नक्सल प्रभावित जिला खूंटी भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली भी है। बिरसा मुंडा झारखंड के प्रणेता माने जाते हैं। आजादी की लड़ाई के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी थी। 1967 में बनी इस सीट पर पहली बार कांग्रेस जीती, मगर कड़े मुकाबले में। कांग्रेस के जय सिंह को 24.2%, निर्दलीय पी कच्छप को 21.4%, भाजपा को 15.4% और स्वतंत्र पार्टी को 12.8% मत मिले थे। 1971 में निर्दलीय मिरल एनेम होरो जीते।
1977 के चुनाव में भारतीय लोक दल से कड़िया मुंडा ने जीत दर्ज की थी। 1989 को खूंटी की राजनीति में भाजपा के मजबूत प्रादुर्भाव का समय कहा जा सकता है। कड़िया मुंडा की जीत के बाद यह सीट लगातार भाजपा के कब्जे में रही है। बिहार से अलग होकर झारखंड बनने के बाद हुए पहले चुनाव में 2004 में यह सीट भाजपा के हाथ से चली गई। तब कांग्रेस की सुशीला केरकेट्टा ने जीत दर्ज की। कड़िया मुंडा तीसरे नंबर पर रहे। 2009, 2014 में कड़िया फिर जीते।
2019 में अर्जुन मुंडा 11 प्रत्याशियों की भिड़ंत में फंस गए थे। माना जाता है कि अर्जुन मुंडा ने ही निर्दलीय मीनाक्षी मुंडा को खड़ा करवाया था। मीनाक्षी ने 10,989 मत हासिल कर कांग्रेस के कालीचरण की राह में बड़ा रोड़ा बनी थीं। जीत-हार के अंतर को देखते हुए मीनाक्षी को मिले वोट टर्निंग प्वाइंट साबित हुए। नौ निर्दलीयों ने 47,864 वोट हासिल किए थे, जिससे जीत का अंतर बेहद कम रहा था।
बबीता ने लड़ाई को कठिन बनाया
इस बार भारत आदिवासी पार्टी भी मैदान में है। इसकी उम्मीदवार बेलोस बबीता कच्छप वही हैं, जिन्होंने सात वर्ष पूर्व पत्थलगड़ी आंदोलन खड़ा किया था। बेलोस ही नहीं, झारखंड पार्टी की अपर्णा हंस समेत कई निर्दलीय भी मैदान में हैं। 2019 में मोदी लहर में भी अर्जुन मुंडा जीत को बस छू भर पाए थे। लिहाजा, इस बार भी लड़ाई कठिन ही होने वाली है। खूंटी लोकसभा में छह विधानसभा सीटे हैं।