मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव आजमगढ़ से लेकर जौनपुर और कुशीनगर से लेकर प्रयागराज तक यादव बहुल इलाकों में जनसभाएं कर रहे हैं। जब वे सीएम पद की शपथ ले रहे थे, तो भाजपा ने बाकायदा पोर्टेबल स्क्रीन लगवाकर यूपी-बिहार की यादव बहुल सीटों पर लाइव टेलीकास्ट दिखवाया था। पार्टी ने राज्यों के पिछले चुनावों में जब आदिवासी, ओबीसी और जनरल सीएम बनाए, तो उनके हिस्से यादव वोट बटोरने का जिम्मा आया। वे भले ही नहीं मानते हों, लेकिन भाजपा के लिए वह यादवों के ब्रांड एंबेसेडर हैं और अखिलेश यादव के मुकाबिल पार्टी के नेता। चुनावी सभा के बीच ही चुनावों के इर्द-गिर्द उपमिता वाजपेयी की मोहन यादव से बातचीत के पेश हैं प्रमुख अंश...
भाजपा में आप यादवों के ब्रांड एंबेसेडर हैं?
मैं यादवों का नहीं, भाजपा का ब्रांड एंबेसेडर हूं। भाजपा ने सबका साथ, सबका विकास किया। इसलिए मैं पार्टी का आभार मानता हूं। उसी भाव से देशभर में भेजा जा रहा हूं। पहले शिक्षामंत्री था, यूडीए चेयरमैन था, उत्तरदायित्व के साथ जो कार्यकर्ता को बढ़ाती है, वह भाजपा है। दूसरी पार्टियां अपने परिवार से बाहर नहीं आती हैं।
चर्चा है कि आपको भाजपा अखिलेश यादव के मुकाबले प्रोजेक्ट कर रही है। आप क्या मानते हैं?
मैं झारखंड जाता हूं तो वहां लोग अलग ढंग से सोचते हैं। राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र, छत्तीसगढ़, हरियाणा, दिल्ली जैसे 13 राज्यों में गया हूं। हर जगह अलग-अलग चुनौतियां हैं। लेकिन ये बात सही है कि पार्टी भरोसा करती है और हम कैम्पेन करते हैं तो फायदा होता है।
पूर्वांचल में यादवों का बहुत बड़ा वोट बेस है और यहीं आपकी सबसे ज्यादा यात्राएं हो रही हैं
मैं सभी जगह बराबर से जा रहा हूं। मैं मैनपुरी भी गया। जहां जरूरत हुई, वहां गया।
आपकी सारी राजनीति मप्र में रही है, यूपी में क्या अलग पॉलिटिक्स है?
देश की ही पॉलिटिक्स है सब। यूपी मेरे लिए आसान है। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ से ज्यादा। मोदी हैं, तो मुमकिन है। मोदी जी चुनाव लड़ने बनारस आ सकते हैं। वो भी तब जब हमारी उत्तर प्रदेश में सरकार भी नहीं थी। मोदी जी ने हिम्मत दिखाई। कांग्रेस सीख ले कि उनकी पांचों पीढ़ी दिल्ली में पैदा हुई, लेकिन वो दिल्ली से चुनाव नहीं लड़ते हैं। वो दिल्ली से चुनाव लड़ के दिखाए। अमेठी, रायबरेली से ही क्यों? दो चार दिन पहले उनकी बहन कह रही थीं कि राहुल प्रधानमंत्री के दावेदार हैं। एक सीट जीते थे पिछले चुनाव में उप्र से। उस एक सीट को भी छोड़ दिया सोनिया गांधी ने। कोई सीट डरकर ही छोड़ता है। अमेठी हार गए तो वहां से नहीं लड़ रहे। बहन को चुनाव लड़ा नहीं रहे।
यूपी में समाजवादी पार्टी से बड़ी टक्कर है या फिर कांग्रेस से?
हमारी किसी से टक्कर ही नहीं। चारों तरफ मोदीमय वातावरण है। योगीजी-मोदीजी के नेतृत्व में डबल इंजन की सरकार चलेगी। हम यूपी में 80 सीटें जीतने के मिशन पर हैं।
केजरीवाल ने तो बयान दिया था योगी जी को बदल देंगे?
मुझे नहीं पता वो भविष्यवाणी कब से करने लगे हैं। वो अपने बारे में जान लें तो अच्छा है। वेे अपनों के लिए करते तो स्वाति मालीवाल जैसी घटना नहीं होती।
जातिगत जनगणना का तेजस्वी, अखिलेश, राहुल ने समर्थन किया। भाजपा का क्या रुख है?
कांग्रेस ने तो खुद विरोध किया था। मंडल आयोग की रिपोर्ट को टाला। जातिगत जनगणना को तो कांग्रेस ही टालती रही। नड्डा जी तो बोले, हम सैद्धांतिक रूप से सहमत हैं। ये सिर्फ बहाने बना रहे हैं। मोदी जी ने मुझ जैसे लोगों को मौका दिया कि नहीं दिया। हम तीन सीएम बने, एक आदिवासी, एक ओबीसी और एक जनरल। कांग्रेस ऐसा क्यों नहीं करके बता रही।
आपका बयान चर्चित था, मोदी तीसरी बार पीएम बने तो हम मथुरा जाकर मुस्कुराएंगे।
द्वारका में पुल बनाया। कृष्ण के धाम को जगमगाया। वहां पानी में डुबकी लगाकर मोरपंख लगाया। इससे हम जैसे लोगों को तो आनंद आना ही चाहिए। वे मथुरा के पहले अयोध्या में आनंद दिलवा चुके हैं। महाकाल जगमगाया है।...तो मथुरा ने क्या बिगाड़ा है। मैं मप्र में राम-कृष्ण की चरण पादुकाओं की जगह पर तीर्थ बना रहा हूं। जिन पर आस्था है, वे तीर्थ क्यों अच्छे नहीं होने चाहिए।
जैसा अयोध्या में हुआ, क्या वो काशी-मथुरा में भी होना चाहिए?
क्यों नहीं होना चाहिए। कोई शक नहीं। ये आस्था के केंद्र हैं। कृष्ण को कैसे मथुरा से अलग कर दें। वहां विकास करना जनता की आस्था का ध्यान रखना है। काशी तो बहुत अच्छी हुई और अच्छी होगी।