लेकिन बड़ा प्रश्न यही है कि इन सभी नेताओं का राम के प्रति प्रेम कांग्रेस छोड़ने के बाद ही क्यों दिखाई देता है? कांग्रेस में रहते हुए वे राम के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन क्यों नहीं करते? क्या एक बहुसंख्यक हिंदू आबादी वाले देश में कोई राजनीतिक पार्टी (कांग्रेस) हिंदू या राम का विरोध करने की रणनीति अपना सकती है? क्या यह राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा कदम नहीं होगा?
पार्टी की नीति क्या रही?
अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद कांग्रेस ने बहुत सोची-समझी रणनीति अपनाई थी। पार्टी ने खुलेआम राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं हुई, लेकिन उसने अपने नेताओं को अयोध्या जाकर भगवान राम का दर्शन करने से भी नहीं रोका। उसका आरोप था कि यह भाजपा का राजनीतिक समारोह है, इसलिए वह इसमें शामिल नहीं होगी, लेकिन भगवान राम सबके हैं और पार्टी का कोई भी नेता-कार्यकर्ता अपने स्तर पर राम का दर्शन करने के लिए स्वतंत्र है। उसके कई नेताओं चरणजीत सिंह चन्नी, अजय राय और दीपेंद्र हुड्डा ने राम का दर्शन भी किया, और कांग्रेस पार्टी से टिकट भी पाया। ऐसे में सीधे तौर पर यह कहना सही नहीं लगता कि कांग्रेस राम विरोधी है। फिर कांग्रेस छोड़ रहे नेता उस पर 'राम विरोधी' होने का आरोप क्यों लगा रहे हैं?
इस तरह दिखता है कथनी-करनी का विरोध
कांग्रेस पर राम विरोधी होने का आरोप लगाकर पार्टी छोड़ने वाली राधिका खेड़ा ने आज सात मई को भाजपा का दामन थाम लिया। उन्होंने अमर उजाला से कहा कि बाहर से देखने पर इस सच्चाई का पता नहीं चलता है, लेकिन जब आप पार्टी के अंदर होते हैं, तब इस सच्चाई का पता चल जाता है। उन्होंने कहा कि जब भी उन्हें लगता है कि कोई धर्म गुरु धर्म की बजाय पाखंड और पोंगापंथी को बढ़ावा दे रहा है, वे उसका विरोध करती हैं। जब उन्होंने बाबा बागेश्वर जैसे कई हिंदू नेताओं के कथित 'चमत्कार' का विरोध किया, तो इसका स्वागत किया गया। (ऐसे ट्वीट अभी भी उनकी ट्विटर टाइमलाइन पर देखे जा सकते हैं।)
खेड़ा ने कहा कि लेकिन जब उन्होंने एक ईसाई पादरी के द्वारा जल छिड़ककर लोगों की गंभीर बीमारी का दावा करने वाला वीडियो अपने ट्विटर पर शेयर किया और ऐसे भ्रामक दावे का विरोध किया, तो पार्टी के कई शीर्ष नेता उनसे नाराज हो गए। पूर्व महिला कांग्रेस अध्यक्ष नेटा डिसूजा ने उनसे कहा कि उस पादरी ने इस घटना की शिकायत राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से की है। उन्होंने वह वीडियो डिलीट करने तक के लिए कहा।
उनका आरोप है कि यह भेदभाव आपको प्रतिदिन के कामकाज में दिखाई पड़ता है, लेकिन पार्टी में बने रहने के लिए छोटे स्तर वाले नेता इसका विरोध नहीं कर पाते। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि जब दीपेंद्र हुड्डा या चरणजीत सिंह चन्नी जैसे नेता राम का दर्शन करते हैं, तो राजनीतिक नफा-नुकसान को भांपते हुए उनके खिलाफ कुछ नहीं कहा जाता।
कांग्रेस पर राम विरोधी होने का आरोप लगाने वाले नेता पार्टी में रहते हुए यह मुद्दा क्यों नहीं उठाते? इस प्रश्न के जवाब में खेड़ा ने कहा कि पार्टी में रहते हुए भी उन्होंने समय-समय पर इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया है। उनके सोशल मीडिया की टाइम लाइन पर आज भी ऐसे ट्वीट देखे जा सकते हैं।
झूठे हैं ये आरोप
उत्तर प्रदेश कांग्रेस नेता विश्वविजय सिंह ने इस तरह के दावों को भ्रामक और गलत इरादों से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, प्रियंका गांधी तक गांधी परिवार के हर नेता समय-समय पर हिंदू देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते रहे हैं। वे मंदिरों में जाकर भगवान का दर्शन कर उनका आशीर्वाद भी लेते रहे हैं।
विश्वविजय सिंह ने कहा कि आज भी अजय राय जैसे यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष निजी जीवन में लगातार पूजा-पाठ करते हैं। उन्होंने भगवान राम का दर्शन भी किया। अपने प्रदेश कार्यालय में भी उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं की फोटो लगा रखी है। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने हर स्तर पर उन पर भरोसा बनाए रखा है। वे स्वयं प्रतिदिन पूजा पाठ करने वाले सनातनी हिंदू हैं। लेकिन पार्टी ने उन्हें लगातार कई महत्त्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी दी। ऐसे में कांग्रेस पर रामद्रोही होने का आरोप लगाना भाजपा-आरएसएस की शरारत है और इसमें कोई सच्चाई नहीं है।
कांग्रेस हिंदू हितों को अपना एजेंडा क्यों नहीं बनाती: भाजपा
भाजपा प्रवक्ता जयराम विप्लव ने अमर उजाला से कहा कि यदि कांग्रेस की छवि हिंदू विरोधी और मुसलमान हितैषी बन गई है, तो इसके पीछे उसके अपने कर्म ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक दल की पहचान उसके राजनीतिक एजेंडे के आधार पर की जाती है, उसके नेताओं-कार्यकर्ताओं के निजी जीवन में किए गए कार्यों के आधार पर नहीं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने नेताओं को किसी भी धर्म के पालन का अवसर भले ही देती हो, लेकिन यह खुलेआम दिखाई देता है कि वह धर्म के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण देने की बात करती है। जबकि वहीं, हिंदुओं को वह धर्म के आधार पर आगे बढ़ाने की कोई बात नहीं कहती।
जयराम विप्लव ने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार की समीक्षा के लिए बनी एंटनी कमेटी ने खुलेआम यह स्वीकार किया था कि पार्टी की एंटी हिंदू छवि बनना उसकी हार का सबसे बड़ा कारण है। कमेटी ने इसे ठीक करने की आवश्यकता होने की बात कही थी। लेकिन जब 500 सालों के संघर्ष के बाद राम मंदिर बना और हर हिंदू इसे एक गौरवशाली क्षण के रूप में याद कर रहा था, कांग्रेस ने इससे किनारा कर लिया। इससे साफ हो गया कि कांग्रेस हिंदू समाज के गर्व के क्षण में उसके साथ नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की इसी नीति से आज जनता को यह बताने की जरूरत नहीं रह गई है कि कांग्रेस हिंदू और राम विरोधी नीति पर चल रही है।
'राजनीतिक स्टंट में पिछड़ रही कांग्रेस'
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह ने अमर उजाला से कहा कि किसी पार्टी का कोई एजेंडा व्यावहारिक तौर पर एक वर्ग विशेष के वोटों को लेने के लिए ही होता है। यदि कांग्रेस के किसी एजेंडे में मुसलमान प्राथमिकता पर दिखाई देते हैं, तो भाजपा के एजेंडे में हिंदू उसी पलड़े में खड़े दिखाई देते हैं। लेकिन दोनों ही दलों का लक्ष्य इन वर्गों का वोट हासिल करना ही होता है। लेकिन ऐसा करते हुए भी किसी दल को किसी दूसरे वर्ग के खिलाफ कभी नहीं दिखना चाहिए। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबका साथ, सबका विकास की बात करते हैं, और केंद्र की योजनाओं में हर धर्म-जाति के लोगों को बराबर की भागीदारी देने की बात करते हैं, तो वे इसी समीकरण को साधने की कोशिश करते हैं।
विवेक सिंह ने कहा कि यदि ध्यान से देखें, तो कांग्रेस भी कमोबेस इसी तरह की रणनीति अपनाती रही है। वह मुसलमानों को लेकर कुछ प्राथमिकता के बयान अवश्य देती रही है, लेकिन साथ ही ओबीसी, एससी-एसटी की बात कर दूसरे वर्गों को भी अपने साथ लेती रही है। लेकिन शाहबानो प्रकरण जैसे कुछ मामलों से भाजपा को यह कहने का अवसर दे मिल गया कि कांग्रेस मुसलमानों के लिए संविधान तक बदल सकती है। जबकि हिंदुओं का विरोध करने के लिए वह राम को काल्पनिक बता सकती है। उनके अनुसार, कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयानों ने भी भाजपा को जनता के मन में यह बात स्थापित करने का अवसर दे दिया है।
उन्होंने कहा कि लेकिन इससे कांग्रेस पार्टी को हिंदू या राम विरोधी कहना सही नहीं होगा। लेकिन यह बात भी सही है कि भाजपा ने जिस तरह बहुसंख्यकवाद और हिंदूवाद को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाकर स्थापित कर दिया है, कांग्रेस ऐसा कोई खतरा नहीं उठा सकती, जिसमें वह हिंदुओं के साथ खड़ी न दिखाई दे। उनका मानना है कि कांग्रेस को न केवल खुलेआम राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होना चाहिए था, बल्कि अरविंद केजरीवाल की तरह उसका जोरशोर से प्रचार भी करना चाहिए था। विवेक सिंह ने कहा कि कांग्रेस इसी पॉलिटिकल स्टंटबाजी में पिछड़ रही है, जो उसके लिए घातक साबित हो रही है।