अनुपम खेर और शुभांगी दत्त
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क्या कभी ऐसा वक्त आया जब सपोर्ट न मिलने से निराशा हुई हो?
हां, एक बार गया था एक साहब के पास। बड़ी फिल्में फाइनेंस करते हैं। स्टोरी सुनने के बाद बोले, अच्छी है, कल आ जाना। मैं अगले दिन उनके ऑफिस गया, लिफ्ट से ऊपर गया, उन्होंने कहा, भाई, चाय पिला सकता हूं? न्यूज अच्छी नहीं है। मैंने कहा, 'न चाय, न न्यूज, आपकी चाय भी जहर लगेगी अब।' और मैं वहां से निकल गया।
जब लोग सपोर्ट नहीं करते तो अंदर से कितना टूटते हैं?
टूटता हूं, पर वहीं से जिद पैदा होती है। खुंदक लगती है और खुंदक से ही सबसे अच्छा काम निकलता है। जब वही लोग प्रीमियर पर आते हैं, वही फिल्म देखते हैं, तो लगता है कि जवाब दे दिया। मैं आज भी खुद ही अपनी जिम्मेदारी उठाता हूं। और ये बात मुझे पसंद है।
खुद फिल्म प्रोड्यूस करना कितना मुश्किल था? खासकर जब ये कोई सेफ या मसाला फिल्म नहीं थी?
बहुत मुश्किल था। पैसा नहीं था, सपोर्ट नहीं था, और सबको लगता था कि कंटेंट वाली फिल्म चलेगी नहीं। लेकिन मुझे अपनी ऑडियंस की समझ पर भरोसा है। अगर आप अच्छा खाना परोसें, तो लोग खाएंगे। जायका अब बदल चुका है। मैंने रिस्क लिया, पर इसलिए क्योंकि मैं चाहता था कि फिल्म बिना किसी फाल्स नोट के बने। जब फरहान अख्तर ने फिल्म देखी तो कहा, एक भी फॉल्स नोट नहीं है और मेरे लिए वो सबसे बड़ी जीत थी।
जब इंडस्ट्री में बड़े एक्टर्स को बिना स्क्रिप्ट फीस मिल जाती है, तब ऐसे फाइनेंसर क्यों कंटेंट पर भरोसा नहीं करते?
क्योंकि लोगों को लगता है कि नाम बिकता है, कहानी नहीं। लेकिन मैं यही तो बदलना चाहता हूं। मैं बिना किसी सपोर्ट के मुंबई आया था, न बाल थे, न पैसा था, न कोई गॉडफादर। तब भी कुछ बना, अब भी वही सोच रखता हूं। आपके भरोसे की कीमत कोई नहीं समझेगा, जब तक आप उसे साबित न कर दें। यही मैंने किया।
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सेट पर डायरेक्टर अनुपम खेर कैसे होते हैं? क्या आप भी वैसे ही सख्त होते हैं जैसे थिएटर में होते हैं?
नहीं, मैं सेट पर तनाव नहीं चाहता। हम साथ बैठकर खाना खाते थे, शूट टाइम पर खत्म होता था और अगर जल्दी फ्री हो जाएं तो बाहर निकल जाते थे। मुझे लगता है कि डायरेक्शन सिर्फ टेक्निकल चीज नहीं, एक इंसानी प्रक्रिया है, जो ईमानदारी से चले तो सबका काम आसान हो जाता है।