भारत को अगर गीतों का देश कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आपको यहां हर मौसम, हर भावना, हर परिस्थिति पर गीत मिल जाएंगे। हंसने पर गीत, रोने पर गीत, जीवन पर गीत, पैदा होने पर गीत यहां तक कि मरने पर भी गीत। हर मौसम के गीत हैं, सर्दी पर, गर्मी पर, बसंत पर और बरसात पर। इसलिए इस देश को गीतों का देश कहने में कोई गुरेज नहीं। ऐसे में देश में एक गीतकार ऐसा भी हुआ है, जिसने इन सभी परिस्थितियों, सभी भावनाओं और सभी मौसमों पर गीत लिखे हैं और अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में तकरीबन चार हजार से भी अधिक गीत लिखे हैं। ये शख्सियत हैं हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार आनंद बक्शी।
21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी में जन्मे इस गीतकार ने अपनी जिंदगी में पार्टीशन से लेकर मायानगरी मुंबई में धक्के खाने तक सबकुछ झेला है। उसके बाद चखा है अपार सफलता का स्वाद और अगर आज ये कहा जाए कि बॉलीवुड की तकरीबन 80 प्रतिशत फिल्मों गीत अकेले आनंद बक्शी ने लिखे हैं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 30 मार्च 2002 को इस महान गीतकार की कलम हमेशा के लिए रुक गई। आज आनंद बक्शी साहब की 23वीं पुण्यतिथि है। इस मौके पर जानते हैं आनंद बक्शी से जुड़े कुछ अनकहे किस्से और संघर्ष से लेकर सफलता तक का उनके सफर के बारे में।
14 साल में की नेवी में नौकरी
आनंद बक्शी को शुरू से ही फिल्मों और गानों का बड़ा शौक था। शुरूआती शिक्षा के बाद ही आनंद बक्शी को नौकरी करनी पड़ गई। वो महज 14 साल की उम्र से ही नौकरी करने लगे और नौकरी भी मिली तो रॉयल नेवी में। अब 14 साल का बच्चा नेवी में क्या ही काम करता, तो ऐसे ही छोटे-मोटे काम करता था। हालांकि, दो साल बाद नेवी में भारतीयों के बगावत करने पर आनंद बक्शी को नेवी से निकाल दिया गया।
नौकरी छोड़कर आए मुंबई नहीं मिला काम तो लौट गए वापस
नेवी से निकाले जाने के बाद आनंद बक्शी पार्टीशन में भारत आ जाते हैं और बाद में आर्मी में शामिल हो जाते हैं। आनंद बक्शी फौज में शामिल तो हो गए लेकिन उनका मन अभी भी शायरी और गीतकार बनने में ही लगा था। इसलिए फौज की नौकरी छोड़कर वो 1951 में मुंबई चल दिए फिल्मों में गीत लिखने। हालांकि, कुछ महीनों साल तक मुंबई की सड़कों पर घूमते रहे और फुटपाथों पर धक्के खाने के बाद उन्हें ये एहसास हो गया कि फिल्मों में गीत लिखना और गीतकार बनना इतना आसान नहीं है। इसलिए वो वापस अपने घर लौट गए और फिर से फौज में शामिल हो गए। इस दौरान घर वालों ने उनकी शादी भी करा दी। हालांकि, उनका मन अभी भी फिल्मों और गाने लिखने में ही लगा था।
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दोस्त न होता, तो कभी नहीं बन पाते गीतकार
बक्शी साहब का दिल अभी भी कुछ क्रिएटिव करने का ही था। नतीजा दो-तीन साल फौज में नौकरी करने के बाद वो फिर से 1956 में नौकरी छोड़कर मुंबई पहुंच गए। मगर दो-तीन महीने फिर से यूं ही धक्के खाने के बाद फिर उनकी हिम्मत टूटने लगी और उन्होंने फिर वापस लौटने की सोची। क्योंकि वो दादर में एक गेस्ट हाउस में रहते थे, जहां अब किराया देना तक मुश्किल हो गया था। लेकिन इस दौरान बक्शी साहब का वहां एक दोस्त बन गया था, जिनका नाम था चित्रामल जो रेलवे में टिकट चेकर थे। उन्होंने आनंद बक्शी का साथ दिया और उनसे कहा कि तुम निराश न हो, मुझे उम्मीद है कि तुम एक दिन बड़े गीतकार बनोगे।
जब बक्शी साहब ने कहा कि मेरे पास पैसे ही नहीं हैं रहने के तो चित्रामल आनंद बक्शी को अपने घर ले गए जहां वो रेलवे क्वार्टर में रहते थे। उन्होंने आनंद बक्शी को लगभग 5-6 साल तक न सिर्फ अपने घर में रखा, बल्कि खाना खिलाने से लेकर कुछ रुपए जेब खर्च तक के इतने सालों तक उन्होंने ही दिए। बक्शी साहब खुद अपने इंटरव्यू में कहते हैं कि अगर उस दोस्त ने मेरी मदद न की होती, तो मैं कभी गीतकार नहीं बन पाता, क्योंकि मैं फिर वापस लौट जाता और शायद तीसरी बार मुंबई आने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता।
ऐसे मिला पहला गाना
काफी संघर्ष और मेहनत के बाद साल 1958 में आनंद बक्शी को अपना पहला गाना मिला, पहली फिल्म मिली। फिल्म का नाम था ‘भला आदमी’, इस फिल्म को बृज मोहन नाम के एक निर्देशक बना रहे थे। फिल्म के प्रमुख हीरो थे उस वक्त के मशहूर अभिनेता भगवान दादा। बक्शी साहब जब भगवान दादा से मिले तो उन्होंने पूछा बताओ क्या काम है, तो बक्शी साहब ने कहा कि वो गीतकार बनना चाहते हैं। जिसके बाद भगवान दादा ने आनंद बक्शी को फिल्म की कहानी बताई और 15 दिन का समय दिया कि जाओ गाना लिखकर लाओ। 15 दिनों में बक्शी साहब ने चार गिने लिखे, वो चारों गाने भगवान दादा को पसंद आए और चारों गाने फिल्म में ले लिए गए। जिसके बाद 9 नवंबर 1958 को वो दिन आया जब आनंद बक्शी का पहला गाना रिकॉर्ड हुआ। इस गाने के बोल थे ‘धरती के लाल, ना कर इतना मलाल’।
राज कपूर ने नहीं, लेकिन उनके असिस्टेंट ने दिया आनंद बक्शी को मौका
‘भला आदमी’ फिल्म में गाने लिखने के बाद आनंद बक्शी को काम तो मिलने लगा, लेकिन अभी भी उन्हें अपनी पहचान बनाना और नाम कमाना दोनों ही बाकी था। लगभग 30-35 फिल्मों में गाने लिखने के बाद आनंद बक्शी दिग्गज अभिनेता और निर्देशक राज कपूर के पास काम मांगने के लिए गए। जब वो राज कपूर के ऑफिस पहुंचे तो वहां उन्हें राज कपूर के एक असिस्टेंट मिले हिरन खेड़ा। उन्होंने बक्शी साहब से कहा कि देखो राज कपूर तो आपसे गीत लिखवाएंगे नहीं, क्योंकि उनके पास कई बड़े-बड़े गीतकार हैं, लेकिन मुझे आपके गीत पसंद आए हैं। इसलिए मैं आपसे वादा करता हूं कि जब मैं फिल्म बनाऊंगा तो आपसे ही गीत लिखवाऊंगा। हिरन खेड़ा अपने वादे के पक्के निकले, उन्होंने साल 1962 में जब फिल्म बनाई ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ में’ तो उसमें गीत आनंद बक्शी से ही लिखवाए। इस फिल्म के गाने हिट हुए और बक्शी साहब को कुछ सफलता मिलती दिखी।
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