कोई ईवीएम के साथ किसी ने बैलेट पेपर चुना
आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सोशल मीडिया पर ईवीएम ट्रेंड करता रहा। यूजर चुनाव के प्रथम व अंतिम चरण के बड़े अंतर को वोटों की गिनती की पारदर्शिता से जोड़ने लगे। विभिन्न पार्टी समर्थकों की आपस में जंग जारी रही। कोई ईवीएम के साथ खड़ा नजर आया, तो किसी ने बैलेट पैपर को चुना। दोनों के विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फोटो लगाकर पोल बनाए गए कि कौन अधिक विश्वसनीय है। कई वीडियो वायरल भी हुए, जिनमें वक्ता ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने का समर्थन करते दिखे। यूजर्स ने चालाकीपूर्ण तरीके से वोट की गिनती करने का आरोप लगाकर चुनाव आयोग पर भी सवाल उठाया।
विचार : कई चरणों में चुनाव से बढ़ जाती हैं पेचीदगियां
कई चरणों में चुनाव कराने की जो भी वजह हो, लेकिन यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। इससे कई पेचीदगियां बढ़ जाती हैं। उम्मीदवारों को चुनौती झेलनी ही पड़ती है, साथ ही मतदाताओं का रुझान भी चुनाव के प्रति कम होने लगता है। चुनाव परिणाम अगर देरी से आता है तो जनता का विश्वास भी परिणाम में घटता है। जितना जल्दी चुनाव परिणाम आता है, जनता का विश्वास लोकतंत्र में बढ़ता है। दूसरे चरण की रणनीति और पहले चरण के चुनावी गणित में चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वाले उलझ जाते हैं। कई चरणों में चुनाव होने से जिस पार्टी व प्रत्याशी के पास संसाधन ज्यादा होते हैं, उसे फायदा पहुंचने की गुंजाइश बनी रहती है। जहां तक मतदाताओं की बात है तो फ्लोटिंग वोटर जिनकी संख्या काफी अधिक होती है, उन्हें भी निर्णय ले पाना कठिन होता है। मतदान होने के बाद तुरंत परिणाम आना चाहिए। सात-सात चरणों में चुनाव होने से कई बार यह भी देखने को मिलता है कि पार्टी को चुनावी रणनीति बदलनी पड़ती है।
-प्रो. तनवीर ऐजाज, राजनीतिक विश्लेषक