यह विश्वास करना मुश्किल है कि देश में किसी जमाने में निर्दलीय सांसदों की संख्या किसी भी विपक्षी दल से अधिक हुआ करती थी। दूसरे शब्दों में, निर्दलीय सांसद ही सदन में मुख्य विपक्ष की भूमिका में होते थे। संसद के पहले दो चुनावों में यानी 1952 और 1957 में कांग्रेस पार्टी ने संसद की क्रमश: 364 और 371 सीटें जीती थी। सबसे करीब विपक्षी दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को क्रमश: 16 और 27 सीटें मिली थी। वहीं, दोनों चुनावों में निर्दलीय सांसदों की संख्या क्रमश: 37 और 42 थी। इसके बाद के दो चुनावों में निर्दलीय सांसदों की संख्या तीसरे नंबर पर खिसक गई। बाद के चुनावों में उनका जीतना ही मुश्किल होने लगा और स्थापित पार्टियों ने जड़ें जमा लीं।
पहले लोकसभा चुनाव में 533 निर्दलीय उम्मीदवारों ने किस्मत आजमाई थी। इनमें से 37 जीतने में कामयाब रहे थे। 1957 में उम्मीदवारों की संख्या घटकर 481 रह गई, लेकिन जीतने वालों की संख्या बढ़कर 42 हो गई। देश के संसदीय चुनावों के इतिहास में यह निर्दलीय उम्मीदवारों की सबसे बड़ी सफलता है। 1962 में उम्मीदवार 479 रह गए, जबकि जीतने वाले पिछली बार के मुकाबले आधे से भी कम यानी सिर्फ 20 थे।
निर्दलीयों ने किस्मत आजमाई 1996 में
राजनीतिक स्थिति का प्रभाव निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या पर पड़ता रहा है। 1967 में नेहरू और शास्त्री दोनों राजनीतिक परिदृश्य से हट चुके थे। इंदिरा गांधी की कुर्सी मजबूत नहीं थी, तब चौथे आम चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या 866 पहुंच गई। इसमें से 35 जीते। हालांकि इसके बाद के किसी चुनाव में निर्दलीय सांसदों की संख्या 20 के आंकड़े को भी नहीं छू पाई।
1996 में राजनीतिक अस्थिरता चरम पर थी, तब निर्दलीय लड़ने वालों की संख्या 10,635 पहुंच गई। हालांकि सिर्फ 9 ही जीते।
1991-92 में 10वीं लोकसभा चुनाव से अबतक हुए किसी भी चुनाव में निर्दलीय सांसदों की संख्या दहाई में नहीं पहुंच पाई। तब 5,546 में से सिर्फ एक उम्मीदवार चुनाव जीत पाया।
मोदी युग में निर्दलीय नजर भी नहीं आ रहे...पिछली बार चार जीते
दसवीं लोकसभा को अपवाद मान लिया जाए, तो 2014 से पहले तक निर्दलीय सांसदों की न्यूनतम संख्या पांच या उससे अधिक ही दर्ज होती रही। हालांकि 2014 में नरेंद्र मोदी के अभ्युदय के बाद हुए दोनों चुनावों में निर्दलीय सांसद क्रमश: 3 और 4 ही जीत कर आ पाए।