जैसा कुछ सोच ही नहीं रहे। हां, फिल्म में पंकज त्रिपाठी और सहर्ष शुक्ला जितनी देर परदे पर रहते हैं, दिमाग का तनाव खाली करते रहते हैं।