फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Anupam Kher: फाइनेंसर नहीं मिले तो अनुपम ने खुद बना ली फिल्म; बोले- लोगों को लगता है नाम बिकता है, कहानी नहीं

सार

Anupam Kher Interview: अनुपम खेर दो दशक से भी ज्यादा समय के बाद डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठे हैं। उन्होंने बताया आखिर क्यों किया ‘तन्वी द ग्रेट’ का निर्देशन।
विज्ञापन
अनुपम खेर - फोटो : इंस्टाग्राम-@anupampkher
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

23 साल पहले 'ओम जय जगदीश' से निर्देशन की शुरुआत करने वाले अनुपम खेर अब फिर से डायरेक्टर बने हैं। उनकी फिल्म ‘तन्वी: द ग्रेट’ 18 जुलाई को रिलीज हो रही है। इस दौरान अमर उजाला डिजिटल से हुई बातचीत में अनुपम खेर ने फिल्म से जुड़े किस्से और अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि न स्टूडियो साथ थे, न पैसा, लेकिन इरादा इतना साफ था कि फिल्म को खुद ही प्रोड्यूस करने का फैसला लिया, बिना किसी समझौते के।

23 साल बाद डायरेक्शन में वापसी, क्या वजह रही?

विज्ञापन

मैंने इस फिल्म को इसलिए डायरेक्ट नहीं किया कि ये स्पेशल लगे,  बल्कि इसलिए बनाया कि ये एक अच्छाई की कहानी है। आजकल अच्छाई भी रेयर लगती है। जब ये कहानी पढ़ी, तो लगा इसे किसी बनावटीपन के बिना पेश करना जरूरी है। मैं चाहता था कि कुछ ऐसा बनाऊं जो दिल और इरादे दोनों को साफ रखे इसलिए डायरेक्शन खुद किया।

आपने इस फिल्म के लिए किसी प्रोडक्शन हाउस या स्टूडियो का सपोर्ट नहीं लिया। ये जानबूझकर लिया गया फैसला था या हालात थे?
यह फैसला मैंने जानबूझकर लिया था क्योंकि मुझे मनमानी करनी थी। अच्छे तरीके से और अपने तरीके से फिल्म बनानी थी। मुझे पता था मैं क्या बना रहा हूं और मैं उस सपने को किसी और को समझा नहीं पाता। न पेशेंस था, न ही वो शक्ति। और पैसा तो खैर था ही नहीं।

विज्ञापन

अनुपम खेर और शुभांगी दत्त - फोटो : यूट्यूब ग्रैब

क्या कभी ऐसा वक्त आया जब सपोर्ट न मिलने से निराशा हुई हो?
हां, एक बार गया था एक साहब के पास। बड़ी फिल्में फाइनेंस करते हैं। स्टोरी सुनने के बाद बोले, अच्छी है, कल आ जाना। मैं अगले दिन उनके ऑफिस गया, लिफ्ट से ऊपर गया, उन्होंने कहा, भाई, चाय पिला सकता हूं? न्यूज अच्छी नहीं है। मैंने कहा, 'न चाय, न न्यूज,  आपकी चाय भी जहर लगेगी अब।' और मैं वहां से निकल गया।

जब लोग सपोर्ट नहीं करते तो अंदर से कितना टूटते हैं?
टूटता हूं, पर वहीं से जिद पैदा होती है। खुंदक लगती है और खुंदक से ही सबसे अच्छा काम निकलता है। जब वही लोग प्रीमियर पर आते हैं, वही फिल्म देखते हैं, तो लगता है कि जवाब दे दिया। मैं आज भी खुद ही अपनी जिम्मेदारी उठाता हूं। और ये बात मुझे पसंद है।

विज्ञापन

'तन्वी द ग्रेट' - फोटो : इंस्टाग्राम

खुद फिल्म प्रोड्यूस करना कितना मुश्किल था? खासकर जब ये कोई सेफ या मसाला फिल्म नहीं थी?
बहुत मुश्किल था। पैसा नहीं था, सपोर्ट नहीं था, और सबको लगता था कि कंटेंट वाली फिल्म चलेगी नहीं। लेकिन मुझे अपनी ऑडियंस की समझ पर भरोसा है। अगर आप अच्छा खाना परोसें, तो लोग खाएंगे। जायका अब बदल चुका है। मैंने रिस्क लिया, पर इसलिए क्योंकि मैं चाहता था कि फिल्म बिना किसी फाल्स नोट के बने। जब फरहान अख्तर ने फिल्म देखी तो कहा, एक भी फॉल्स नोट नहीं है और मेरे लिए वो सबसे बड़ी जीत थी।

जब इंडस्ट्री में बड़े एक्टर्स को बिना स्क्रिप्ट फीस मिल जाती है,  तब ऐसे फाइनेंसर क्यों कंटेंट पर भरोसा नहीं करते?
क्योंकि लोगों को लगता है कि नाम बिकता है, कहानी नहीं। लेकिन मैं यही तो बदलना चाहता हूं। मैं बिना किसी सपोर्ट के मुंबई आया था,  न बाल थे, न पैसा था, न कोई गॉडफादर। तब भी कुछ बना, अब भी वही सोच रखता हूं। आपके भरोसे की कीमत कोई नहीं समझेगा, जब तक आप उसे साबित न कर दें। यही मैंने किया।

यह खबर भी पढ़ेंः Tanvi the Great: रिलीज हुआ 'तन्वी द ग्रेट' का पहला गाना, डांस के जरिए शुभांगी ने दिया आर्मी को ट्रिब्यूट

सेट पर डायरेक्टर अनुपम खेर कैसे होते हैं? क्या आप भी वैसे ही सख्त होते हैं जैसे थिएटर में होते हैं?
नहीं, मैं सेट पर तनाव नहीं चाहता। हम साथ बैठकर खाना खाते थे, शूट टाइम पर खत्म होता था और अगर जल्दी फ्री हो जाएं तो बाहर निकल जाते थे। मुझे लगता है कि डायरेक्शन सिर्फ टेक्निकल चीज नहीं, एक इंसानी प्रक्रिया है, जो ईमानदारी से चले तो सबका काम आसान हो जाता है।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें