यदुवीर पहली बार चुनावी मैदान में हैं। उनके पिता श्रीकांतदत्त नरसिम्हराजा वाडियार कांग्रेस के टिकट पर चार बार सांसद चुने गए। 1991 में उन्होंने एक बार भाजपा से भाग्य आजमाया, पर हार झेलनी पड़ी। यदुवीर अगर जीतते हैं, तो भाजपा के टिकट पर सफलता पाने वाले शाही परिवार के पहले सदस्य होंगे। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के गृह जनपद में कांग्रेस के सामने ताल ठोक रहे यदुवीर के सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन शाही परिवार के प्रति स्थानीय लोगों का स्नेह और दूसरे समुदाय के खिलाफ मतों का ध्रुवीकरण उनके पक्ष में जाता दिख रहा है।
उधर, लिंगायत समुदाय के प्रताप सिम्हा का टिकट कटने को कांग्रेस अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी ने इस सीट पर 47 साल में पहली बार वोक्कालिगा समुदाय के एम लक्ष्मण को उतारा है। मुस्लिम मतों पर एकाधिकार जताने वाली कांग्रेस इसे वोक्कालिगा समुदाय के अहम की लड़ाई बनाकर 2014 और 2019 की हार का क्रम तोड़ना चाहेगी। कांग्रेस के साथ एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि संसदीय क्षेत्र की आठ विधानसभा सीटों में से पांच पर उसका कब्जा है। तीन अन्य सीटों में दो जदएस व एक भाजपा के खाते में है। मैसूर लोकसभा में आठ विधानसभा सीटें हैं। इनमें पेरियापटना, हुनसुरू, चामुंडेश्वरी, कृष्णराजा, चामराजा और नरसिम्हराजा विधानसभा सीटें मैसूरू जिले की, कोडगु जिले की विराजपेट और मडिकेरी विधानसभा सीटें भी मैसूर में ही आती हैं।
ढीली पड़ती जा रही कांग्रेस की पकड़
सिल्क के लिए मशहूर मैसूर में 1999 तक अजेय रही कांग्रेस की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है। भाजपा के बढ़ते मत प्रतिशत से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। 2004 में भाजपा ने 33.05% वोट हासिल कर यह सीट जीती थी। जदएस को 31.99% आैर कांग्रेस को 31.26% मत मिला।
इस चुनाव में यदुवीर वाडियार के पिता श्रीकांतदत्त नरसिम्हराजा वाडियार कांग्रेस प्रत्याशी थे। हार के बाद उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा। 2019 में भाजपा ने 52.27% मत हासिल कर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस को 41.75% मत मिले।